- 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए अब्राहम समझौते में कुछ अरब देशों ने इजरायल से रिश्ते सामान्य किए थे.
- पहली बार अरब देशों ने फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान का इंतजार किए बिना इजरायल को मान्यता दी थी.
- अब ट्रंप चाहते हैं कि मिडिल ईस्ट और मुस्लिम दुनिया के और देश इसमें शामिल हों, पर फिलहाल यह कठिन दिख रहा है.
मध्य-पूर्व की राजनीति में पिछले कुछ सालों में अगर किसी एक समझौते ने सबसे बड़ा बदलाव किया, तो वह है अब्राहम अकॉर्ड्स या अब्राहम समझौता. 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए इन समझौतों ने दशकों पुरानी अरब वर्ल्ड की सोच को बदल दिया. जिन अरब देशों ने सालों तक इजरायल को मान्यता नहीं दी थी, वे अचानक उसके साथ दोस्ती, व्यापार और सुरक्षा साझेदारी करने लगे. उस समय इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी विदेश नीति जीत के तौर पर माना गया था.
अब ट्रंप इस समझौते को मिडिल ईस्ट के और देशों तक फैलाना चाहते हैं. उन्होंने हाल में कहा है कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये और यहां तक कि ईरान को भी इस बड़े समझौते का हिस्सा बनना चाहिए. लेकिन गाजा युद्ध, फिलिस्तीन विवाद और ईरान-इजरायल तनाव के बीच ट्रंप का यह सपना फिलहाल काफी मुश्किल और लगभग काल्पनिक माना जा रहा है.
अब्राहम अकॉर्ड नाम क्यों रखा गया?
इस समझौते का नाम अब्राहम यानी पैगंबर इब्राहिम के नाम पर रखा गया है. इब्राहिम को यहूदी, मुस्लिम और ईसाई तीनों धर्मों में बेहद सम्मान दिया जाता है. लिहाजा अमेरिका ने इस नाम के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि यह समझौता धार्मिक संघर्ष नहीं बल्कि साझा विरासत और साथ रहने की दिशा में कदम है.

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किन देशों ने सबसे पहले इजरायल से रिश्ते बनाए?
सितंबर 2020 में सबसे पहले इजराइल ने संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ रिश्ते सामान्य करने के समझौते किए. इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए. इन समझौतों के बाद दूतावास खुले, सीधी फ्लाइट्स शुरू हुईं, व्यापार और निवेश बढ़ा, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा सहयोग शुरू हुआ, पर्यटन और रक्षा साझेदारी मजबूत हुई. मिडिल ईस्ट में पहली बार ऐसा माहौल बना कि अरब देश और इजरायल खुलकर साथ काम करने लगे.

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ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए थे अब्राहम समझौते
ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल के दौरान हुआ अब्राहम समझौता के तहत अरब देशों ने इजरायल के साथ अपने संबंधों को औपचारिक रूप दिया था और कुछ ही हफ्तों के भीतर इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने प्रमुख का खाड़ी देशों में वीआईपी स्वागत किया गया था जो कि इस समझौते से पहले तक असंभव बात थी. लेकिन जिस अब्राहम समझौतों का जोर-शोर से प्रचार किया गया और जिनके तहत यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान सभी ने इजरायल के साथ समझौते किए थे उस पर जमीनी हालात का असर सबसे बड़ा दिखा. उसे लेकर अरब देशों में हिंसा हुई. अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध में किसी भी तरह की गर्मजोशी को रोक दिया.
यह समझौता पहले के शांति समझौतों से अलग कैसे था?
इससे पहले भी इजरायल ने अरब देशों के साथ शांति समझौते किए थे. जैसे कि मिस्र ने 1979 में और जॉर्डन ने 1994 में, लेकिन वो समझौते युद्ध खत्म करने के लिए किए गए थे. अब्राहम अकॉर्ड उनसे इस मायने में अलग थे कि इसमें दोस्ती की भाषा थी. आर्थिक साझेदारी, व्यापार, जैसे मुद्दे शामिल थे और खास बात यह थी कि इसके लिए फिलिस्तीन के मुद्दे के समाधान का इंतजार नहीं किया गया था.
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फिलिस्तीन मुद्दा इसमें सबसे बड़ा विवाद क्यों बना?
दशकों तक अरब दुनिया की नीति थी कि जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इजरायल को मान्यता नहीं दी जाएगी. लेकिन अब्राहम अकॉर्ड में यह शर्त नहीं शामिल की गई थी. इसलिए फिलिस्तीन समर्थकों ने आरोप लगाया कि अरब देशों ने फिलिस्तीन को अकेला छोड़ दिया, इजरायल पर दबाव नहीं बनाया गया और कब्जे वाले इलाकों पर कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. इसी वजह से कई अरब देशों में आम जनता के बीच इन समझौतों को लेकर नाराजगी भी रही.

