- वित्त मंत्री सीतारमण के बजट 2026 की तैयारी के बीच टैक्स एक्सपर्ट्स ने मिडिल क्लास के लिए सुधार की मांग की है
- चार्टर्ड अकाउंटेंट हिमांक सिंगला ने कहा कि मिडिल क्लास को कंपनियों जैसे नेट प्रॉफिट पर टैक्स लगना चाहिए
- नौकरीपेशा की सैलरी को डिस्पोजेबल इनकम मानना गलत है क्योंकि खर्चे पहले से तय होते हैं जैसे EMI और किराया
Budget 2026: जैसे-जैसे 1 फरवरी करीब आ रही है, देश के करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की नजरें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट 2026 के पिटारे पर टिकी हैं. इस बीच टैक्स एक्सपर्ट्स ने सरकार से इस बजट में बड़ी मांग सामने रखी है. चार्टर्ड अकाउंटेंट हिमांक सिंगला ने एनडीटीवी से बात करते कहा है, मौजूदा टैक्स सिस्टम मिडिल क्लास की तरक्की पर नहीं, बल्कि उनके सर्वाइवल पर टैक्स वसूल रहा है.
'कंपनियों जैसा फायदा मिडिल क्लास को मिले'
हिमांक सिंगला ने NDTV से बातचीत में एक बड़ा सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "जब कंपनियों से उनके नेट प्रॉफिट पर टैक्स लिया जाता है, ना कि कुल टर्नओवर पर, तो यही नियम आम आदमी पर लागू होना चाहिए"
उनके अनुसार, एक बिजनेस को किराया, बिजली, कर्मचारियों की सैलरी और दूसरे खर्चे घटाने के बाद बचे हुए मुनाफे पर टैक्स देना होता है. लेकिन एक नौकरीपेशा इंसान की सैलरी आते ही उसे डिस्पोजेबल इनकम मान लिया जाता है, जबकि हकीकत में उस सैलरी का बड़ा हिस्सा पहले से ही EMI, घर के किराए, बच्चों की स्कूल फीस और राशन के लिए फिक्स हो जाता है.
'सर्वाइवल' पर टैक्स का बोझ
एक्सपर्ट का कहना है कि आज के दौर में महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि 75 हजार रुपये की स्टैंडर्ड डिडक्शन ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है. शहरों में सैलरी का 30 से 40% हिस्सा केवल घर के किराए में चला जाता है. ऐसे में जो पैसा बचता है, वह ऐशो-आराम के लिए नहीं बल्कि इमरजेंसी और बुढ़ापे की सेविंग के लिए होता है. बजट में सरकार को इसी सेविंग पर टैक्स लगाना चाहिए, ना कि पूरी कमाई पर.
क्या हैं बड़ी मांगें?
- एक्सपर्ट ने सुझाव दिया कि फ्लैट 75 हजार की जगह इनकम के बेस पर प्रतिशत में डिडक्शन मिलनी चाहिए.
- एजुकेशन और हेल्थकेयर अब लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुके हैं. टैक्स स्लैब में इनका खास ध्यान रखा जाना चाहिए.
- नौकरीपेशा क्लास सबसे ईमानदारी से टैक्स देता है क्योंकि उनकी इनकम किसी से छिपी नहीं होती. उन्हें इस ईमानदारी का इनाम मिलना चाहिए.
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