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This Article is From Jan 07, 2020

जेएनयू और जामिया के बीच भेदभाव क्यों किया गया?

रवीश कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 07, 2020 23:00 pm IST
    • Published On जनवरी 07, 2020 22:18 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 07, 2020 23:00 pm IST

उपदेश खूब दिए जाते हैं. खासकर तब जब नौजवान आंदोलन करते हैं. पहला उपदेश कि पढ़ने आए हैं, राजनीति करने नहीं. मगर यही अंतिम उपदेश होता है. तब छात्र पूछते हैं कि पढ़ ही तो रहे हैं लेकिन रिज़ल्ट नहीं आता है. रिज़ल्ट आता है तो नियुक्ति नहीं मिलती है. उपदेश देने वालों को आप भी उपदेश दे सकते हैं कि क्यों नहीं आप अपने राजनीतिक दल की छात्र ईकाई बंद कर देते हैं, जब वे यूनिवर्सिटी में राजनीति नहीं कर सकते हैं तो आपकी पार्टी में पोलिटिक्स क्यों कर रहे हैं? भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय ने एक ऐलान किया है. बताया है कि भारत की जीडीपी दर 5 प्रतिशत ही रहेगी. यानी 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 तक की जीडीपी 5 प्रतिशत रहेगी. दस साल में सबसे कम है. 2012-13 के बाद यह सबसे धीमी विकास दर है. अब आते हैं जेएनयू की हिंसा पर और दिल्ली पुलिस पर.

इस सवाल पर न गृहमंत्री इंटरव्यू देते देखे जा रहे हैं और न ही दिल्ली पुलिस बता पा रही है कि रविवार शाम जेएनयू के कैंपस में नक़ाबपोश और हथियारबंद गुंडों के समूह को क्यों नहीं पकड़ा जा सका है? उनकी गिरफ्तारी तक नहीं हुई जबकि तमाम मीडिया वेबसाइट से लेकर न्यूज़ चैनलों में इस बात की पड़ताल की गई है कि व्हाट्सएप मैसेज में किस तरह से एबीवीपी से जुड़े सदस्य जेएनयू परिसर की तरफ जमा होने और हमले की बात कर रहे हैं. क्या आपको इस बात की जानकारी है कि इनमें से किसी से पुलिस ने पूछताछ भी की है? इस दिल्ली महानगर में दो यूनिवर्सिटी हैं. इन दो यूनिवर्सिटी में पुलिस की कार्रवाई को लेकर आप दिल्ली पुलिस के बदलते चेहरे को समझ सकते हैं.

15 दिसंबर को जामिया मिलिया की लाइब्रेरी से निकाल कर दिल्ली पुलिस कैसे इन छात्रों को बाहर ला रही है. जैसे ये किसी अपराधी गिरोह के सदस्य हों, देश के बागी हों, डाकू हों जिनको सरेंडर कराकर मार्च कराया जा रहा है. ऐसा क्यों किया गया, इसका अभी तक कोई साफ जवाब नहीं है. पुलिस ने कहा कि वहां हिंसा थी तो वह बिना अनुमति के घुस गई और आंसू गैस चलाए, छात्रों को पीटा गया और अपराधियों की तरह बाहर लाया गया. इनके हाथ में किताबें थीं इन्हें आतंकी और गद्दार तक कहा गया. पुलिस ने छात्रों पर गोलियां भी चलाईं.

इनके हाथ में किताबें नहीं हैं, इन्हें देशभक्त कहा गया. नक़ाबपोश गुंडों का यह दल आराम से हमले के बाद लाठी डंडे के साथ टहलता हुआ निकल गया. न जेएनयू की अपनी सुरक्षा टीम थी और न पुलिस थी. जामिया और जेएनयू के बीच दिल्ली पुलिस किस तरह अलग-अलग देखती है आप देख सकते हैं. जो पुलिस दिल्ली की हुआ करती थी वो अब दिल्ली के अलावा किसी और की होती हुई नज़र आ रही है.

