- आम आदमी को बजट 2026 से महंगाई में राहत और रोजगार के ठोस मौके की उम्मीद.
- स्वास्थ्य, शिक्षा, गांवों और छोटे कारोबार पर ज्यादा निवेश की मांग तेज.
- ईंधन कीमतों और वैश्विक संकट से निपटने के लिए मजबूत आर्थिक रणनीति की दरकार.
बजट से पहले का समय हमेशा उम्मीदों, चर्चाओं और आकलनों से भरा होता है, लेकिन इस बार इसकी अहमियत और भी अधिक है. एक ओर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक अनिश्चितताएं, महंगाई का दबाव, रोजगार सृजन की चुनौती और क्षेत्रीय असमानताएं सरकार के सामने बड़ी कसौटी पेश कर रही हैं. इसके साथ ही कुछ राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह बजट आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
1 फरवरी 2026 को लगातार नौवीं बार वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश करेंगी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण. यह उपलब्धि ऐतिहासिक इसलिए भी है क्योंकि कोई भी अन्य वित्त मंत्री लगातार नौ साल तक बजट पेश नहीं कर पाया है. हालांकि मोरारजी देसाई ने कुल 10 बजट प्रस्तुत किए थे, लेकिन वे लगातार नहीं थे.
भारत की इकोनॉमी जिसके FY27 में लगभग 7.4% बढ़ने का अनुमान है मौकों और दबावों के चौराहे पर खड़ी है, जिसमें धीमी होती खेती की ग्रोथ, ग्लोबल ट्रेड तनाव और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की जरूरत शामिल है. उम्मीद है कि आने वाला बजट कुछ खास क्षेत्रों में नीतिगत निवेश, ढांचागत सुधार और लक्षित राहत उपायों का मिला-जुला देगा.
खाद्य सुरक्षा से लेकर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र (इनोवेशन इकोसिस्टम) को मजबूत करने तक का लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार को एक ऐसी राजकोषीय रुपरेखा तैयार करने की आवश्यकता है जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति दे एवं देश के सामाजिक-राजनीतिक हित की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके.
इस पृष्ठभूमि में यह स्वाभाविक है कि देश के विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, उद्योग, रक्षा, अनुसंधान एवं विकास, संगठित और असंगठित क्षेत्र से जुड़ी बड़ी उम्मीदें इस बजट से की जा रही हैं.
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कृषि की दिशा में बजट से उम्मीद
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान कई दृष्टिकोण से आज भी बेहद महत्वपूर्ण है. हालांकि, हाल के आकड़ों से पता चलता है कि खेती की ग्रोथ कुल GDP बढ़ोतरी से पीछे रही है, और दूसरे सेक्टर्स के मुकाबले इसमें मामूली बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में वित्तीय वर्ष 2025 के बाद, जहाँ खेती को ₹1.5 लाख करोड़ से ज्यादा का आवंटन मिला, 2026–27 के बजट में उत्पादकता और क्लाइमेट रेजिलिएंस दोनों को बढ़ाने के लिए खर्च और बढ़ने की उम्मीद है.
• खेती की रिसर्च, क्लाइमेट-स्मार्ट टेक्नोलॉजी, डिजिटल खेती और बीजों के विकास के लिए ज्यादा फंडिंगआवंटन की उम्मीद है.
• आधुनिक भण्डारण, कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर और बढ़ी हुई खाद्य प्रसंस्करण क्षमता मुख्य केंद्र हो सकते हैं, जिनका मकसद बर्बादी कम करना, कीमतों को स्थिर करना और सप्लाई चेन को मजबूत करना है.
• किसानों की बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाने, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को मजबूत करने और खेती से होने वाली इनकम बढ़ाने के लिए फसल डाइवर्सिफिकेशन को बढ़ावा देने की योजना को भी विचाराधीन रखा जा सकता है जिससे विश्व बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी.
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शिक्षा के क्षेत्र में बजट से उम्मीद
भारत सरकार मानव संसाधन विकास के लिए निरंतर जरूरी नीतिगत बदलाव कर रही है. उच्च शिक्षा तक पहुंच और अवसरों में विस्तार एक प्रमुख लक्ष्य अनुमानित है जिसके तहत मेडिकल, STEM, रिसर्च सेंटर आदि में सीटों की संख्यां को बढ़ाने की उम्मीद है. NEP 2020 जिसमें व्यवसायिक शिक्षा, डिजिटल लर्निंग और टीचर ट्रेनिंग शामिल हैं उसे सफलतापूर्वक लागू करने के लिए ज्यादा आवंटन मिलना चाहिए.
