Delhi Burj Khalifa 100 floor buildings: दिल्ली के नए मास्टर प्लान-2047 में एक बात तो साफ हो गई है कि राजधानी का विकास अब हॉरिजैंटल या क्षैतिज नहीं, बल्कि वर्टिकल होगा. दिल्ली में बढ़ने वाली 80 लाख आबादी के लिए फ्लैट ऊपर की ओर बनेंगे. जाहिर है कि इमारतें और ऊंची बनेंगी. मास्टर प्लान को मंजूरी मिलने के साथ ही राजधानी में बहुमंजिली इमारतें बनने का रास्ता साफ हो गया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि भविष्य में दिल्ली में 100 मंजिला इमारतें भी बन सकती हैं. मानकों का पूरा खयाल रखा जाए तो सरकार को मंजूरी देने में आपत्ति नहीं होगी. और ऐसा हुआ तो दिल्ली में भी बुर्ज खलीफा जैसी इमारतें नजर आ सकती हैं. हालांकि दुबई का बुर्ज खलीफा करीब 828 मीटर यानी 2,717 फीट ऊंचा है और ये 163 मंजिली इमारत हैं.
पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रिषभ पेरिवाल का कहना है कि दिल्ली के मास्टर प्लान में सीधे तौर पर '100 मंजिला इमारत' का उल्लेख नहीं है. ऐसे में ये कहना सटीक नहीं होगा कि ऐसी इमारतों को स्वत: मंजूरी मिल गई है, बल्कि ये कहना ज्यादा सटीक होगा कि 100 मंजिला या उससे अधिक ऊंची इमारतों के लिए पॉलिसी-स्ट्रक्चर का रास्ता आसानी से खुल सकता है. वहीं सिक्का ग्रुप के चेयरमैन हरविंदर सिंह सिक्का के मुताबिक, मास्टर प्लान-2047 में ट्रांजिट कॉरिडोर और हाई डेंसिटी कॉरिडोर में अधिक FAR यानी फ्लोर एरिया रेश्यो की अनुमति दी गई है. यानी पहले की तुलना में अब कम जगह में भी हाई राइज बिल्डिंग्स बनाई जा सकेगी.
कहां बन सकती हैं ऊंची इमारतें?
दिल्ली के नए मास्टर प्लान-2047 ने राजधानी में बहुमंजिली इमारतें बनने की संभावना बढ़ा दी है. मास्टर प्लान में TOD यानी ट्रांजिट ऑरिएंटेड डेवलपमेंट (Transit-Oriented Development) और HDC यानी हाई डेंसिटी कॉरिडोर (High Density Corridor) जैसे क्षेत्रों में कॉम्पैक्ट, हाई-डेंसिटी और मिश्रित उपयोग वाले विकास को बढ़ावा दिया गया है.
मास्टर प्लान में TOD जोन को मेट्रो कॉरिडोर के दोनों ओर 500 मीटर तक और RRTS, रेलवे, हाई-स्पीड रेल स्टेशनों के आसपास 500 मीटर के दायरे में परिभाषित किया गया है. इन क्षेत्रों में कम से कम 2,000 वर्गमीटर के प्लॉट पर विकास की अनुमति होगी, बशर्ते प्लॉट का कम से कम 50% हिस्सा TOD जोन में हो और वह कम से कम 18 मीटर चौड़ी सड़क से जुड़ा हो.
कम स्पेस में भी बनेंगे ज्यादा फ्लैट्स, मगर कैसे?
TOD प्लॉट पर बेस FAR 400 रखा गया है, जबकि अधिकतम अनुमत FAR 500 तक जा सकता है. FAR ये बताता है कि किसी प्लॉट पर उसके कुल क्षेत्रफल के मुकाबले कितने क्षेत्रफल में निर्माण किया जा सकता है. 400 या 500 FAR का मतलब है कि सीमित जमीन पर कई गुना अधिक फ्लोर एरिया बनाया जा सकेगा. हालांकि FAR 400 से ऊपर निर्माण के लिए अतिरिक्त FAR शुल्क देना होगा.