क्या आपको पता है कि 5 जनवरी की शाम जब नकाबपोश अपना काम करके चले गए थे तब जेएनयू प्रशासन क्या कर रहा था? जेएनयू के गेट पर हंगामा हो रहा था. खबरें चल रही थीं. जेएनयू प्रशासन चार दिन पहले की घटना का एफआईआर करा रहा था और उसमें जेएनयू छात्र संघ की प्रेसिडेंट आइशी घोष का नाम दर्ज कराया जा रहा था. है न कमाल ये. 5 जनवरी को हिंसा होती है, उस शाम एफआईआर होती है 1 जनवरी और 4 जनवरी की घटना की.

ठीक उसी समय आइशी घोष एम्स के ट्रामा सेंटर में अपना इलाज करा रही थीं. उनके सर पर गहरी चोट आई थी और 15-16 टांके लगे थे. दो शिक्षकों को भी चोट लगी थी. 31 अन्य छात्र और गार्ड घायल हुए थे. कायदे से जेएनयू प्रशासन को उस वक्त थाने जा कर एफआईआर करानी चाहिए थी कि उसके कैंपस में ऐसी घटना हुई है लेकिन जेएनयू के प्रशासन को याद आता है कि उस छात्रा पर अपराध के मामले दर्ज कराए जाने चाहिए जो अस्पताल में अपने लहू लुहान सर पर पट्टी बंधवा रही थी. प्रशासन 1 जनवरी की घटना याद कर आइशी और अन्य सात के खिलाफ मामले दर्ज करा रहा था. इसी के साथ जेएनयू का प्रशासन एक और एफआईआर दर्ज कराता है जिसमें 20 लोग आरोपी बनाए जाते हैं लेकिन यह घटना भी 4 दिसंबर की है. ये है जेएनयू का प्रशासन. आप फोटो समझिए, क्रोनोलोजी समझ कर क्या करें. फोटो यह समझिए कि अगर प्रशासन और पुलिस चाहें तो कैसे आपके वाजिब सवालों की धज्जियां उड़ाते हुए वही करेंगे जो उन्हें करने से कोई रोक नहीं सकता.

क्या यह आपको भेदभाव नहीं लगता है? प्रशासन अपनी तरफ से नकाबपोश लोगों के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. जेएनयू छात्र संघ पुलिस को शिकायत करते हैं, एबीवीपी का नाम लेते हैं लेकिन उनकी शिकायत पर एफआईआर नहीं होती है. इसके बाद भी 5 जनवरी की शाम को जिस दिन हिंसा हुई थी, उस दिन जेएनयू प्रशासन उस हिंसा के खिलाफ एफआईआर नहीं कराता है. दिल्ली पुलिस अपनी तरफ से स्वत: संज्ञान लेते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराती है. इस एफआईआर का कुछ हिस्सा पढ़ना चाहता हूं.

पौने चार पर एक इंस्पेक्टर को इतल्ला मिली कि कुछ छात्र पेरियार में जमा हो कर मारपीट कर रहे हैं. इस सूचना पर इंस्पेक्टर और स्टाफ पेरियार पहुंचे जहां पर 40-50 अनजान लोग जिनमें से कुछ लोगों ने मफलर व कपड़े बांध रखे थे और जिनके हाथों में डंडे थे, वहां के कुछ छात्रों के साथ मारपीट कर रहे थे. हुड़दंगी लोग पुलिस टीम को देख कर वहां से भाग गए. इसी दौरान स्थिति पर नियंत्रण रखने के लिए जेएनयू प्रशासन की तरफ से एक रिक्वेस्ट लेटर प्राप्त हुआ था. जो स्थिति पर नियंत्रण और जेएनयू प्रशासन के आग्रह के मद्देनज़र और अतिरिक्त पुलिस बल को भी मौके पर बुलवा गया. स्थिति पर नियंत्रण करने की कोशिश की गई. इसी दौरान थाने से जेएनयू कैंपस के अंदर से झगड़े और मारपीट की अन्य पीसीआर कॉल की सूचना मिलने लगी. फिर समय सात बजे इंस्पेक्टर को इत्तला मिली कि साबरमती होस्टल में कुछ हुड़दंगी घुस गए हैं जो वहां के छात्रों के साथ मारपीट कर रहे हैं. फिर इंस्पेक्टर साबरमती हॉस्टल पहुंचा, जहां पर 50-60 हुड़दंगी लोग हाथों में डंडे लेकर वहां पर हॉस्टल बिल्डिंग में तोड़ फोड़ कर रहे थे, जिन्हें पब्लिक अड्रेस सिस्टम द्वारा तोड़फोड़ न करने व शांति पूर्वक हट जाने की चेतावनी दी गई. जो चेतावनी के बाद भी तोड़ फोड़ करते रहे. कानून के निर्देशों की अवहेलना करते हुए वहां से भाग गए.

