- निखिल कामथ ने भारत के चार उद्योगों की पानी की भारी खपत पर चिंता जताई
- कामथ ने कहा कि पानी की सही कीमत तय न होने और मीटरिंग न होने से डिमांड और सप्लाई में असंतुलन बढ़ रहा है
- भारत में पानी की मीटरिंग और उचित मूल्य निर्धारण जरूरी, क्योंकि पानी की कमी अब आर्थिक चुनौती बन चुकी है
भारत एआई और टेक्नोलॉजी सेक्टर में तरक्की कर रहा है. देश में टेक कंपनियां डेटा सेंटर बना रही हैं. लेकिन ये टेक क्रांति भारत के भविष्य को भी खतरे में डाल रही हैं. इसे लेकर चिंता जताई है देश के सबसे युवा अरबपति और जिरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ ने. भारत आज जिन चार सबसे बड़े सेक्टर्स फूड प्रोसेसिंग, फार्मास्यूटिकल्स, न्यूक्लियर एनर्जी और डेटा सेंटर्स के दम पर आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी 'पानी की भारी खपत' है. कामथ ने चिंता जताई है कि ये उद्योग उन्हीं राज्यों में लगाए जा रहे हैं जो पहले से सूखे की कगार पर हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि जब तक हम पानी की एक-एक बूंद की सही कीमत तय करके उसकी मीटरिंग नहीं करेंगे, तब तक हमारा अंधाधुंध विकास देश को एक बड़े जल संकट की ओर धकेलता रहेगा.
पानी की खपत वाले उद्योग बढ़ रहे
निखिल कामथ ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि भारत के 'विकास के चार सबसे बड़े दांव' ऐसे उद्योग हैं जिनमें बहुत ज्यादा पानी की खपत होती है. ये तेजी से उन राज्यों में बनाए जा रहे हैं जो पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि पानी की सही कीमत तय करने और मीटरिंग न करने की वजह से डिमांड और सप्लाई के बीच असंतुलन बढ़ गया है.
इसमें बताया गया है कि जहां कच्चे तेल के फ्यूचर्स की ट्रेडिंग 1983 में शुरू हुई और कार्बन क्रेडिट बाजार 2005 में आए, वहीं दुनिया का पहला बड़ा वॉटर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट 2020 में CME ग्रुप द्वारा पेश किया गया था. इससे पता चलता है कि मुख्यधारा के बाजार की चर्चाओं में पानी का मुद्दा कितनी देर से शामिल हुआ है.
कई देशों ने पानी के प्रबंधन के लिए बनाए नियम
कामथ का ग्राफिक उन देशों की ओर भी इशारा करता है जिन्होंने पानी के प्रबंधन के लिए कड़े कदम उठाए हैं. उदाहरण के लिए, इजरायल कंज्यूमर्स से पानी की आपूर्ति की पूरी लागत के करीब पैसे लेता है और उसने दुनिया में पानी रीसाइकिल करने की सबसे ऊंची दरों में से एक हासिल की है, जहां लगभग 90% अपशिष्ट जल का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है.
सिंगापुर ने, प्राकृतिक मीठे पानी के संसाधनों की कमी के बावजूद, बड़े पैमाने पर रीसाइकिलिंग और डिसेलिनेशन यानी खारे पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया के जरिए एक आत्मनिर्भर सिस्टम विकसित किया है.
चार्ट के अनुसार, देश की जरूरतों का लगभग 40% हिस्सा रीसाइकिल किए गए पानी से पूरा होता है, जबकि डिसेलिनेशन का योगदान 25% है.
चिली एक अलग मॉडल पेश करता है. दक्षिण अमेरिकी देश ने 1981 में पानी के अधिकारों का निजीकरण कर दिया, जिससे चुनिंदा निजी संस्थाओं को उनका मालिकाना हक रखने और उनका व्यापार करने की अनुमति मिल गई. हालांकि इस कदम से जमाखोरी बढ़ गई, इसके लिए इस नीति को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा था.
— Nikhil Kamath (@nikhilkamathcio) June 18, 2026
एशिया में पानी के बाजार विकसित करने में क्या दिक्कत?
चार्ट में तर्क दिया गया है कि एशिया में पानी के बाजार विकसित करने में संघर्ष करना पड़ा है क्योंकि पानी एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है और आपूर्ति की चुनौतियां बहुत हद तक स्थानीय स्तर की होती हैं.
कामथ का मानना है कि भारत एक अहम मोड़ पर पहुंच रहा है. पानी की ज्यादा खपत वाले उद्योगों के तेजी से बढ़ने और शहरी इलाकों में समय-समय पर पानी की कमी से जूझने की स्थिति को देखते हुए, उनका तर्क है कि पानी की मीटरिंग, कीमत तय करना और उसका सही बंटवारा और भी जरूरी हो जाएगा. उन्होंने लिखा, 'इस संसाधन की कोई कीमत तय नहीं है. मीटरिंग तो अभी शुरू ही हो रही है.'
कामथ के नजरिए से, तेजी से बढ़ती मांग और सीमित सप्लाई के बीच का अंतर अब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी चिंता नहीं रह गया है. यह एक आर्थिक चुनौती है जो भारत में अगली पीढ़ी के व्यवसायों की दिशा तय कर सकती है.
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