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तो अरब देशों ने इजरायल से दोस्ती क्यों की?
दरअसल मिडिल ईस्ट में ईरान लगातार मजबूत हो रही है. उसका असर और दबदबा बढ़ रहा था जिससे खाड़ी के अन्य देशों और इजरायल ने भी उससे खतरा महसूस किया. यही वजह है कि वो पास आने लगे. साथ ही उन्हें यह भी यकीन था कि इजरायल के करीब आ कर उन्हें साइबर सिक्योरिटी, डिफेंस और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में इजरायल से रिश्ते सुधार कर फायदा मिलेगा. आधुनिक तकनीक और आर्थिक फायदे भी मिलेंगे.
इस समझौते को अमेरिका का समर्थन था तो इस लिहाज से यह अरब देशों के लिए एक कूटनीतिक उपलब्धि भी मानी गई क्योंकि इससे सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा और राजनीतिक एवं आर्थिक लाभ की संभावना भी पूरी होती. अमेरिका ने कई देशों को सुरक्षा और राजनीतिक लाभ भी दिए.
अब ट्रंप फिर इसे क्यों बढ़ाना चाहते हैं?
हाल ही में ट्रंप ने कहा है कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और यहां तक कि ईरान को भी इस बड़े समझौते का हिस्सा बनना चाहिए. ट्रंप इसे एक मजबूत और आर्थिक रूप से ताकतवर मिडिल ईस्ट गठबंधन के तौर पर पेश किया है.

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तो इसमें मुश्किलें क्यों दिख रही हैं?
गाजा में युद्ध के माहौल ने पूरी स्थिति को बदल कर रख दिया है. इस समझौते से फिलिस्तीन के समझौते को बाहर रखा गया था पर जब हमास के साथ इजरायल गाजा में उलझा और उससे हजारों के संख्या में वहां के आमजन प्रभावित हुए तो अरब देशों में इजरायल के खिलाफ गुस्सा काफी बढ़ गया. कई देशों में वहां की जनता खुलकर फिलिस्तीन के समर्थन में सड़कों पर उतरी.
सऊदी अरब ने भी साफ लहजे में कह दिया कि वो तब तक इजरायल को मान्यता नहीं देगा जब तक फिलिस्तीन के लिए अलग देश बनने की भरोसेमंद राह नहीं बनती.
उधर जॉर्डन और मिस्र के इजरायल से रिश्ते तो हैं पर दोनों देशों की सरकारों ने गाजा युद्ध को लेकर अपनी चिंता जताई है. लिहाजा वहां भी नाराजगी दिखी. इसमें भी जॉर्डन खासतौर पर वेस्ट बैंक के मुद्दे पर अधिक संवेदनशील है.
उधर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा है कि उनके देश को अब्राहम अकॉर्ड्स स्वीकार्य नहीं हैं. ख्वाजा आसिफ उनमें से हैं, जो यहूदी राष्ट्र इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के किसी भी विचार का पुरजोर विरोध करते हैं. पिछले महीने ही उन्होंने इज़राइल को मानवता के लिए अभिशाप बताया था, और उस पर मिडिल ईस्ट में नरसंहार करने का आरोप भी मढ़ा था.
मि़डिल ईस्ट में ताजा युद्ध से यह तो स्पष्ट ही है कि ईरान और इजरायल लंबे समय से एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं. ऐसे में दोनों देशों को युद्ध खत्म करने के लिए एक ही मेज पर समझौते के लिए बिठाना भी जब बड़ी चुनौती है तो दोनों का एक ही समझौते में शामिल होना तो फिलहाल लगभग नामुमकिन माना जा रहा है.
यानी, ट्रंप भले ही अब्राहम समझौते को विस्तार देना चाहते हैं पर उनके लिए फिलहाल यह लक्ष्य दूर चला गया है.

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क्या ट्रंप का सपना सच हो सकता है?
फिलहाल मध्य पूर्व की स्थिति देखकर यह आसान नहीं लगता. ट्रंप जिस बड़े क्षेत्रीय समझौते की बात कर रहे हैं, उसके रास्ते में ईरान VS इजरायल और अमेरिका युद्ध, गाजा युद्ध, फिलिस्तीन मुद्दा और अरब मुल्कों की अपनी घरेलू राजनीति भी बड़ी बाधाएं हैं. यही कारण है कि कई जानकार इस अब्राहम अकॉर्ड योजना को बहुत महत्वाकांक्षी और जमीन से कोसो दूर बता रहे हैं.
भारत के लिए मायने?
भारत के लिए यह समझौता उसके ऑयल इम्पोर्ट के लिहाज से अहम है. भारत ने खाड़ी देशों और इजरायल के साथ अपने संबंध बेहतर बनाए रखे हैं. पांच साल पहले ही I2U2 जैसे आर्थिक समूह के गठन के साथ ही वह उससे जुड़ गया था जिसमें अमेरिका और इजराइल के साथ ही यूएई भी सदस्य हैं. बता दें कि यूएई इस वक्त खाड़ी देशों से भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर है. ऐसे में अब्राहम अकॉर्ड ने भारत के लिए व्यापार और कनेक्टिविटी के नए रास्ते खोलने में किरदार निभाया. साथ ही भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर जैसी योजनाओं को भी बल मिला.
ऐसे में अगर मिडिल ईस्ट में स्थिरता बढ़ती है, तो भारत को ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक स्तर पर फायदा हो सकता है.

फिलहाल अब्राहम अकॉर्ड की क्या स्थिति है?
अब्राहम अकॉर्ड्स खत्म नहीं हुए हैं. यूएई, बहरीन, मोरक्को और इजरायल के बीच आर्थिक और रणनीतिक संबंध अभी भी जारी हैं. लेकिन इससे नए देशों का जुड़ाव रुक गया है यानी विस्तार की गति अवरुद्ध हो गई है. फिलिस्तीन मुद्दा भी केंद्र में आ गया है. यानी जिस नए मध्य पूर्व का सपना दिखाया गया था, उसकी स्थिति फिलहाल धुंधली और अस्पष्ट नजर आती है.
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