पेरियार हास्टल में भीड़ हिंसा कर रही थी. पुलिस चेतावनी देती है और भीड़ भाग जाती है. फिर एक सवा एक घंटे बाद वही भीड़ साबरमती पुहंचती है. पुलिस चेतावनी देती है, भीड़ हिंसा कर भाग जाती है. दो-दो बार पुलिस नकाबपोश हमलावरों के करीब पहुंचती है और एक को भी पकड़ नहीं पाती है.

आपने यह वीडियो तो देखा ही है. क्या ये हुड़दंगी आपको भागते हुए नज़र आ रहे हैं या शाम को टहलते घूमते पान खाने जाते हुए दिखाई दे रहे हैं. क्या आप नागरिक के तौर पर देख समझ पा रहे हैं कि कैसे बातें बनाई जा रही हैं. इस बात की परवाह भी नहीं की जा रही है कि कोई नागरिक इन सवालों को पकड़ेगा तो क्या सोचेगा. क्या हम दिल्ली पुलिस की ही बात कर रहे हैं जिसकी पेशवर छवि रही है?

पुलिस ने जो स्वत संज्ञान लेकर एफआईआर की है उससे यह साफ होता है कि हिंसा के वक्त घटनास्थल पर पुलिस थी. इंस्पेक्टर की टीम थी. उसी दौरान जेएनयू प्रशासन ने पुलिस से नियंत्रण का आग्रह किया और पुलिस बल को मौके पर बुलवाया गया. अब सवाल ये है कि फिर सोमवार को शाम आठ बजे प्रेस कांफ्रेंस में दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता मंदीप रंधावा ने क्यों कहा कि जेएनयू प्रशासन ने पुलिस से भीतर आने की गुज़ारिश पौने आठ बजे की. आप फिर से पढ़ लें. मंदीप रंधावा ने कहा था, 'दिल्ली पुलिस के हाथ में सुरक्षा नहीं है. केवल कोर्ट के आदेश से एडमिन ब्लॉक में है. वहां नहीं जहां पर टकराव हुआ, वहां पर हम तैनात थे. उसके बाद 7.45 के आस पास जेएनयू प्रशासनस से गुज़ारिश की, उसके बाद जेएनयू गई और फ्लैग मार्च किया और सिचुएशन को कंट्रोल किया.'

किस पर भरोसा करें. दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता कहते हैं कि पौने आठ बजे भीतर आने की गुज़ारिश की गई और एफआईआर में लिखा है कि जेएनयू प्रशासन ने पुलिस से स्थिति पर नियंत्रण का आग्रह किया. अतिरिक्त बल मंगाया गया. हमारे सहयोगी परिमल से जेएनयू के चीफ प्रॉक्टर ने कहा है कि पूरे दिन पुलिस से मदद की रिक्वेस्ट करते रहे. प्रशासन पुलिस के लगातार संपर्क में था. धनजंय सिंह से परिमल ने यह भी पूछा कि आपका नाम कई ऐसे व्हाट्सएप ग्रुप में है जिसमें हिंसा की बात हो रही है.

