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Black Gold Story: क्या देश का भविष्‍य 'काले सोने' में ही है, एनर्जी चेन में कितना महत्‍वपूर्ण है कोयला?

कोयला देश को एनर्जी सेक्टर में आगे ले जाने के लिए तैयार है. इस खबर में जानिए कोयले की मदद से कैसे देश गैस, तेल पर से निर्भरता कम करके आत्मनिर्भर की तरफ कदम बढ़ा सकता है.

Black Gold Story: क्या देश का भविष्‍य 'काले सोने' में ही है, एनर्जी चेन में कितना महत्‍वपूर्ण है कोयला?

क्या भारत के गंदे कोयले को स्वच्छ बनाया जा सकता है? भारतीय वैज्ञानिकों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है, जिससे अब कोयला ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त कर सकता है. भारत आज एक कड़वी हकीकत का सामना कर रहा है. वह बढ़ती ऊर्जा मांग वाली एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन तेल, गैस और कई प्रमुख औद्योगिक ईंधनों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है. दूसरी ओर, भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक पर बैठा है. अब, जब वैश्विक तनावों ने सप्लाई चेन को बाधित कर दिया है और हमारी कमजोरियों को उजागर किया है, तो भारत एक नए सवाल के साथ वापस कोयले की तरफ रुख कर रहा है. क्या इस तथाकथित गंदे ईंधन को स्वच्छ और रणनीतिक बनाया जा सकता है?

लंबे समय से भारत के कोयले को एक विलेन के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन इस विश्व पर्यावरण दिवस पर भारतीय वैज्ञानिक ये खुलासा कर रहे हैं कि कैसे यह 'पुराना गंदा कोयला' वास्तव में ऊर्जा आत्मनिर्भरता के साथ एक स्वच्छ और हरित 'विकसित भारत' की यात्रा में नए जमाने का 'काला सोना' बन सकता है.

आंकड़े बयां करते हैं कहानी

आंकड़े खुद अपनी कहानी कहते हैं. भारत के पास करीब 400 अरब टन कोयला है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. देश की कुल ऊर्जा जरूरतों में कोयले की हिस्सेदारी लगभग 55% है और बिजली उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 74% है. इसके विपरीत, देश अपनी जरूरत का लगभग 83% कच्चा तेल और लगभग 50% प्राकृतिक गैस आयात करता है. रसायनों और औद्योगिक कच्चे माल के मामले में यह निर्भरता और भी अधिक है, जहां मेथनॉल जैसे उत्पादों का 80 से 90% से अधिक हिस्सा आयात किया जाता है. यह असंतुलन हमेशा से चिंता का विषय रहा है, लेकिन आज यह एक रणनीतिक कमजोरी बन चुका है.

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव के कारण पश्चिम एशिया में जारी मौजूदा संकट ने एक बार फिर होर्मुज के रास्ते वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति लाइनों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है. जहाजों की आवाजाही में रुकावट, कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने भारत जैसे उन देशों पर भारी दबाव डाल दिया है जो आयात पर निर्भर हैं. संदेश बिल्कुल साफ है- केवल ऊर्जा सुरक्षा ही काफी नहीं है, भारत को अब आत्मनिर्भरता की जरूरत है. और यही वह जगह है जहां कोयले को नए सिरे से खोजा जा रहा है.

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कोयले का भविष्य: गैसिफिकेशन 

ये अतीत की तरफ लौटना नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए कोयले को नए रूप में ढालने का एक प्रयास है. इस बदलाव के केंद्र में है 'कोयला गैसिफिकेशन' (Coal Gasification), एक ऐसी प्रक्रिया जो कोयले को एक स्वच्छ ईंधन में बदल देती है जिसे सिंथेसिस गैस या 'सिनगैस' (Syngas) कहा जाता है. यह गैस मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होती है, और इसका उपयोग उर्वरक, रसायन, सिंथेटिक ईंधन और यहां तक ​​कि हाइड्रोजन बनाने के लिए किया जा सकता है.

कोयले को सीधे जलाने के बजाय, गैसिफिकेशन के जरिए इसे नियंत्रित तरीके से प्रोसेस किया जाता है, जिससे कार्यक्षमता बढ़ती है और प्रदूषण कम होता है. यह एक ऐसे औद्योगिक इकोसिस्टम का रास्ता खोलता है जो आयात की जगह ले सकता है और घरेलू क्षमता का निर्माण कर सकता है.

इस क्षमता को पहचानते हुए, भारत सरकार ने एक महत्वाकांक्षी कदम उठाया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश भर में कोयला और लिग्नाइट गैसिफिकेशन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए ₹37,500 करोड़ की एक विशाल योजना को मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य इस तकनीक को उद्योगों के लिए आकर्षक बनाना और बड़े पैमाने पर इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना है. इसके तहत लगभग 75 मिलियन टन कोयले के गैसिफिकेशन का लक्ष्य रखा गया है, जिससे कई लाख करोड़ रुपये के निवेश के रास्ते खुलने की उम्मीद है.

यह नया प्रयास पिछले कदमों पर आधारित है, जिसमें पायलट प्रोजेक्ट्स और तकनीक विकास के लिए ₹8,500 करोड़ की प्रोत्साहन योजना शामिल थी. थर्मेक्स इंडिया, कोल इंडिया और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) जैसी कंपनियां इस मुहिम का नेतृत्व कर रही हैं.

