Bajaj Chetak History: यह बात आज की 'इंस्टेंट' यानी तुरंत डिलीवरी वाली पीढ़ी को किसी किस्से-कहानी जैसी लग सकती है, लेकिन 1970 और 80 के दशक के भारत में एक ऐसी भी सवारी थी जिसके लिए लोग महीनों से लेकर 10 साल तक से ज्यादा का इंतजार करने को तैयार थे. वह सवारी थी— बजाज चेतक. यह महज दो पहियों पर दौड़ने वाला लोहे का एक ढांचा नहीं था, बल्कि आजाद भारत के उभरते हुए मध्यमवर्ग की तरक्की, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और उसकी आकांक्षाओं का सबसे बड़ा प्रतीक था. भारतीय परिवारों के आंगन में खड़ा बजाज चेतक यह गवाही देता था कि घर में खुशहाली आ चुकी है. केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के 70 से अधिक देशों में ये स्कूटर न सिर्फ निर्यात होती थी बल्कि वहां की शहरी जिंदगी का हिस्सा बन गई थी. लेकिन वक्त की बेरहमी कुछ ऐसी हुई कि ये स्कूटर न सिर्फ बाजार से गायब हो गया बल्कि इसका उत्पादन ही बंद करना पड़ा. हालांकि, दशकों बाद कंपनी ने इसे नए इलेक्ट्रिक अवतार में बाजार में उतारा है, जो आज के आधुनिक दौर में एक बार फिर से बड़ी सफलता की कहानी लिख रहा है. आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और उसके जरिए समझते हैं कि कैसे महाराणा प्रताप के घोड़े के नाम पर शुरू हुआ यह स्कूटर देश की धड़कन बना और फिर वक्त के पहिए ने इसे कैसे इतिहास का हिस्सा बना दिया.

विदेशी तकनीक से स्वदेशी सफर की शुरुआत
बजाज चेतक को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या यह पूरी तरह स्वदेशी था? इसका जवाब जानने के लिए शुरु से शुरु करते हैं. बात साल 1960 की है. तब बजाज ऑटो ने इटली की मशहूर कंपनी पियाजियो (Piaggio) के साथ एक तकनीकी समझौता किया था. इसके तहत भारत में 'वेस्पा 150' (Vespa 150) स्कूटर का निर्माण शुरू हुआ.सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन साल 1971 एक ऐसा टर्निंग प्वाइंट आया जिसने सबकुछ हमेशा के लिए बदल दिया. हुआ ये कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की विदेशी मालिकाना हक वाली नीतियों के कारण इटली की कंपनी के लाइसेंस का नवीनीकरण (Renew) नहीं हो सका. पियाजियो के साथ संबंध टूटने के बाद बजाज ने वेस्पा के डिजाइन, टूलिंग और अपने अनुभव का इस्तेमाल कर एक स्वतंत्र स्कूटर बनाने का फैसला किया.
आंकड़ों का गणित: 10 साल का इंतजार और लाखों की पेंडिंग बुकिंग
लाइसेंस राज के उस दौर में बजाज चेतक की मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि आज की कॉरपोरेट दुनिया उसे देखकर हैरान रह जाएगी.31 मार्च 1970 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जब यह वेस्पा के नाम से बिक रहा था, तब भी 1,76,933 बुकिंग्स पेंडिंग थीं. चेतक के लॉन्च होने के बाद यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ा.तब प्लानिंग कमीशन ने अनुमान लगाया था कि भारत को सालाना 2 लाख से ज्यादा स्कूटर्स की जरूरत होगी, लेकिन सरकार की कड़े उत्पादन नियमों (Quota System) की वजह से बजाज को एक सीमित संख्या में ही स्कूटर बनाने की अनुमति थी. लाइसेंस राज के उस दौर में हालत कुछ ऐसे बन गए कि इसकी बुकिंग कराने के बाद डिलीवरी मिलने में 6 महीने से लेकर 10 साल तक का समय लग जाता था.
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ब्लैक मार्केट और 'प्रीमियम' का खेल: 2,000 रुपये के आसपास की कीमत पर शुरू हुआ यह स्कूटर ब्लैक मार्केट (कालाबाजारी) का सबसे बड़ा जरिया बन गया था. लोग इसकी आधिकारिक कीमत से दोगुना पैसा 'प्रीमियम' के तौर पर नकद देकर इसे तुरंत खरीदने के लिए तैयार रहते थे. लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए पांच से सात साल पहले से ही चेतक बुक कराकर उसकी रसीद संभाल कर रख देते थे. दूसरे शब्दों में कहें तो उस दौर के भारत में शादियों के बाजार में बजाज चेतक सबसे बड़ा 'एक्स-फैक्टर' था. लड़की वाले बकायदा लड़के के नाम पर चेतक की एडवांस बुकिंग की रसीद कटवाते थे. कई बार तो हालात ऐसे बनते थे कि शादी की तारीखें इस बात पर आगे-पीछे की जाती थीं कि स्कूटर की डिलीवरी कब मिल रही है. जिसके पास बजाज चेतक होता था, समाज में उसकी प्रतिष्ठा रातों-रात बढ़ जाती थी.

'हमारा बजाज' और दुनिया के 70 से अधिक देशों में निर्यात
बजाज चेतक की सफलता सिर्फ भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं थी. राहुल बजाज के नेतृत्व में कंपनी ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई.बजाज ने चेतक और उसके कंपोनेंट्स (कल-पुर्जों) का निर्यात दुनिया भर के 70 से अधिक देशों में करना शुरू किया था. इसमें सूडान, श्रीलंका, मिस्र, जर्मनी, ईरान और यहां तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी शामिल थे. अफ्रीका और मध्य-पूर्व के देशों में तो बजाज चेतक परिवहन का मुख्य जरिया बन गया था.