जेएनयू के चीफ प्रॉक्टर धनंजय सिंह ने कहा, 'मैं दो बजे तक था एडमिन बिल्डिंग में. दो बजे के बाद बिल्डप शुरू होता है. पेरियार में स्थिति खराब होती है. मैं चीफ प्रॉक्टर हूं तो मैं सिक्योरिटी अफसर के साथ गया. मैं वहां पेरियार में था. दो बजे से 11 बजे तक कैंपस में था. हमने पुलिस से लगातार मदद मांगने की कोशिश की थी. मैं खुद वहां था. चीफ सिक्योरिटी अफसर वहां थे. एडमिनिस्ट्रेशन के और भी लोग वहां थे. सबने कोशिश की कि पुलिस आए और तुरंत स्थिति को कंट्रोल करे. क्योंकि हम अपने सामने देख रहे थे. जब उनसे पूछा गया कि पुलिस को अनुमति देर से मिली, अगर ये सारी चीज़ें दोपहर में हो रही थीं तो उनको इतनी देर से अनुमति क्यों मिली? इस पर उन्‍होंने कहा, 'जेएनयू में करीब दो महीने से स्थिति खराब है. जिस तरह का मॉब वायलेंस संडे को हुआ है, उसके पहले से ही कैंपस में कई सीरीज हिंसा की हुई. स्कूल में और बाहर हुई है. पुलिस को हर दिन जेएनयू प्रशासन एक रिपोर्ट देता रहा है. जैसे एक दिन वीसी पर भी अटैक हुआ था कि कैंपस में चीज़ें खराब हैं. इन्हें उस दिन सुबह के बारे में भी पता है. पुलिस को रीच आउट करने की कोशिश हमेशा से जेएनयू प्रशासन ने की है.'

पुलिस की एफआईआर में भी बात है कि जेएनयू प्रशासन ने पौने चार से सात के करीब पुलिस से स्थिति संभालने का आग्रह किया था. पुलिस के प्रवक्ता कहते हैं कि पौने आठ बजे आग्रह मिला. पुलिस की एफआईआर के अनुसार पौने चार बजे पेरियार हॉस्टल में 40-50 हुड़दंगी हिंसा कर रहे थे. चीफ प्रॉक्टर कह रहे हैं कि वहां हिंसा दो बजे हो रही थी और वे वहां पर खुद मौजूद थे. एफआईआर में इस बात का ज़िक्र ही नहीं है कि पेरियार में जेएनयू प्रशासन मौजूद था. चीफ प्रॉक्टर वहीं थे और सिक्योरिटी अफसर भी थे. इसका ज़िक्र एफआईआर में क्यों नहीं है? यही नहीं शाम सात बजे के बाद जेएनयू गेट के बाहर भी हिंसा होती है. उस हिंसा पर पुलिस क्यों चुप है. दिल्ली पुलिस की हालत ये हो गई है कि उसे अपील जारी करनी पड़ी है. दो नंबर जारी करने पड़े हैं कि जितने भी सबूत हैं वो सात दिनों के भीतर फोटो और वीडियो के साथ भेजे जाएं.

1 और 4 जनवरी की घटना को लेकर एफआईआर कराई गई. पूरी कोशिश है कि बहस को पहले ले जाया जाए ताकि नकाबपोश गुंडों से ध्यान हट जाए. अभी तक इनमें से किसी की गिरफ्तारी तक नहीं हुई है. रविवार से पहले 4 तारीख की घटना का एक वीडियो है. यह वीडियो सेंटर फॉर इंफोर्मेशन स्टडीज़ के बाहर का है. लड़के ने काले रंग का जेएनयू का स्वेट शर्ट पहन रखा है. सामने उसके एक लड़की है जिसके सर पर लाल मफलर सा है. लड़की पीछे हटती हुई दिख रही है, खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रही है और लड़का उसे एक मुक्का मारता है. लड़के को पीछे खींच लिया जाता है. लड़की का नाम अपेक्षा प्रियदर्शिनी है. उसके पास एक मेडिको लीगल रिपोर्ट है जिसमें 4 जनवरी का डेट है. लिखा है कि उसके बायें हाथ में चोट आई है. लड़के का नाम शिवम चौरसिया है. शिवम एबीवीपी जेएनयू विंग का उपाध्यक्ष है. शिवम चार जनवरी की घटना को मामूली झड़प बताता है जो कि मेडिको लीगल रिपोर्ट से मेल नहीं खाती है. शिवम का कहना है कि जो चोट लगी है वो बाद की है, 5 जनवरी की है. कितना अंतर है रिपोर्ट और बयान में. परिमल ने अपेक्षा और शिवम दोनों से बात की है.

