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ITR में फॉर्म 122 और 124 का समझ ले फंडा, नहीं फंसेगा पैसा और टाइम से मिलेगा रिफंड

सैलरीड पर्सन के लिए इनकम टैक्स कैलकुलेशन को आसान बनाने और टाइम पर रिफंड पाने के लिए फॉर्म 122, 124 का सही इस्तेमाल जरूरी है. जानिए टैक्स झटके से बचने के लिए जरूरी टिप्स.

ITR में फॉर्म 122 और 124 का समझ ले फंडा, नहीं फंसेगा पैसा और टाइम से मिलेगा रिफंड

देश में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल का प्रोसेस शुरू हो चुका है. टैक्स डिपार्टमेंट अपनी ऑफिशियल बेवसाइट पर आईटीआर से जुड़े फॉर्म लगातार निकाल रहा है. देश के अंदर मिडिल क्लास और सैलरिड पर्सन की कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स में जाता है. ऐसे में टैक्स कैलकुलेशन का प्रोसेस लंबा और जटिल समझा जाता है. हालांकि पिछले कुछ समय में डिपार्टमेंट ने इसके प्रोसेस को आसान बनाने के लिए कई नियमों में बदलाव किया है. लेकिन इसके बाद भी जानकारी के अभाव में या गलत कैलकुलेशन के चलते कंपनी कई बार ज्यादा टीडीएस काट लेती है. इतना ही नहीं लापरवाही की वजह से टैक्सपेयर्स को इनकम टैक्स के डिमांड नोटिस का भी सामना करना पड़ सकता है.

इन सभी झंझटों से बचने के लिए टैक्स पेयर्स को वित्त वर्ष की पहली तिमाही से ही टैक्स प्लानिंग शुरू कर देनी चाहिए. इस खबर में जानते हैं कि इनकम टैक्स रूल्स के जरिए किन बातों को ध्यान में रखा जाए, जिससे समय के अंदर अपने टीडीएस रिफंड को ले सकें. 

फॉर्म 122 और 124 के गणित को समझें

टैक्स कैलकुलेशन को सही बनाने के लिए सबसे पहले इनकम टैक्स रूल्स में शामिल फॉर्म 122 और 124 को समझना बहुत जरूरी है. इन दोनों फॉर्म के जरिए ही पता चलता है कि किसी करदाता पर कितना टैक्स बना है. इसलिए अगर इन दोनों फॉर्म में ही गड़बड़ी हो गई तो समझ लीजिए आगे चलकर रिफंड का मामला फंसने वाला है. 

क्या है फॉर्म नंबर 122?

फॉर्म नंबर 122 के जरिए कंपनी को आपके टीडीएस की सही जानकारी मिलती है.  अगर आपने करेंट फाइनेंशियल ईयर में नौकरी बदली है तो पिछली कंपनी से मिली सैलरी, उस पर कटा हुआ टीडीएस या फिर दूसरे सोर्स से होने वाली कमाई (बैंक की ब्याज, कैपिटल गेंस) के बारे में मौजूदा कंपनी को पता इसी फॉर्म के जरिए चलता है. इसके अलावा अगर आपके किसी पेमेंट पर टीसीएस कटा है तो वो भी जानकारी इसमें जाती है. इसलिए समय-समय पर फॉर्म 122 की जानकारी को अपडेट करना जरूरी होता है. ऐसा करने से आपकी नई कंपनी सटीक टीडीएस काट पाती है. ऐसे में साल के आखिर में आप किसी बड़ी टैक्स लायबिलिटी से बच पाते हैं.

फॉर्म 124 का मामला समझें

जैसा आपके बताया कि फॉर्म 122 टैक्सपेयर्स की टोटल इनकम के बारे में बताता है. वहीं फॉर्म 124 आपके टैक्स को कम करने में मदद करता है. इस फॉर्म के जरिए आपकी कंपनी को हाउस रेंट अलाउंस, लीव ट्रैवल कंसेशन, होम लोन पर चल रही ब्याज और दूसरे डिडक्शन (80 C से 80 U) के बारे में पता चलता है. यानी आप कौन-कौन सी टैक्स छूट योजनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, ये आसानी से कंपनी जान पाती है. कंपनी इसके बाद टोटल इनकम में से इन डिडक्शन को कम करके नेट टैक्सेबल इनकम पर टीडीएस निकालती है.

पर एक बात यहां ये समझ लीजिए कि किसी भी निवेश जैसे पीपीएफ, एनएससी या होम लोन या एचआरए पर टैक्स डिडक्शन क्लेम करने के लिए वैलिड प्रूफ होने चाहिए. अगर समय पर ये प्रूफ नहीं दे पाते हैं तो जानकारी के अभाव में कंपनी जनवरी-मार्च तिमाही में सैलरी से ज्यादा टीडीएस काट लेगी.

एडवांस टैक्स की डेडलाइन से पहले इन बातों का ध्यान रखें

इन बातों के अलावा टैक्सपेयर्स को कुछ और बातों को ध्यान में रखना चाहिए. मसलन, फॉर्म 26AS आपकी टैक्स पासबुक के जैसे है. इसमें आपके पैन पर कटे हुए टोटल टीडीएस और जमा किए टैक्स की पूरी जानकारी होती है. इसके अलाना एनुअल इन्फॉरमेशन स्टेटमेंट में सभी बड़े ट्रांजेक्शन स्टॉक मार्केट से कमाई और सेविंग अकाउंट्स पर मिले ब्याज की जानकरी होती है. इन दोनों स्टेटमेंट्स का मिला कर अपने फॉर्म 122 और 124 से चेक जरूर करें. इससे अगर कम टैक्स जमा हुआ है तो समय रहते उसे चुका सकते हैं.  ऐसे में बड़ी पेनाल्टी और ब्याज से आप बच पाएंगे.

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