'हमारा बजाज' की लाइफलाइन: 1989 में जब बजाज ने अपना ऐतिहासिक विज्ञापन कैंपेन "हमारा बजाज" लॉन्च किया, तो उसने देश की नब्ज पकड़ ली थी. चेतक भारतीय संयुक्त परिवार (Joint Family) की जरूरतों में पूरी तरह फिट बैठता था.चेतक का चौड़ा फ्रंट एप्रन, आगे लगी अतिरिक्त स्टेपनी और मजबूत मेटल बॉडी इसे भारतीय सड़कों का राजा बनाती थी. इस पर आगे खड़ा एक बच्चा, पीछे बैठी पत्नी, उसकी गोद में एक और बच्चा और गाड़ी चलाता हुआ घर का मुखिया— यह मध्यमवर्गीय 4 लोगों के परिवार की सबसे सुरक्षित और इकलौती लाइफलाइन थी. इसकी मजबूत 'लोहे की बॉडी' के कारण लोग इसे पीढ़ियों तक चलाने का भरोसा रखते थे. बजाज समूह के मुखिया और दिग्गज उद्योगपति स्वर्गीय राहुल बजाज ने चेतक के इस दौर को याद करते हुए अपने एक इंटरव्यू में कहा था:
बाद के दिनों में जब राहुल बजाज के बेटे राजीव बजाज ने मोटरसाइकिल क्रांति और ऑटोमैटिक स्कूटर्स के आने के बाद साल 2005 में चेतक का切 प्रोडक्शन बंद करने का फैसला लिया, तो राहुल बजाज भावुक भी हुए थे. उन्होंने सार्वजनिक रूप से माना था कि चेतक को बंद करना उनके लिए एक बेहद कठिन और दर्दनाक फैसला था, क्योंकि यह स्कूटर उनके परिवार और भारत के औद्योगिक इतिहास का गौरव था.
मोटरसाइकिल क्रांति (Hero Honda): जब चेतक के किले में लगी पहली सेंध
1980 के दशक के मध्य में भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में एक ऐसी क्रांति की शुरुआत हुई, जिसने चेतक के एकछत्र साम्राज्य की चूलें हिला दीं. यह क्रांति थी— हीरो होंडा (Hero Honda) सीडी 100 मोटरसाइकिल का आगमन.बजाज चेतक टू-स्ट्रोक इंजन के साथ आता था, जिसमें पेट्रोल के साथ अलग से 'टू-टी (2T) ऑयल' मिलाना पड़ता था और इसका माइलेज 35-40 किलोमीटर प्रति लीटर के आसपास था. इसके मुकाबले जापानी तकनीक के साथ आई हीरो होंडा ने 'फोर-स्ट्रोक' इंजन पेश किया, जिसका माइलेज 70-80 किलोमीटर प्रति लीटर था.
युवाओं की बदली पसंद: बाइक के आने से स्कूटर की 'पारिवारिक और ढलती उम्र' वाली इमेज के मुकाबले युवाओं को एक स्टाइलिश और बेहद किफायती विकल्प मिल गया. चेतक का भारी-भरकम गियर (जो हाथ से बदलना पड़ता था) और किक मारने की झंझट, बाइक के 'फुट गियर' और स्मूथ राइड के सामने पुरानी लगने लगी.
ऑटोमैटिक स्कूटर्स (Activa) का साइलेंट वार और साम्राज्य का अंत
रही-सही कसर साल 2001 में होंडा ने अपनी एक्टिवा (Activa) को लॉन्च करके पूरी कर दी. एक्टिवा ने भारतीय बाजार में 'गियरलेस और ऑटोमैटिक' स्कूटर्स के एक नए युग की शुरुआत की.बजाज चेतक को भारी वजन और गियर की वजह से महिलाएं चलाने से कतराती थीं. होंडा एक्टिवा ने प्लास्टिक-मेटल मिक्स बॉडी, बिना गियर की तकनीक (V-MATIC) और सबसे महत्वपूर्ण 'बटन स्टार्ट' (सेल्फ स्टार्ट) की सुविधा दी. इसने कामकाजी महिलाओं और कॉलेज जाने वाले युवाओं को अपनी तरफ पूरी तरह खींच लिया.इसके अलावा नए दौर में भारत सरकार ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सख्त प्रदूषण नियम लागू किए. चेतक का पुराना टू-स्ट्रोक इंजन इन नियमों पर खरा नहीं उतर पा रहा था. हालांकि बजाज ने बाद में चेतक का फोर-स्ट्रोक मॉडल भी उतारा, लेकिन तब तक हवा का रुख पूरी तरह बदल चुका था.
आखिरकार, वक्त की रफ्तार और बदली प्राथमिकताओं के कारण साल 2005 में भारी मन से बजाज ने अपने इस आइकॉनिक स्कूटर 'चेतक' का प्रोडक्शन पूरी तरह बंद करने का फैसला किया. राहुल बजाज के नेतृत्व में जिस स्कूटर ने दशकों तक भारत की सड़कों पर राज किया, वह वक्त के साथ न बदल पाने की वजह से रेस से बाहर हो गया. बजाज चेतक का जाना सिर्फ एक प्रोडक्ट का बंद होना नहीं था, बल्कि भारतीय आर्थिक इतिहास के एक पूरे युग का अवसान था— वह युग जहां इंतजार में भी एक तरह का आनंद और गर्व छुपा होता था.
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