तो सवाल किससे पूछा जाए कि ये जो दिल्ली पुलिस है किसके लिए काम कर रही है, देश की राजधानी की पुलिस है. उसके एक्शन में इतना भेदभाव क्यों दिख रहा है? दिल्ली पुलिस पर एबीवीपी का भी यकीन कमज़ोर लग रहा है. जैसे साबरमती हॉस्टल में नकाब पहन कर हमला करने आई इस लड़की के बारे में कितनी बातें अखबार से लेकर सोशल मीडिया में आ गई हैं. इस नकाबपोश लड़की के बारे में कितनी जानकारी आ गई है मगर फिर भी पुलिस के हिसाब से इसका कुछ पता नहीं. यह बात सामने आई है कि यह कोमल शर्मा है. एबीवीपी के नेता मानते हैं कि कोमल शर्मा नाम की सदस्या तो है मगर कोमल वो लड़की नहीं है जो नकाब में है. फिर सवाल ये है कि जब कोमल वहां नहीं थीं तो सामने आने से क्यों घबरा रही है.

सुना आपने अमित शाह क्या कर लेंगे. देश के गृह मंत्री हैं. एबीवीपी की कार्यकर्ता फिर भी ट्रोल के डर से सामने नहीं आ रही हैं. तब जबकि उसका संबंध नकाब वाली लड़की से नहीं है. तब तो उसे और सामने आना चाहिए ताकि अफवाहों पर विराम लगे. चलिए सिदार्थ को अमित शाह पर भरोसा नहीं है लेकिन दिल्ली पुलिस को तो खुद पर भरोसा है.

विकास पटेल के हाथ में डंडा है. विकास एबीवीपी जेएनयू का उपाध्यक्ष था. उसके साथ शिव मंडल है जिसके हाथ में डंडा है. विकास के हाथ में जो डंडा है वो पुलिस के पास वाला डंडा लगता है. आज कल पुलिस फाइबर ग्लास के बने डंडे का इस्तमाल करती है. आखिर विकास पटेल के हाथ में ये डंडा कैसे और कहां से आया? ऑनलाइन वेबसाइट से पोलिकार्बेनेट लाठी खरीदी जा सकती है. 950 की तीन लाठियां मिलती हैं. इससे मारने से बिजली के झटके लगते हैं. तो क्या विकास पटेल ने ऑनलाइन डंडा खरीदा या पुलिस से ही लाठी ले ली है? कई व्हाट्सएप चैट सामने आए हैं. इसके बाद भी न तो इनसे पूछताछ की खबर है और न किसी की गिरफ्तारी की. न ही एफआईआर में इनका नाम है.

जेएनयू के वाइस चांसलर आज अचानक मीडिया के सामने आ गए. इसके पहले वे ट्विटर से लोगों के संपर्क में थे. वीसी बहुत कम समय के लिए आए और चले गए. एएनआई ने जो उनके प्रेस कांफ्रेंस की फीड भेजी है उसमें सवाल जवाब नहीं है. क्या वीसी ने सवाल जवाब नहीं लिए? एएनआई से आया वीसी का बयान मात्र एक मिनट दस सेकेंड का है, बस. क्या वीसी को रुक कर सारे सवालों के जवाब नहीं देने चाहिए. वाइस चांसलर कहते हैं कि जो हो चुका उसे भूल जाएं. नई शुरूआत करें.

क्या वीसी के लिए हिंसा की ये तस्वीरें सिर्फ भूल कर आगे बढ़ने की बात भर है? नकाबपोश गुंडे हॉस्टल में घुसते हैं, हमला करते हैं, उनके खिलाफ वीसी ने एक शब्द तक नहीं कहा. विकास पटेल से लेकर शिव मंडल के नाम आए हैं, उनके बारे में एक शब्द नहीं कहा. अपनी यूनिवर्सिटी की टीचर घायल हुई हैं, उनके बारे में इस प्रेस कांफ्रेंस में कुछ नहीं कहा. वाइस चांसलर ने अभी तक घायल शिक्षक से मुलाकात तक नहीं की है. उनका हाल तक नहीं पूछा है.

हमने प्रो. सुचारिता सेन से पूछा कि क्या आपसे वाइस चांसलर ने संपर्क किया, कोई हाल चाल लिया तो उन्होंने कहा कि उम्मीद भी नहीं है और वे नहीं पूछने के लिए उन्हें माफ भी करती हैं. प्रो. सुचारिता सेन ने ढाई पन्नों की शिकायत पुलिस को दी है. वाइस चांसलर ने छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष से मुलाकात तक नहीं की है. क्या इस तरह से वीसी सब भूल कर नई शुरूआत करना चाहते हैं?

