- दिल्ली हाईकोर्ट में सोमवार को दिल्ली शराब नीति मामले में सीबीआई की रिवीजन याचिका पर सुनवाई होगी.
- अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपों से मुक्त किया था.
- केजरीवाल और सिसोदिया ने याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए इसे सुनवाई योग्य न मानने की मांग की है.
दिल्ली शराब नीति से जुड़े मामले में सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में एक अहम सुनवाई होगी. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की उस रिवीजन याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट विचार करेगा, जिसमें राउज एवेन्यू स्थित स्पेशल ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को सभी आरोपों से मुक्त किया गया था. ऐसे में दिल्ली आबकारी नीति केस को लेकर हाईकोर्ट में होने वाली यह सुनवाई अहम मानी जा रही है.
अरविंद केजरीवाल-मनीष सिसोदिया ने लगाई याचिका
मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस मनोज जैन की पीठ अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की तरफ से दायर उन अर्जियों पर भी विचार करेगी, जिनमें सीबीआई की रिवीजन याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं. दोनों नेताओं ने याचिका को सुनवाई योग्य न होने के आधार पर खारिज करने की मांग की है. अर्जी में कहा गया है CBI ने यह रिवीजन याचिका बहुत जल्दबाजी और गैर-गंभीर तरीके से दायर की है. यह याचिका स्पेशल जज की तरफ आरोप मुक्त करने का आदेश पारित होने के केवल चार घंटे के भीतर दायर की गई थी. इससे साफ पता चलता है कि स्पेशल जज के 500 से ज्यादा पन्नों के फैसले में दी गई बातों को ठीक से नहीं समझा गया है. पिछली बार जस्टिस जैन ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को CBI की याचिका का जवाब देने के लिए दो हफ्ते का आखिरी मौका दिया था.
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कोर्ट ने सभी आरोपियों को किया था मुक्त
ताजा अर्जियों में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने तीन महीने से ज्यादा समय तक मामले की विस्तार से सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को आरोप मुक्त कर दिया था. लेकिन CBI ने ऐसी कोई खास बात नहीं बताई है जो गलत हो या जिसमें कोई गड़बड़ी हो. 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने शराब नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को आरोप मुक्त कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि यह मामला न्यायिक जांच में टिकने लायक नहीं था और पूरी तरह से अविश्वसनीय साबित हुआ.
सीबीआई ने दिया था तर्क
अपनी रिवीजन याचिका में CBI ने कहा है कि आरोप मुक्त करने का आदेश साफ तौर पर गैर-कानूनी और गलत था और उसमें स्पष्ट रूप से त्रुटियां थीं. याचिका में कहा गया है कि ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय करने के चरण में ही एक तरह से ट्रायल कर लिया और अभियोजन पक्ष के मामले को चुनिंदा तरीके से पढ़ने के आधार पर आरोप मुक्त करने का आदेश पारित कर दिया था. याचिका में दावा किया गया है कि ट्रायल कोर्ट न केवल मामले के तथ्यों को समझने में नाकाम रही, बल्कि उसने जांच एजेंसी और जांच अधिकारी के खिलाफ गैर-जरूरी और प्रतिकूल टिप्पणियां भी कीं थी.
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