इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी का कोई व्यक्तिगत विवाद है तो उसे केवल इस तर्क पर सेवा संबंधी कदाचार की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता कि वह घटना कार्यस्थल परिसर के अंदर घटी है. कोर्ट ने माना है कि कथित कृत्य और कर्मचारी के पद या सेवाओं के मध्य एक प्रत्यक्ष, ठोस और निकटतम संबंध का होना जरूरी है. इसी सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा दायर की गई स्पेशल अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के पूर्व फैसले को कायम रखा. यह आदेश जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की डबल बेंच ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से दाखिल स्पेशल अपील पर सुनवाई करते हुए दिया है.
यह प्रकरण भारतीय रिजर्व बैंक के कानपुर कार्यालय में पदस्थ रहे विजयानंद राय से संबंधित है, जो वहां राजभाषा विभाग में सहायक वर्ड प्रोसेसर के रूप में कार्यरत थे. वर्ष 2003 में मई महीने के दौरान मुन्नी राय नाम की एक महिला उनसे मिलने कार्यालय आई थी. प्रबंधन का आरोप था कि विजयानंद राय ने उस महिला के साथ बहस व धक्का-मुक्की की, थप्पड़ मारा और उन्हें दफ्तर से बाहर निकाल दिया, जिसके बाद वो खुद भी बिना किसी पूर्व सूचना या स्वीकृति के कार्यालय से चले गए.
बैंक ने विभागीय अनुशासनहीनता का मामला मानते हुए जारी की चार्जशीट
इस घटनाक्रम को आधार बनाते हुए बैंक प्रशासन ने विभागीय अनुशासनहीनता का मामला मानते हुए पहली चार्जशीट जारी कर दी. उसके बाद साल 2005 में संबंधित महिला ने विजयानंद राय पर अपने निवास स्थान पर आकर मारपीट करने का एक और आरोप लगाया. इस मामले में स्पष्टीकरण मांगने पर कर्मचारी ने एक नोटरी शपथ पत्र प्रस्तुत किया, जिसे शिकायतकर्ता महिला ने झूठा और कूटरचित करार दिया.
बैंक ने कर्मचारी को किया बर्खास्त
बैंक ने इस प्रक्रिया को विभागीय जांच को गुमराह करने का प्रयास मानते हुए दूसरी चार्जशीट थमा दी. दोनों मामलों की आंतरिक जांच के आधार पर बैंक ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया, जिसे कर्मचारी ने अदालत में चुनौती दी. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला न तो बैंक की कर्मी थी और न ही किसी बैंकिंग कार्य से वहां आई थीं. यह दोनों पक्षों के बीच का एक व्यक्तिगत मामला था, जो बाद में पारिवारिक अदालत भी पहुंचा था.
कोर्ट ने कहा- काल्पनिक संबंधों के आधार पर कार्रवाई उचित नहीं
अदालत ने टिप्पणी की कि किसी कृत्य को सेवा कदाचार सिद्ध करने के लिए नियोक्ता को यह दर्शाना होगा कि उस घटना का रोजगार से सीधा और सीधा असर पड़ता है. केवल दूरगामी या काल्पनिक संबंधों के आधार पर कार्रवाई उचित नहीं है.
कोर्ट ने फर्जी दस्तावेज के आरोप पर भी असंतोष जताया, क्योंकि संदिग्ध हस्ताक्षरों की न तो किसी फॉरेंसिक विशेषज्ञ से जांच कराई गई और ना ही संबंधित नोटरी अधिकारी का बयान दर्ज किया गया. इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी अत्यंत कठोर दंड है, जबकि इस मामले में बैंक को किसी प्रकार की वित्तीय हानि, गबन या भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़ा था. कोर्ट ने आरबीआई की स्पेशल अपील खारिज कर दी. कोर्ट ने आदेश दिया कि चूंकि कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके है, इसलिए अदालत ने पुनर्बहाली के स्थान पर सक्षम प्राधिकारी को तीन महीने के अंदर बकाया वेतन और सभी सेवानिवृत्ति लाभों का नियमानुसार भुगतान करने का आदेश दिया.
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