आज कौशल विकास और डिजिटल संरचना को महिलाओं, ग्रामीण युवाओं और पिछड़े समूहों के लिए रोजगार के अवसरों को सुनिश्चित करने की दिशा में प्रमुख मध्यम के तौर पर देखा जा रहा है.
उद्योग एवं शैक्षिक संस्थानों की सहसंलग्नता के जरिए संयुक्त शोध, इंटर्नशिप और रोजगार के अवसर का सृजन कर शिक्षा और रोजगार केअवसर के बीच के अंतर को कम किया जा सकता है, लेकिन इसे प्रोत्साहन देने के लिए इन्सेंटिव आधारित साझेदारी की आवश्यकता है जिसके लिए अधिक धनराशि का आवंटन अपेक्षित है.
यह बजट शिक्षा और कौशल में रणनीतिक निवेश के जरिए, भारत की बड़ी लेबर फोर्स को भविष्य के लिए तैयार किया जा सकता है, जिससे तकनीक, निर्माण, सेवा और नवाचार के क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा मिलेगा.
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आधारभूत संरचना के क्षेत्र में उम्मीद
भारत की आधारभूत संरचना सड़क, रेलवे, शहरी यातायात, डिजिटल नेटवर्क और हरित बुनियादी ढाँचे के सहारे वृहद् पैमाने पर आधुनिकीकरण की तरफ बढ़ रहा है जो आर्थिक गतिविधियों को बढ़ने के साथ ही निवेश आयात और रोजगार के साधन का सृजन करता है.
आगामी वर्ष में पूंजीगत व्यय में वृद्धि होने की संभावना है, जो शायद ₹12 लाख करोड़ से ज्यादा हो सकता है. इससे भारतमाला, PM ग्राम सड़क योजना IV और रेलवे मॉडर्नाइजेशन जैसे मेगा प्रोग्राम को सपोर्ट मिलेगा. स्मार्ट सिटीज और अर्बन मोबिलिटी: मेट्रो रेल नेटवर्क, AMRUT 2.0 और सस्ते घरों के लिए बढ़ी हुई फंडिंग से शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा और ब्रॉडबैंड रोजगार भी पैदा होगा.
लॉजिस्टिक्स पार्क और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर (रिन्यूएबल और ग्रिड एन्हांसमेंट सहित) के एक्सपेंशन से सामान लाने-ले जाने की लागत कम होगी और कॉम्पिटिटिवनेस बेहतर होगी.
हेल्थकेयर: सबको स्वास्थ्य सुविधाएं
स्वास्थ्य का विषय दुनिया भर की सरकारों के लिए नीति का मुख्य विषय बना हुआ है. खासकर महामारी के बाद, दुनिया के तमाम देश अच्छी स्वास्थ्य सेवा एवं स्वास्थ्य सम्बंधित किसी भी संकट से निपटने की क्षमता को सुनिश्चित करने को लेकर गंभीर बने हुए हैं. इस क्रम में खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं विस्तृत, मजबूत एवं सुगम बनाने के लिए ज्यादा आवंटन की उम्मीद है.
टेली-मेडिसिन और डिजिटल हेल्थ के विस्तार, जरूरी दवा और डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग को प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत लाने के लिए जिससे आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, उसके साथ साथ उन्नत उपचार एवं अनुसन्धान को बढ़ावा देने के लिए बजट का आकार बढ़ाना होगा.
केयर की क्वालिटी और पहुच दोनों को बढ़ाकर, बजट जीवन के नतीजों को बेहतर बनाएगा और घरों पर बोझ कम करेगा यह एक राजनीतिक और सामाजिक रूप से असरदार मकसद है.
रिसर्च और डेवलपमेंट: इनोवेशन को बढ़ावा देना
सरकार का भारत को पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने और तकनिकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य पूरा करने के लिए सभी आर्थिक क्षेत्रों के शोध-अनुसन्धान मदों पर निवेश को बढ़ाना होगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उन्नति देश की
प्रतिस्पर्धात्मकता तय करेंगी. उद्योग जनित नवाचार एवं सहयोगात्मक शोध को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त आवंटन की आवश्यकता है.
लघु माध्यम उद्योग क्षेत्र की उम्मीदें
उद्योग जगत, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र, आगामी केंद्रीय बजट से कई ठोस अपेक्षाएं रखता है, क्योंकि यही क्षेत्र देश में सबसे अधिक रोजगार सृजन करता है. MSME इकाइयां वर्तमान में पूंजी की कमी, महंगे ऋण, तकनीकी पिछड़ेपन और बाजार तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं.
