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भारत में E20 पर बवाल तो ब्राजील ने कैसे किया कारों में E100 का कमाल

भारत में E25, E30 फ्यूल को लेकर परीक्षण किया जा रहा है. वहीं सरकार E85 और E100 फ्यूल को मान्यता देने के लिए मोटर वाहन नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है.

भारत में E20 पर बवाल तो ब्राजील ने कैसे किया कारों में E100 का कमाल
एथेनॉल फ्यूल की तैयारी (एआई इमेज)

भारत में एथेनॉल फ्यूल को लेकर काफी बवाल मचा है. भारत सरकार ने E20 फ्यूल यानी 80 प्रतिशत पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण वाले फ्यूल को लागू किया है. वहीं अब सरकार ने E25, E30, E85 और E100 लागू करने की तैयारी में है. जिसके बाद से देश में इसका विरोध शुरू हो गया है. लोगों का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से उनके वाहन खराब हो रहे हैं. यह भी कहना है कि अगर E20 का प्रभाव वाहनों के इंजन और माइलेज पर रहा है तो फिर E25, E30, E85 और E100 से वाहनों का क्या हाल होगा. वहीं कुछ लोगों की मांग है कि भारत में E20 फ्यूल को विकल्प के तौर पर रखना चाहिए. लेकिन देश के सभी पेट्रोल पंप पर केवल E20 फ्यूल ही मिल रहे हैं.

एथेनॉल के इस्तेमाल की अलगे चरण की तैयारी

सरकार की ओर से  E25, E30 फ्यूल को लेकर परीक्षण किया जा रहा है. वहीं सरकार E85 और E100 फ्यूल को मान्यता देने के लिए मोटर वाहन नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है. सरकार का यह कदम साफ है कि देश में एथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए अगले चरण की तैयारी कर रही है. हालांकि इस बवाल के बीच ब्राजील देश की चर्चा भी खूब हो रही है. जहां बड़े पैमाने पर दशकों से हाई-एथेनॉल मिश्रित फ्यूल का इस्तेमाल किया जा रहा है.

ब्राजील में एथेनॉल फ्यूल क्यों है सफल

ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट विक्रम गौर बताते है कि, अगर आप बायोफ्यूल को असल में कैसे काम में लाया जाए यह समझना चाहते हैं तो ब्राजील इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. उन्होंने वैकल्पिक ऊर्जा को अचानक नहीं अपनाया. बल्कि इसे ज़मीनी स्तर से विकसित किया. 1970 के दशक से शुरू हुए पचास साल के सफर में, देश ने सफलतापूर्वक गन्ने के खेतों को ईंधन के एक बड़े रणनीतिक भंडार में बदल दिया. उनके सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी इसकी कार्यक्षमता है. प्रोसेसिंग मिलें बिजली बनाने के लिए गन्ने के बचे हुए हिस्सों (जिन्हें 'बैगास' कहा जाता है) को जलाती हैं. 

इससे एक ऐसा आत्मनिर्भर चक्र बनता है जो पेट्रोल की तुलना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 60% से ज़्यादा कम कर देता है. इस 'ग्रीन बदलाव' ने उनकी अर्थव्यवस्था को धीमा नहीं किया, बल्कि उसे और तेज़ किया. जब उन्होंने 2003 में फ्लेक्स-फ्यूल इंजन पेश किए, तो आम ड्राइवरों को किसी भी पंप पर इथेनॉल और पेट्रोल में से चुनने की पूरी आज़ादी मिल गई, जिससे पूरा देश वैश्विक तेल संकट के असर से सुरक्षित रहा.

भारत में हम तेज़ी से अपने इथेनॉल ब्लेंडिंग रोडमैप को आगे बढ़ा रहे हैं और देश भर में E20 नियमों को लागू कर रहे हैं, ऐसे में ब्राजील हमारे लिए एक बेहतरीन वास्तविक उदाहरण है. वे साबित करते हैं कि समझदारी भरी नीति, स्थानीय खेती और मजबूत ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग की मदद से पूरे देश को गतिमान रखा जा सकता है, बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए.

फ्यूल चुनने की नीति 

ब्राजील में फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के चलन का बड़ा कारण सरकारी प्राइस सपोर्ट भी है. जिससे एथेनॉल मिश्रित फ्यूल यहां पेट्रोल की तुलना में सस्ता मिलता है. इसका यह भी फायदा है कि कस्टमर फ्यूल की प्राइस के मुताबिक चुन सकते हैं. 

भारत और ब्राजील की नीति में सबसे बड़ा अंतर फ्यूल चुनने का ही है. भारत में फिलहाल पेट्रोल पंपों पर कस्टमर के पास अलग-अलग ईंधन चुनने का ऑप्शन नहीं है. जबकि ब्राजील में दशकों से यह व्यवस्था लागू है. 

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