भारतीय क्रिकेट इतिहास में कई रोचक बात हैं, लेकिन क्या आप कभी सोच सकते हैं कि कोई क्रिकेट बिना रणजी ट्रॉफी का सबसे बड़ा इम्तिहान पास किए बिना ही टीम इंडिया में चयनित हो जाए? किसी भी दौर में यह कितनी मुश्किल बात रही है यह आप इससे समझ सकते हैं कि अमरजीत केपी और केपी भास्कर सहित अनगिनत बल्लेबाजों को सबसे बड़े घरेलू टूर्नामेंट में रनों का अंबार लगाने के बावजूद कभी देश के लिए खेलने का मौका नहीं मिला. वहीं आज के दौरे में देवदत्त पडिक्कल (Devdutt Padikkal) जैसे बल्लेबाज को मेगा टूर्नामेंट में रनों का अंबार लगाने के बाद भारतीय कैप मिली. यहां तक कि क्रिकेट के भगवान को भी 'रणजी ट्रॉफी टेस्ट' से गुजरना पड़ा. ऐसे में यह बहुत ही ज्यादा चौंकाता है कि कुछ खिलाड़ी बिना रणजी ट्रॉफी खेले ही टीम इंडिया के लिए खेलने में सक्षम हो गए. चलिए जान लीजिए कि ये खिलाड़ी कौन-कौन हैं.
भारतीय क्रिकेट इतिहास में कई रोचक बात हैं, लेकिन क्या आप कभी सोच सकते हैं कि कोई क्रिकेट बिना रणजी ट्रॉफी का सबसे बड़ा इम्तिहान पास किए बिना ही टीम इंडिया में चयनित हो जाए? किसी भी दौर में यह कितनी मुश्किल बात रही है यह आप इससे समझ सकते हैं कि अमरजीत केपी और केपी भास्कर सहित अनगिनत बल्लेबाजों को सबसे बड़े घरेलू टूर्नामेंट में रनों का अंबार लगाने के बावजूद कभी देश के लिए खेलने का मौका नहीं मिला. वहीं आज के दौरे में देवदत्त पडिक्कल (Devdutt Padikkal) जैसे बल्लेबाज को मेगा टूर्नामेंट में रनों का अंबार लगाने के बाद भारतीय कैप मिली. यहां तक कि क्रिकेट के भगवान को भी 'रणजी ट्रॉफी टेस्ट' से गुजरना पड़ा. ऐसे में यह बहुत ही ज्यादा चौंकाता है कि कुछ खिलाड़ी बिना रणजी ट्रॉफी खेले ही टीम इंडिया के लिए खेलने में सक्षम हो गए. चलिए जान लीजिए कि ये खिलाड़ी कौन-कौन हैं.
1. बुद्धि कुंदरन
बुद्धिकुरन भारत के पूर्व विकेटकीपर हैं और उन्होंने 1960 में मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया. 1959 में रोहिंटन बारिया अंतर-विश्वविद्यालय ट्रॉफी में उनकी विकेटकीपिंग और बेखौफ आक्रामक बल्लेबाजी देखकर चयनकर्ताओं ने उन्हें सीधे राष्ट्रीय टीम में चुन लिया. वे विकेटकीपर फारूख इंजीनियर के दौर में भारतीय टीम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने और उन्होंने 18 टेस्ट मैच खेले. भारत के लिए खेलने के बाद ही उन्होंने रेलवे और मैसूर की टीमों के लिए अपने रणजी करियर की शुरुआत की थी.
2. लक्ष्मण शिवरामकृष्णन
साल 1983 में केवल 17 वर्ष और 118 दिन की उम्र में सेंट जॉन्स में वेस्टइंडीज जैसी मजबूत टीम के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया. अपनी घातक लेग-स्पिन और गुगली के दम पर उन्होंने अंडर-19 और जूनियर क्रिकेट में तहलका मचाकर सीधे भारतीय टीम में जगह बनाई थी. 1985 के वर्ल्ड बेंचमार्क चैंपियनशिप (ऑस्ट्रेलिया) में भारत को चैंपियन बनाने में उनकी गेंदबाजी की अहम भूमिका थी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने के बाद ही उन्होंने तमिलनाडु के लिए रणजी ट्रॉफी में पदार्पण किया.
3. विवेक राजदान
विवेक राजदान उन दिनों एमआरएफ पेस अकादमी पहुंचे थे. और टीम इंडिया में चयन में उनकी यहां की प्रतिष्ठा ने अहम भूमिका निभाई.
1989 में पाकिस्तान दौरे पर सियालकोट टेस्ट से अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत कीय पेस क्रेडिट स्क्वाड से उभरे राजदान ने टेस्ट डेब्यू से पहले प्रथम श्रेणी स्तर पर केवल 2 ही दिलीप ट्रॉफी मैच खेले थे, लेकिन रणजी का एक भी मुकाबला नहीं खेला था. अपने करियर के दूसरे ही टेस्ट की एक पारी में पाकिस्तान के 5 विकेट झटककर उन्होंने सबको हैरान कर दिया था. हालांकि, इसके बाद वे भारतीय टीम से बाहर हो गए और बाद में दिल्ली व तमिलनाडु के लिए रणजी ट्रॉफी खेले.
4. पार्थिव पटेल
साल 2002 में इंग्लैंड के खिलाफ ट्रेंट ब्रिज में मात्र 17 वर्ष और 153 दिन की उम्र में टेस्ट डेब्यू किया. वे भारत के लिए टेस्ट खेलने वाले सबसे युवा विकेटकीपर बने और उस समय तक उन्होंने एक भी रणजी या प्रथम श्रेणी मैच नहीं खेला था. उनकी इस असाधारण एंट्री की वजह अंडर-19 टीम और भारत 'ए' दौरों पर उनका शानदार प्रदर्शन था. भारत के लिए कुछ मैच खेलने के बाद उन्होंने गुजरात टीम की ओर से अपना पहला रणजी मैच खेला.
5. दिनेश कार्तिक
इन दिनों दिग्गज कमेंटेटरों में शुमार पूर्व विकेटकीपर दिनेश कार्तिक ने सितंबर 2004 में लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ अपना वनडे डेब्यू (ODI) किया, जहां उन्होंने माइकल वॉन को शानदार ढंग से स्टंप किया था. साल 2004 के अंडर-19 विश्व कप और इंडिया 'ए' के दौरों पर बल्ले व दस्तानों से दिखाए कमाल के दम पर उन्हें राष्ट्रीय टीम का सीधा टिकट मिला. भारतीय वनडे टीम में अपनी जगह पक्की करने के बाद ही उन्होंने तमिलनाडु के लिए अपना पहला रणजी ट्रॉफी मुकाबला खेला था.
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