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बसों में पैनिक बटन का खेल: 15 रुपये की डिवाइस पर 25 हजार तक का खर्च, जानें क्यों उठ रहे सवाल

हाल ही में पेश की गई सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट में बसों में लगे इमरजेंसी स्विच से जुड़ी चिंताएं जाहिर की गई हैं. कुछ राज्यों ने इन्हें 'बंद' कर दिया है.

बसों में पैनिक बटन का खेल: 15 रुपये की डिवाइस पर 25 हजार तक का खर्च, जानें क्यों उठ रहे सवाल
बसों में लगी इमरजेंसी स्विचों पर सवाल.
  • बसों में लगे इमरजेंसी स्विच पर संसदीय समिति ने एक रिपोर्ट पेश की है.
  • बसों में लगा ₹15-20 का इमरजेंसी अलर्ट बटन दबाने के बाद जवाब देने के लिए कोई रिसीविंग सेंटर ही नहीं है.
  • ऑपरेटरों का कहना है कि फिटनेस टेस्ट के दौरान इस बटन की जांच के नाम पर उनसे भारी रकम वसूली जाती है.
नई दिल्ली:

हाल ही में संसदीय समिति ने बसों में लगे इमरजेंसी अलर्ट बटन से जुड़े एक अजीब मामले पर जिक्र करते हुए लोगों का ध्यान खींचा है. हालांकि, इन स्विच की कीमत सिर्फ 15-20 रुपये है. लेकिन नतीजा निकलकर सामने आया है कि इनका इस्तमाल न के बराबर हुआ है. क्योंकि अलर्ट का जवाब देने के लिए कोई खास सेंटर नहीं हैं. बस ऑपरेटरों ने कमेटी को बताया कि उन्हें अनिवार्य फिटनेस टेस्ट के दौरान इन स्विच की टेस्टिंग के लिए हर गाड़ी पर 2,500 से 25,000 रुपये तक देने पड़ते हैं.

जेडीयू के संजय झा की अध्यक्षता वाली ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर पर बनी पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने हाल ही में रिपोर्ट पेश की है. 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 के निर्भया मामले के बाद महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए ये बटन लगाना जरूरी कर दिया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क परिवहन मंत्रालय ने कमेटी को बताया कि कई राज्यों में इस सिस्टम को इमरजेंसी रिस्पॉन्स नंबर 112 से जोड़ दिया गया है. इसमें यह भी कहा गया है कि कई बार गलत अलार्म बजने की घटनाएं हुईं, जिसके चलते कुछ राज्यों ने इन्हें 'बंद' कर दिया. मंत्रालय चाहता है कि यह सिस्टम फिर से शुरू हो, जबकि ऑपरेटर्स का मानना ​​है कि इसे खत्म कर देना चाहिए.

ऑपरेटर और मंत्रालय के बीच विरोधभास!

इमरजेंसी अलर्ट सिस्टम के बारे में एक ऑपरेटर ने एनडीटीवी को बताया कि 2012 की घटनाओं के बाद लागू नियमों के तहत, पिछले दस साल से उनके बेड़े की हर गाड़ी में ₹15 से ₹20 की कीमत वाला यह बटन लगाया गया है. उन्होंने बताया कि इस बटन को दबाने के बाद, मिलने वाले जवाब के लिए कहीं भी कोई रिसीविंग सेंटर नहीं बनाया गया है. हर फिटनेस टेस्ट के दौरान इस इक्विपमेंट और इसकी बार-बार जांच के लिए प्रति व्हीकल ₹2,500 से ₹25,000 तक की फीस ली जाती है.

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एक सदस्य ने कहा कि अगर यह सिस्टम असरदार नहीं है, तो इसके लिए इतना पैसा लेना सही नहीं है. एक और सदस्य ने सवाल उठाया कि क्लोज्ड-सर्किट टेलीविजन यानी CCTV क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए? इस पर  मंत्रालय ने जवाब दिया कि नई बसों में CCTV लगाना जरूरी किया जा रहा है.

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