Ajinkya Rahane Life Story Announced Retirement: भारतीय क्रिकेट में कुछ खिलाड़ी आंकड़ों से नहीं, अपने स्वभाव और मुश्किल समय में निभाई गई जिम्मेदारियों से पहचाने जाते हैं. अजिंक्य रहाणे उन्हीं नामों में शामिल हैं. शांत मिजाज, संयमित बल्लेबाजी और टीम के लिए हर परिस्थिति में खड़े रहने वाले रहाणे ने गुरुवार को इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया. करीब एक दशक तक भारतीय बल्लेबाजी की मजबूत कड़ी रहे रहाणे ने अपने करियर में कई ऐसी पारियां खेलीं, जो भारतीय क्रिकेट के इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं. लेकिन इस सफर की शुरुआत किसी बड़े मैदान से नहीं, बल्कि मुंबई की भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन से हुई थी.
सात साल का बच्चा, कंधे पर किट बैग और जिंदगी का पहला इम्तिहान
रहाणे जब सिर्फ सात साल के थे, तब क्रिकेट की प्रैक्टिस के लिए रोज घर से स्टेडियम जाना पड़ता था. पहले दिन उनके पिता उन्हें छोड़ने गए, लेकिन अगले ही दिन उन्होंने बेटे से कहा कि अब उसे अकेले सफर करना होगा. एक छोटे बच्चे के लिए यह आसान फैसला नहीं था. कंधे पर भारी किट बैग और सुबह की भीड़ से भरी लोकल ट्रेन. लेकिन रहाणे ने हिम्मत नहीं हारी. सालों बाद उन्हें पता चला कि वह सफर वास्तव में कभी अकेले नहीं था. उनके पिता दूसरे डिब्बे में बैठकर पूरे रास्ते उन पर नजर रखते थे ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद कर सकें. यही वह पल था जिसने रहाणे की सोच बदल दी.
पिता के त्याग ने बदल दी जिंदगी
जब रहाणे को इस बात का पता चला तो उन्होंने खुद से एक वादा किया. उन्होंने तय किया कि अब क्रिकेट सिर्फ उनका सपना नहीं रहेगा, बल्कि अपने माता-पिता के त्याग का जवाब भी होगा. रहाणे ने बाद में स्वीकार किया कि उसी दिन से हर मैच उनके लिए सिर्फ रन बनाने का नहीं, बल्कि अपने परिवार का सम्मान बढ़ाने का माध्यम बन गया. यही सोच उनके पूरे करियर की सबसे बड़ी ताकत बनी.
घरेलू क्रिकेट से टीम इंडिया तक का सफर
मुंबई क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन के दम पर रहाणे ने भारतीय टीम का दरवाजा खटखटाया. तकनीक, धैर्य और लंबी पारी खेलने की क्षमता ने उन्हें जल्दी ही टेस्ट टीम का अहम बल्लेबाज बना दिया. विदेशी पिचों पर जहां कई बल्लेबाज संघर्ष करते थे, वहीं रहाणे ने अपनी बल्लेबाजी से अलग पहचान बनाई. तेज गेंदबाजों के खिलाफ उनका आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों में रन बनाने की आदत टीम इंडिया के लिए बड़ी ताकत बन गई.
जब जिम्मेदारी आई, रहाणे सबसे आगे खड़े मिले
रहाणे का करियर सिर्फ रनों तक सीमित नहीं रहा. जब भी भारतीय टीम मुश्किल में फंसी, उन्होंने जिम्मेदारी उठाई. ऑस्ट्रेलिया दौरे पर कप्तानी करते हुए भारत को ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज जिताना उनके करियर का सबसे यादगार अध्याय माना जाता है. कई सीनियर खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी में उन्होंने युवा टीम का नेतृत्व किया और ऐसा इतिहास रचा जिसे भारतीय क्रिकेट लंबे समय तक याद रखेगा. उनकी कप्तानी में टीम ने दिखाया कि शांत स्वभाव वाला खिलाड़ी भी सबसे बड़े मंच पर मजबूत नेता बन सकता है.
करियर के आखिरी दौर में भी नहीं छोड़ा क्रिकेट
इंटरनेशनल टीम से बाहर होने के बाद भी रहाणे ने क्रिकेट से दूरी नहीं बनाई. उन्होंने घरेलू क्रिकेट में मुंबई का नेतृत्व किया और लगातार खेलते रहे. युवा खिलाड़ियों के लिए वह अनुभव और अनुशासन की मिसाल बने रहे. उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और न ही वापसी की उम्मीद छोड़ी. यही रवैया उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाता है.
आंकड़ों से कहीं बड़ा है रहाणे का योगदान
रहाणे ने भारत के लिए 85 टेस्ट, 90 वनडे और 20 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले. उनके नाम हजारों अंतरराष्ट्रीय रन दर्ज हैं, लेकिन उनकी असली पहचान उन पारियों से बनी जो टीम के सबसे कठिन समय में आईं. वह उन खिलाड़ियों में रहे जिन्होंने शोर से ज्यादा अपने बल्ले को बोलने दिया.
भारतीय क्रिकेट का शांत योद्धा
हर खिलाड़ी का करियर एक दिन खत्म होता है, लेकिन कुछ कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं. अजिंक्य रहाणे की कहानी भी ऐसी ही है. सात साल का एक बच्चा, जो पिता के भरोसे के सहारे मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर करना सीखता है, वही आगे चलकर भारत की टेस्ट टीम की कप्तानी करता है और देश को यादगार जीत दिलाता है.
अब उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया है, लेकिन उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा यह संदेश देता रहेगा कि बड़े खिलाड़ी सिर्फ प्रतिभा से नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और परिवार के त्याग से बनते हैं.
(IANS इनपुट के साथ)
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