ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के बीच एक नया संकट खड़ा हो गया है. अमेरिकी F-15E फाइटर जेट के गिरने और उसके पायलट के ईरानी इलाके में पहुंचने की खबरों ने हालात और तनावपूर्ण बना दिए हैं. ईरान ने यहां तक ऐलान कर दिया है कि जो भी इस पायलट को पकड़कर सौंपेगा, उसे सम्मानित किया जाएगा. ऐसे में बड़ा सवाल यही है, अगर दुश्मन देश में कोई पायलट पकड़ा जाता है, तो क्या उसे छोड़ा जाता है या सजा दी जा सकती है? इसका जवाब अंतरराष्ट्रीय कानून, खासकर जिनेवा कन्वेंशन और जमीनी सियासत दोनों में छिपा है.
युद्धबंदी का दर्जा: पायलट दुश्मन नहीं, POW होता है
अगर कोई सैन्य पायलट दुश्मन देश की जमीन पर पकड़ा जाता है, तो उसे सामान्य कैदी नहीं बल्कि 'प्रिजनर ऑफ वॉर' (POW) यानी युद्धबंदी माना जाता है. जिनेवा कन्वेंशन (1949) के तहत यह साफ तय है कि युद्ध में पकड़े गए सैनिकों को कानूनी सुरक्षा मिलती है. इसका मतलब यह है कि अमेरिकी पायलट अगर ईरान के कब्जे में आता है, तो उसे युद्धबंदी का दर्जा दिया जाना चाहिए, न कि अपराधी या जासूस की तरह ट्रीट किया जाए.
जिनेवा कन्वेंशन के नियम: क्या कर सकता है, क्या नहीं
जिनेवा कन्वेंशन के मुताबिक, युद्धबंदी के साथ इंसानियत और सम्मान के साथ व्यवहार करना जरूरी है. उसके साथ मारपीट, यातना या सार्वजनिक अपमान नहीं किया जा सकता. उसे केवल अपनी बेसिक पहचान- नाम, रैंक और सर्विस नंबर बताने के लिए बाध्य किया जा सकता है. इसके अलावा, उसे सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए, मेडिकल सुविधा और पर्याप्त भोजन दिया जाना जरूरी है.
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सबसे अहम बात, सिर्फ दुश्मन देश का सैनिक होने के कारण उसे सजा नहीं दी जा सकती. सजा तभी संभव है, जब उस पर किसी युद्ध अपराध का आरोप साबित हो और वह भी निष्पक्ष ट्रायल के बाद.
क्या ईरान को पायलट को छोड़ना होगा?
यह जरूरी नहीं कि ईरान तुरंत पायलट को रिहा कर दे. अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, युद्ध खत्म होने तक किसी भी युद्धबंदी को हिरासत में रखा जा सकता है. आमतौर पर युद्धविराम या शांति समझौते के बाद ही रिहाई होती है. हालांकि, अगर पायलट गंभीर रूप से घायल हो, तो मानवीय आधार पर पहले भी छोड़ा जा सकता है. यानी कानूनी तौर पर ईरान उसे लंबे समय तक हिरासत में रख सकता है, लेकिन उसके साथ बुरा व्यवहार नहीं कर सकता.
नियम बनाम हकीकत: क्या होता है असल दुनिया में
कागज पर नियम साफ हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है. कई बार देशों ने युद्धबंदियों का इस्तेमाल दबाव बनाने या प्रचार के लिए किया है. उन्हें टीवी पर दिखाना, बयान दिलवाना या जासूस बताकर अलग कानून लागू करना. ऐसे उदाहरण पहले भी देखे जा चुके हैं. ईरान का 'इनाम' वाला ऐलान भी इसी सियासी और मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
अमेरिका के पास क्या विकल्प हैं?
अगर पायलट ईरान के कब्जे में आता है, तो अमेरिका के पास कई रास्ते हैं. पहला, वह स्पेशल फोर्स के जरिए रेस्क्यू ऑपरेशन की कोशिश कर सकता है, हालांकि यह बेहद जोखिम भरा होता है. दूसरा, वह संयुक्त राष्ट्र और इंटरनेशनल रेड क्रॉस के जरिए कूटनीतिक दबाव बना सकता है.
तीसरा और सबसे आम तरीका होता है, कैदी अदला-बदली. यानी ईरान के पास मौजूद अमेरिकी पायलट के बदले अमेरिका अपने पास मौजूद ईरानी कैदियों को छोड़ सकता है. कई बार ऐसे मामले बड़े राजनीतिक सौदों का हिस्सा भी बन जाते हैं.
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फिलहाल अमेरिका क्या कर रहा?
लेकिन फिलहाल तो अमेरिका अपने पायलट को छुड़ाने के लिए खुला ऑपरेशन लॉन्च करने की तैयारी में है. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक US ने अपने पायलट को वापस लाने के लिए कई स्तर पर काम शुरू किया है. इसी क्रम में US एयरफोर्स ने दो हेलिकॉप्टर ईरानी एयरस्पेस में भेजे. जिन्हें कि ईरान ने निशाना बना लिया. सूत्रों के अनुसार, एक US एयरफोर्स UH‑60 ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर और एक अन्य सर्च‑एंड‑रेस्क्यू हेलिकॉप्टर पर फायरिंग की गई. हालांकि दोनों हेलिकॉप्टर क्षतिग्रस्त होने के बावजूद वहां से निकलने में सफल रहे. एक सूत्र ने US की मीडिया संस्थान 'द हिल' को बताया कि यह ऑपरेशन उस F‑15E स्ट्राइक ईगल के क्रू मेंबर्स को बचाने के लिए किया जा रहा था, जिसे ईरानी बलों ने मार गिराने का दावा किया है.
कानून से ज्यादा ताकत और राजनीति तय करती है किस्मत
कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय कानून साफ कहता है कि दुश्मन देश में पकड़ा गया पायलट युद्धबंदी होता है और उसे सजा नहीं दी जा सकती. लेकिन असल दुनिया में उसकी किस्मत सिर्फ कानून से तय नहीं होती, बल्कि उस वक्त की राजनीति, सैन्य ताकत और दोनों देशों के रिश्ते ज्यादा अहम भूमिका निभाते हैं. यानी ईरान-अमेरिका टकराव में यह पायलट सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक खेल का अहम मोहरा भी बन सकता है.
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