भेल (BHEL) ने विशेष रूप से भारतीय कोयले (जिसमें 35% से 45% तक राख होती है) को प्रोसेस करने के लिए एक स्वदेशी 'प्रेसराइज्ड फ्लुइडाइज्ड बेड गैसिफिकेशन' (PFBG) तकनीक विकसित की है. 'ऑक्सी-ब्लोन टेक' नामक यह क्रांतिकारी तकनीक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध घरेलू कोयले को मूल्यवान सिनगैस में बदल देती है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन या मेथनॉल और अमोनियम जैसे रसायनों के उत्पादन के लिए किया जा सकता है.

नीति निर्माताओं का तर्क

विशेषज्ञों के लिए यह बदलाव एक सरल तर्क पर आधारित है- जो भारत के पास प्रचुर मात्रा में है उसका उपयोग करो, न कि उस पर निर्भर रहो जिसकी कमी है. नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वी. के. सारस्वत इस दृष्टिकोण के सबसे मजबूत पैरोकार रहे हैं. उन्होंने रेखांकित किया कि भारत की ऊर्जा मांग पिछले तीन दशकों में तीन गुना बढ़ चुकी है और भविष्य में भी यह बढ़ती रहेगी. उन्होंने कहा, 'इस परिदृश्य में कोयला एक प्रमुख भूमिका निभाता रहेगा.' लेकिन वह यह भी साफ करते हैं कि कोयले के इस्तेमाल का तरीका बदलना होगा. उन्होंने कहा, 'अगर हम कोयले का उसी तरह इस्तेमाल करते रहे जैसे अब तक करते आए हैं, तो इसे गंदा ईंधन ही माना जाएगा. आज की जरूरत यह है कि हम कोयले को साफ तरीके से इस्तेमाल करना सीखें.'

गैसिफिकेशन यही समाधान देता है. डॉ सारस्वत बताते हैं, 'कोयले को सीधे जलाने की तुलना में कोयला गैसिफिकेशन से न्यूनतम उत्सर्जन होता है. और यदि इसे कार्बन कैप्चर तकनीक से जोड़ दिया जाए, तो नेट कार्बन आउटपुट शून्य के करीब हो जाता है.' उनके लिए यह बहस सिर्फ कार्यक्षमता से परे है. उन्होंने कहा, '400 अरब टन के भंडार के साथ यह भारत की ऊर्जा जरूरतों को 180 से 200 वर्षों तक पूरा कर सकता है.'

यहीं से ऊर्जा स्वतंत्रता का विचार आता है. भारत वर्तमान में तेल, गैस, उर्वरक और रसायनों के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करता है. कोयला गैसिफिकेशन घरेलू स्तर पर इन उत्पादों का निर्माण करके आयात के एक बड़े हिस्से को बदल सकता है.

राख की चुनौती और तकनीकी कामयाबी

कई सालों तक इसके सामने एक बड़ी तकनीकी बाधा थी. भारतीय कोयला अन्य देशों में पाए जाने वाले कोयले जैसा नहीं है; इसमें राख (Ash) की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो अक्सर 45% से अधिक हो जाती है. इसके कारण इसे पारंपरिक गैसिफिकेशन तकनीकों में उपयोग करना मुश्किल था, क्योंकि वे विदेशी कम राख वाले कोयले के लिए बनी थीं.

डॉ सारस्वत याद करते हैं, 'एक मिथक था कि भारतीय कोयले का गैसिफिकेशन नहीं किया जा सकता.' उन्होंने कहा कि वह मिथक अब टूट चुका है. 'भारतीय वैज्ञानिकों ने उच्च राख वाले भारतीय कोयले का उपयोग करके कोयला गैसिफिकेशन तकनीक विकसित कर ली है.' इसके पायलट प्लांट पहले से ही काम कर रहे हैं, जो सिनगैस बना रहे हैं और इसे मेथनॉल में भी बदल रहे हैं. यह एक बेहद महत्वपूर्ण सफलता है.

सिनगैस को मेथनॉल, अमोनिया और उर्वरकों में बदला जा सकता है, जिससे आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम होगी. डॉ सारस्वत इसे एक संपूर्ण औद्योगिक बदलाव के रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा, 'कोयला गैसिफिकेशन वह जरिया है जिससे हम कच्चे तेल आधारित अर्थव्यवस्था से स्वच्छ कोयला आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेंगे.'

वैश्विक स्तर पर, चीन जैसे देशों ने पहले ही बड़े पैमाने पर कोयला गैसिफिकेशन को अपना लिया है. भारत अब स्वदेशी तकनीक और घरेलू संसाधनों पर ध्यान केंद्रित करके इसकी बराबरी करने की कोशिश कर रहा है. भारत की वार्षिक कोयला मांग पहले से ही लगभग एक अरब टन है और 2047 तक इसके और बढ़ने की उम्मीद है. साथ ही, देश ने 2070 तक 'नेट जीरो' उत्सर्जन हासिल करने का संकल्प लिया है. विकास, स्थिरता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए नए दृष्टिकोणों की आवश्यकता होगी, और कोयला गैसिफिकेशन इसमें एक सेतु का काम कर सकता है.

सबसे बढ़कर, यह भारत को नियंत्रण और संप्रभुता देता है. होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में व्यवधान सहित वैश्विक संकटों से सबक बिल्कुल साफ है- निर्भरता जोखिम लाती है, जबकि घरेलू संसाधन लचीलापन और मजबूती प्रदान करते हैं.

कोयला, जिसे कभी केवल एक समस्या के रूप में देखा जाता था, अब समाधान के एक हिस्से के रूप में देखा जा रहा है. कोयला काला है. काला सुंदर है. और भारत के लिए, यह 'काला सोना' हमारा अपना है. अब चुनौती इसे स्वच्छ, कुशल और राष्ट्र की सच्ची ऊर्जा स्वतंत्रता की यात्रा का केंद्र बनाने की है.

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