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RBI ने घटाया GDP ग्रोथ का अनुमान, इकोनॉमिस्‍ट ने इसे व्‍यवहारिक फैसला बताया, समझाया- क्‍यों चिंता की बात नहीं 

NDTV से बातचीत में इकोनॉमिस्‍ट और एक्‍सपर्ट्स इस बात पर एकमत दिखें कि GDP अनुमान में आई ये कमी वैश्विक स्तर पर पैदा हुए दबावों का नतीजा है. भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मांग और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर मजबूत है, जो देश को किसी संकट से बचाने में सक्षम है.

RBI ने घटाया GDP ग्रोथ का अनुमान, इकोनॉमिस्‍ट ने इसे व्‍यवहारिक फैसला बताया, समझाया- क्‍यों चिंता की बात नहीं 
India GDP Growth Forecast: GDP ग्रोथ पर RBI के अनुमान घटाने के फैसले को एक्‍सपर्ट्स कैसे देख रहे हैं?
NDTV इंडिया ग्राफिक्‍स (Canva)

Economists Views on RBI GDP Growth Estimates: केंद्रीय बैंक RBI मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की रियल GDP ग्रोथ का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है. ग्लोबल जियोपॉलिटिकल टेंशन, सप्लाई चेन की दिक्कतें और अल-नीनो की आशंका के बीच केंद्रीय बैंक का ये अनुमान महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कई इकोनॉमिस्‍ट्स और मार्केट एक्‍सपर्ट्स इसे चिंता वाली बात नहीं बता रहे. NDTV से बातचीत के दौरान उन्‍होंने कहा कि देश की GDP ग्रोथ के अनुमान में ये कटौती किसी खतरे की घंटी नहीं है, बल्कि केंद्रीय बैंक का एक व्यावहारिक कदम है.

मंदी का संकेत है या व्यावहारिक फैसला?

श्रीराम जनरल इंश्योरेंस के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर अश्वनी धनवत का मानना है कि GDP ग्रोथ अनुमान को 6.6% करना एक व्यावहारिक कदम है, न कि किसी डर का संकेत. उनके अनुसार, तिमाही आंकड़ों का अनुमान (दूसरी तिमाही में 6.3% और चौथी तिमाही में 6.8%) ये दिखाता है कि साल के मध्य में अर्थव्यवस्था की रफ्तार थोड़ी धीमी रह सकती है. इसका मुख्य कारण वो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं को मानते हैं. हालांकि, वे आश्वस्त हैं कि भारत की घरेलू मांग की स्थिति अब भी पूरी तरह मजबूत बनी हुई है, भले ही बाहरी माहौल देश के पक्ष में न हो.

बजाज ब्रोकिंग के रिसर्च हेड सुमित सिंघानिया ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि RBI ने वैश्विक उथल-पुथल के बीच वेट एंड वॉच यानी 'देखो और इंतजार करो' की व्यावहारिक रणनीति अपनाई है. घरेलू मांग, निजी खपत और सेवाओं का निर्यात मजबूत होने के बावजूद, वैश्विक संघर्षों और ऊर्जा की ऊंची कीमतों का असर आर्थिक गतिविधियों पर दिखने लगा है. इसके साथ ही कमजोर मानसून और अल नीनो के जोखिम के कारण RBI ने यह कदम उठाया है.

घरेलू बाजार में मजबूती पर वैश्विक मोर्चे पर चुनौतियां

इनक्रेड मनी (InCred Money) के CEO विजय कुप्पा के अनुसार, भले ही केंद्रीय बैंक ने विकास दर और महंगाई के जोखिमों को स्वीकार किया है, लेकिन भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद (मैक्रो फंडामेंटल्स) इस मुश्किल दौर में भी राहत देने वाली है. वहीं, रिलायंस ब्रोकिंग के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अजीत मिश्रा का कहना है कि मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने आर्थिक विकास (Growth) और महंगाई के बीच संतुलन बनाने को प्राथमिकता दी है.

DBS बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट राधिका राव ने कहा कि इस नीति में RBI का ध्यान विकास दर को संतुलित रखने के साथ-साथ मुद्रा (रुपये) को स्थिरता देने पर अधिक रहा है. एडलवाइस म्यूचुअल फंड के धवल दलाल ने बताया कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को देखते हुए GDP अनुमान को कम किया गया है. हालांकि, इस दौरान विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार और RBI द्वारा उठाए गए कदम मध्यम अवधि में सकारात्मक साबित होंगे.

RBI की सोच लॉन्‍ग टर्म ग्रोथ की 

मेगाकॉर्प की EVP लवीना कंसल ने इस फैसले को संतुलित बताया. उनके अनुसार, मौजूदा माहौल में नीतिगत स्थिरता से उपभोक्ताओं, व्यवसायों और कर्जदाताओं को भविष्य के फैसले लेने में मदद मिलेगी, जिससे देश की विकास यात्रा को सहारा मिलेगा. वहीं ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर विवेक अय्यर का मानना है कि RBI का पूरा ध्यान विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास को समर्थन देने पर रहा है, जो एक परिपक्व रेगुलेटर की सोच को दर्शाता है.

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