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'BCI को लॉ छात्रों पर कार्रवाई का अधिकार नहीं'... NALSAR मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Supreme Court BCI NALSAR Case: सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक वकील के तौर पर कोई छात्र रजिस्टर नहीं होता है, तब तक बार काउंसिल को उसके खिलाफ एक्शन लेने का कोई अधिकार नहीं है.

'BCI को लॉ छात्रों पर कार्रवाई का अधिकार नहीं'... NALSAR मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
NALSAR मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों को लेकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के आदेश को लेकर खूब बवाल हुआ था, जिसे लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि कानून छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का BCI को अधिकार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि NALSAR छात्रों के मामले में BCI का आदेश कानूनन गलत था. एडवोकेटस एक्ट, 1961 BCI या किसी राज्य बार काउंसिल को कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की कोई स्पष्ट या निहित शक्ति प्रदान नहीं करता है. 

बार काउंसिल को नहीं है कोई अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने  बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों के पास कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का वैधानिक अधिकार नहीं है. बार काउंसिल को किसी कानून स्नातक पर अनुशासनात्मक नियंत्रण का अधिकार तभी मिलता है, जब वह वकील के रूप में पंजीकृत हो जाए. 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि कानून के छात्रों के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार उनके मूल शैक्षणिक संस्थान या उस संस्था के नियमों और उपनियमों के तहत निर्धारित सक्षम प्राधिकारी के पास होता है. 

NALSAR के छात्रों को लेकर जारी हुआ था फरमान

सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को लागू करते हुए BCI अध्यक्ष के 13 अगस्त को जारी उन निर्देशों को कानून के अधिकार के बिना जारी किया गया करार दिया, जिनमें हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने और CJI के खिलाफ छात्रों के अभियान को लेकर छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ जांच की बात कही गई थी.

विवाद बढ़ने के बाद वापस लिया फैसला

विवाद बढ़ने के बाद BCI अध्यक्ष ने ये निर्देश जारी होने के करीब एक घंटे के भीतर वापस ले लिए थे. इस मामले में NALSAR के दो पूर्व छात्रों मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर ने दलील दी कि आदेश वापस लिए जाने के बावजूद यह जांच जरूरी है कि BCI अध्यक्ष ने किस अधिकार और किस कानूनी प्रावधान के तहत ये निर्देश जारी किए थे. 

परमेश्वर ने अदालत में कहा कि मामला केवल एक छात्र तक सीमित नहीं है, बल्कि ये विश्वविद्यालय में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा व्यापक प्रश्न है. उन्होंने कहा था कि BCI एक वैधानिक संस्था है, जो कानूनी शिक्षा और कानूनी पेशे के नियमन के लिए जिम्मेदार है. इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि पूरे बैच के नामांकन पर रोक लगाने का फैसला किस आधार पर लिया गया और इसके लिए किस प्रावधान का इस्तेमाल किया गया. 

BCI अध्यक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि संबंधित निर्देश तत्काल वापस ले लिए गए हैं और BCI की बैठक में मामले को समाप्त कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त को जारी और बाद में संशोधित सभी संबंधित संचारों को ‘कानून के किसी अधिकार के बिना' जारी किया गया घोषित करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया. साथ ही, छात्रों और शिक्षकों को BCI या किसी राज्य बार काउंसिल की ओर से दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा देने वाला अंतरिम आदेश भी स्थायी कर दिया. 

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