मास्टर प्लान में UER यानी Urban Extension Road-II के किनारे हाई डेंसिटी कॉरिडोर विकसित करने का प्रावधान है. ये कॉरिडोर सड़क के दोनों ओर 250 मीटर तक के क्षेत्र में लागू होगा, बशर्ते वहां सर्विस रोड उपलब्ध हो. HDC के लिए कम से कम 8,000 वर्गमीटर का मूल प्लॉट होना चाहिए. इसमें से 50% जमीन सड़क चौड़ीकरण और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए देने के बाद कम से कम 4,000 वर्गमीटर का अंतिम प्लॉट विकास के लिए उपलब्ध होना चाहिए.

100 मंजिल की अनुमति किन शर्तों पर?
मास्टर प्लान में सामान्य HDC या TOD परियोजनाओं के लिए सीधे अधिकतम मंजिल या 100 मंजिल की संख्या निर्धारित तो नहीं की गई है, लेकिन ऊंची इमारतों को फायर सेफ्टी, संरचनात्मक सुरक्षा, पार्किंग, सेटबैक, ग्रीन एरिया, बिजली, पानी और सीवर जैसी अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होंगी.
TOD परियोजनाओं में अधिकतम 40% ग्राउंड कवरेज और कम से कम 10% ग्रीन एरिया रखना होगा. HDC परियोजनाओं में अधिकतम 40% ग्राउंड कवरेज और कम से कम 15% ग्रीन एरिया अनिवार्य है.
मास्टर प्लान के मुताबिक, यदि किसी प्रोजेक्ट में ऊंचाई की पाबंदियों के कारण अनुमत FAR का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता, तो TOD समिति ग्राउंड कवरेज में छूट दे सकती है. लेकिन ये छूट फायर और सुरक्षा मानकों, ग्रीन एरिया और पार्किंग से समझौता किए बिना ही दी जा सकेगी.
एयरपोर्ट और संवेदनशील इलाकों में रोक
हाई-राइज विकास पूरे दिल्ली में लागू नहीं होगा. TOD नीति पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों, जोन O, लो-डेंसिटी एरिया, संरक्षित स्मारकों, हेरिटेज बिल्डिंग, सिविल लाइंस बंगला क्षेत्र, लुटियंस बंगला जोन और कैंटोनमेंट क्षेत्रों में लागू नहीं होगी. एयरपोर्ट, एयरोसिटी और दिल्ली कैंटोनमेंट के क्षेत्र संबंधित प्राधिकरणों के नियमों के तहत ही विकसित होंगे. इसका मतलब है कि दिल्ली में 100 मंजिला इमारतों की संभावना मुख्य रूप से उन्हीं चुनिंदा कॉरिडोर और नीति-आधारित विकास क्षेत्रों में बन सकती है जहां जमीन, सड़क, सार्वजनिक परिवहन और इंफ्रास्टक्चर की क्षमता मौजूद हो.
मंजूरी की प्रक्रिया भी तेज होगी, डेडलाइन तय
TOD और HDC परियोजनाओं की मंजूरी के लिए DDA को नोडल एजेंसी बनाया गया है. परियोजना प्रस्ताव और बिल्डिंग प्लान DDA के OBPS पर जमा होंगे. TOD समिति में DDA, MCD, NDMC, DMRC, DJB, बिजली कंपनियों, दिल्ली फायर सर्विस, DPCC, PWD और ट्रैफिक पुलिस के प्रतिनिधि शामिल होंगे. पूरा प्रस्ताव जमा होने के बाद परियोजना की मंजूरी के लिए अधिकतम 60 दिन की समय सीमा तय की गई है. यदि 60 दिन के भीतर मंजूरी या नामंजूरी की सूचना नहीं दी जाती, तो कुछ शर्तों के तहत पोर्टल पर परियोजना को डीम्ड अप्रूव्ड माना जा सकता है.
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