देश में पेट्रोल-डीजल के दाम क्या जल्द ही बढ़नेवाले हैं. अब ये केवल हवाई चर्चा नहीं रही है, बल्कि वित्त मंत्रालय ने अपनी सितंबर की मासिक आर्थिक समीक्षा में भी बढ़ते जियो-पॉलिटिकल टेंशन और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को भारतीय इकोनॉमी के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल-गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव से इंपोर्टेड महंगाई, करेंसी और कैपिटल फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है.
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी सप्लाई की अनिश्चितता ने भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को फिर चर्चा में ला दिया है. खासकर कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल का असर भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर पड़ सकता है.
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सितंबर में कच्चा तेल 28.66% महंगा
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में इंडियन क्रूड बास्केट की औसत कीमत 116.04 डॉलर प्रति बैरल रही. अगस्त में ये कीमत 90.19 डॉलर प्रति बैरल थी.
यानी सिर्फ एक महीने में औसत कीमत 25.85 डॉलर प्रति बैरल, यानी करीब 28.66% बढ़ गई. 29 सितंबर को इंडियन क्रूड बास्केट की कीमत 116.52 डॉलर प्रति बैरल थी.
ये उछाल भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए अहम है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता.
हॉर्मुज में तनाव क्यों है इतना बड़ा संकट?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम एनर्जी चोकपॉइंट्स में से एक है. हालांकि संकट के दौरान भारत ने अपनी सप्लाई को दूसरे देशों और रूट्स की तरफ मोड़ने की कोशिश की है, फिर भी पश्चिम एशिया भारत के ऊर्जा आयात का महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है.
सितंबर में पश्चिम एशियाई देशों से भारत को मिलने वाली सप्लाई फिर बढ़ी. Kpler के आंकड़ों के मुताबिक इस महीने भारत के LPG आयात में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 60% से ज्यादा, LNG में करीब 47% और क्रूड में करीब 40% रही.
LPG के मामले में निर्भरता खास तौर पर अहम है. भारत अपनी LPG खपत का करीब 60% आयात करता है और संकट से पहले इस आयात का बड़ा हिस्सा हॉर्मुज के रास्ते आता था.
LPG सप्लाई में रुकावट का सीधा असर घरों पर
कच्चे तेल के मुकाबले LPG सप्लाई में व्यवधान का असर आम परिवारों तक ज्यादा तेजी से पहुंच सकता है. LPG का इस्तेमाल घरेलू खाना पकाने के अलावा कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर में भी होता है.
इसी वजह से 2026 में हॉर्मुज संकट के दौरान भारत ने LPG की सप्लाई को प्राथमिकता दी और अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस जैसे दूसरे स्रोतों से खरीद बढ़ाई. सरकार ने रिफाइनरियों को LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश भी दिए थे.
महंगा तेल सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कहानी नहीं
कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने का असर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर पड़ सकता है.
ट्रांसपोर्ट से लेकर एविएशन, लॉजिस्टिक्स, पेट्रोकेमिकल्स, मैन्युफैक्चरिंग और कृषि तक में ईंधन और ऊर्जा की लागत बढ़ सकती है. इसका असर कंपनियों की लागत पर पड़ता है और आगे चलकर महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.
वहीं, ज्यादा महंगा तेल भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ाता है. इससे चालू खाते और रुपये पर दबाव बढ़ने का जोखिम रहता है. वित्त मंत्रालय ने भी ऊंचे क्रूड और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बताया है.
भारत ने शुरू की सप्लाई डायवर्सिफिकेशन
हॉर्मुज पर जोखिम कम करने के लिए भारत ने पिछले कुछ महीनों में अपनी एनर्जी सोर्सिंग में बदलाव किया है.
क्रूड के अलावा LPG और LNG के लिए भी अमेरिका और दूसरे देशों से खरीद बढ़ाने की कोशिश हुई है. जुलाई में सामने आई जानकारी के मुताबिक भारत 2027 में अपने LPG आयात का 25% तक अमेरिका से हासिल करने की योजना पर काम कर रहा था.
वहीं, सितंबर में भी भारत को अमेरिका और अन्य स्रोतों से LPG मिलने का सिलसिला जारी रहा. इससे पश्चिम एशिया पर पूरी तरह निर्भर रहने का जोखिम कम करने की कोशिश दिखती है.
आगे की चुनौती क्या है?
भारत के लिए चुनौती सिर्फ ये नहीं है कि कच्चा तेल कहां से खरीदा जाए. असली चुनौती ये है कि अगर किसी एक प्रमुख समुद्री रास्ते में लंबे समय तक व्यवधान रहता है, तो तेल, LPG और LNG की सप्लाई को कितनी तेजी से दूसरे रास्तों और देशों की तरफ मोड़ा जा सकता है.
इसीलिए वैकल्पिक सप्लाई रूट, बंदरगाह, पाइपलाइन और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है.
फिलहाल भारत ने अपनी खरीद को डायवर्सिफाई किया है और सप्लाई को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाया है. लेकिन अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबे समय तक बना रहता है और क्रूड 100 डॉलर से ऊपर रहता है, तो महंगाई, आयात बिल और रुपये पर दबाव भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अहम चुनौती बने रह सकते हैं.
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