अदाणी फाउंडेशन के कार्यक्रम 'अरिस्टोटल-कन्फ्यूशियस सिम्पोजियम 2026' में वर्ल्ड फेमस अर्थशास्त्री प्रो जेफरी सैक्स (Pro Jeffery Sachs) ने अनुमान जताया है कि भारत वर्ष 2100 तक दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी बन सकता है. उन्होंने इसे मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर की वापसी बताया. उत्तर प्रदेश के वाराणसी में आयोजित सिम्पोजियम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस सदी के अंत तक भारत की आबादी चीन से करीब दोगुनी हो सकती है.
उन्होंने अनुमान लगाया कि दुनिया की करीब तीन-चौथाई आबादी एशिया और अफ्रीका में रह सकती है. सैक्स के मुताबिक, 2100 तक अफ्रीका की आबादी दुनिया की कुल आबादी का करीब 30% होगी, जबकि एशिया की आबादी आधे से थोड़ी कम रह सकती है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफरी सैक्स ने कहा कि वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. उनके मुताबिक, दुनिया के कुल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 2000 में 5.2% थी, जो 2026 में बढ़कर 8.5% हो गई है. अनुमान है कि 2100 तक ये हिस्सेदारी 15.1% तक पहुंच सकती है.
अदाणी फाउंडेशन के वर्ल्ड सिम्पोजियम में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 8.5%, चीन की 21.3%, अमेरिका की 14.6% और यूरोप की 15.9% है.

2050 तक भारत की हिस्सेदारी 13.1% होने का अनुमान
सैक्स के अनुमानों के मुताबिक, 2050 तक वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी बढ़कर 13.1% हो सकती है. इसी अवधि में चीन की हिस्सेदारी 17.9%, अमेरिका की 10.1% और यूरोप की 11.1% रहने का अनुमान है.
2100 तक भारत की हिस्सेदारी 15.1% तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं चीन की हिस्सेदारी 8%, अमेरिका की 6.6% और यूरोप की 6.3% रह सकती है. इन अनुमानों के आधार पर भारत इन चार प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे होगा.
दुनिया की आर्थिक धुरी फिर एशिया की ओर
आंकड़ों के मुताबिक, विश्व उत्पादन में एशिया की हिस्सेदारी 48.4% हो चुकी है. सैक्स ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलते संतुलन को मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर यानी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वापसी बताया.

ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि 1700 में चीन की वैश्विक उत्पादन में हिस्सेदारी 22.3% और भारत की 20% थी. औद्योगिक दौर में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव बढ़ा. 1950 में अमेरिका की हिस्सेदारी 27.3% और यूरोप की 28.6% थी, जबकि चीन और भारत की हिस्सेदारी घटकर क्रमशः 4.8% और 4.2% रह गई थी.
अब 21वीं सदी में वैश्विक आर्थिक शक्ति का संतुलन फिर एशिया की ओर बढ़ने का अनुमान है.
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