ऐसे में उद्योग जगत की प्रमुख अपेक्षा है कि बजट में सस्ती और सुलभ ऋण व्यवस्था को और मजबूत किया जाए, विशेषकर क्रेडिट गारंटी योजनाओं का विस्तार हो. इसके अलावा, कर अनुपालन को सरल करने, जीएसटी रिटर्न प्रक्रिया में राहत देने और छोटे उद्यमों के लिए टैक्स इंसेंटिव प्रदान करने की मांग है.
MSME को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के लिए टेक्निकल अपग्रेडेशन, डिजिटलाइजेशन और स्किल डेवलपमेंट पर विशेष प्रावधान अपेक्षित हैं. साथ ही, सरकारी खरीद में MSME की हिस्सेदारी बढ़ाने और देरी से भुगतान की समस्या के समाधान पर भी उद्योग जगत की निगाहें टिकी हैं.
उद्योग जगत की अपेक्षाएं विशेष रूप से परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र से भी जुड़ी हुई हैं. रेलवे के संदर्भ में उद्योग जगत मालभाड़ा युक्तिकरण, निजी निवेश को प्रोत्साहन, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के विस्तार तथा स्टेशन पुनर्विकास परियोजनाओं के लिए अधिक आवंटन की उम्मीद कर रहा है.
सड़क क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेसवे, भारतमाला परियोजना और ग्रामीण संपर्क सड़कों के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाने की मांग है, जिससे निर्माण, सीमेंट और स्टील उद्योग को भी बल मिले. उड्डयन क्षेत्र में क्षेत्रीय संपर्क योजना (उड़ान), एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, रखरखाव-मरम्मत-ओवरहॉल (MRO) हब और कर संरचना में राहत की अपेक्षा जताई जा रही है. कुल मिलाकर उद्योग जगत चाहता है कि बजट परिवहन अवसंरचना को विकास का इंजन मानते हुए निवेश, रोजगार और लॉजिस्टिक्स दक्षता को प्राथमिकता दे.
कर व्यवस्था को लेकर अपेक्षाएं
बजट से पहले उद्योग जगत की कर व्यवस्था को लेकर कई प्रमुख अपेक्षाएं सामने आती हैं. सबसे पहली अपेक्षा कर दरों में स्थिरता और सरलता की है, ताकि दीर्घकालिक निवेश योजनाएं प्रभावित न हों. उद्योग जगत कॉरपोरेट टैक्स में और युक्तिसंगत सुधार, विशेषकर MSME और स्टार्ट-अप्स के लिए, की मांग कर रहा है. इसके साथ ही GST व्यवस्था को सरल बनाने, दरों के युक्तिकरण, रिफंड प्रक्रिया को तेज करने और अनुपालन बोझ कम करने की अपेक्षा भी प्रमुख है.
निर्यात-उन्मुख उद्योग इनपुट टैक्स क्रेडिट और टैक्स प्रोत्साहनों में निरंतरता चाहते हैं, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत हो. डिजिटल अर्थव्यवस्था और AI-आधारित व्यवसायों के लिए स्पष्ट कर दिशानिर्देश भी उद्योग की प्रमुख मांगों में शामिल हैं. कुल मिलाकर, उद्योग जगत ऐसा कर ढांचा चाहता है जो विकासोन्मुखी, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल हो.
आगामी केंद्रीय बजट ऐसे समय में प्रस्तुत होने जा रहा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और घरेलू विकासात्मक आकांक्षाओं के बीच संतुलन साधने की चुनौती का सामना कर रही है.
प्री-बजट विमर्श से यह स्पष्ट है कि सरकार से अपेक्षा केवल आंकड़ों के प्रबंधन की नहीं, बल्कि दूरदर्शी दृष्टिकोण की है, जो समावेशी, सतत और रोजगारोन्मुखी विकास को सुनिश्चित कर सके. कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना, अनुसंधान एवं नवाचार जैसे क्षेत्रों में लक्षित निवेश न केवल विकास की गति बढ़ाएंगे, बल्कि सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन को भी सुदृढ़ करेंगे.
संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के लिए नीति समर्थन, कर संरचना में स्थिरता और एमएसएमई को पूंजी व तकनीक तक बेहतर पहुँच अर्थव्यवस्था की जड़ों को मजबूत कर सकती है. साथ ही, रेलवे, सड़क, उड्डयन और डिजिटल अवसंरचना में पूंजीगत व्यय भारत को लॉजिस्टिक्स दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता की नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है. कुल मिलाकर, यह बजट केवल वित्तीय दस्तावेज न होकर भारत के विकास पथ का रोडमैप होना चाहिए, जो अल्पकालिक राजनीतिक आवश्यकताओं के साथ-साथ दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को भी समान रूप से साधे.
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