वाइस चांसलर को सवालों के ठीक से जवाब देने चाहिए. वो सवाल जो पीछा कर रहे हैं. प्रो. सुचारिता ने अपनी शिकायत में भी इसी तरह के सवाल उठाए हैं. कहा है कि कैसे कैंपस के भीतर बाहर से कोई नहीं आ सकता है. मगर उस दिन इस तरह की भीड़ को इजाज़त दी गई. उनके सहयोगी प्रो. शुक्ला सावंत ने इसके बारे में एक व्हाट्सएप मैसेज किया था. मगर चीफ सिक्योरिटी अफसर ने कहा कि आप पुलिस से बात करें. पुलिस ने कार्रवाई नहीं की.  आखिर जब तक हिंसा हो रही थी तब तक गेट क्यों बंद किए गए. दो घंटे बाद गेट खुलता है तो सिर्फ गुंडों को बाहर जाने देने के लिए. क्या ऐसा हुआ और हुआ तो किसके कहने पर हुआ. जेएनयू के शिक्षकों के कुछ सवाल हैं. वो इस प्रकार हैं...

- पुलिस ने गेट क्यों खोला, वह 60 गुंडों को जेएनयू के कैंपस में आती हुई देखती रही?
- गेट पर सिक्योरिटी और पुलिस ने भीतर आ रहे इन लोगों से आई कार्ड क्यों नहीं मांगा?
- जब वे मास्क पहन कर आ रहे थे तो पुलिस ने नकाब उतारने की बात क्यों नहीं की?
- जब नक़ाबपोश गुंडे भीतर आ गए तब पुलिस ने गेट क्यों बंद किए?
- पुलिस ने मीडिया को भीतर आने से क्यों रोका, खासकर जब हिंसा हो रही थी?

दिल्ली पुलिस की साख दांव पर है. तीस हजारी कोर्ट में हुई हिंसा के वक्त भी थी, जामिया के वक्त भी थी और अब जेएनयू के वक्त भी है. दिल्ली पुलिस गृहमंत्रालय के तहत आता है. सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक बात कही कि अगर कुछ आपात स्थिति पैदा हुई तो चुनाव आयोग के पास अधिकार है कि वह तारीखों के टालने का फैसला ले सकता है. क्या वाकई दिल्ली की ऐसी हालत हो गई है या चुनाव आयोग ने यह कोई सामान्य बात कही है.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने ऐसा क्यों कहा कि अगर ऐसी अतिसाधारण परिस्थित पैदा हुई तो चुनाव की तारीखें टल सकती हैं, क्या वाकई दिल्ली में यह सोचा जा सकता है, ऐसी नौबत आ चुकी है? तारीखें टालने का अधिकार तो चुनाव आयोग के पास होता ही है लेकिन यह बात उस दिन क्यों कही गई? आखिर चुनाव आयुक्त ने दिल्ली चुनाव की तारीख की घोषणा करते वक्त यह बात क्यों कही कि चुनाव टल सकते हैं? झारखंड और छत्तीसगढ़ में चुनाव हो जाता है, क्या उनकी चुनावों की तारीखों के एलान के वक्त भी ऐसा कहा गया था कि अतिसाधारण परिस्थिति पैदा हुई तो चुनाव टल सकते हैं? यही नहीं, क्या आपने सोचा था कि सुप्रीम कोर्ट के अहाते में वकील संविधान की प्रस्तावना पढ़ेंगे,

याद कीजिए 12 जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार जज बाहर आए और मीडिया से कहा कि भारत की न्यायपालिका और लोकतंत्र खतरे में हैं? उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट के भीतर संविधान की प्रस्तावना का पाठ नहीं हुआ लेकिन 7 दिसंबर 2019 को हुआ. वो भी जनवरी थी, ये भी जनवरी है.

क्या कुछ बदल रहा है? क्या कुछ नए लोग भी हैं जो अब बोलने लगे हैं? नागरिकता संशोधन कानून और जामिया जेएनयू में पुलिस और नकाबपोश गुंडों की हिंसा ने क्या फिल्म जगत को बोलने के लिए प्रेरित किया है?

अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा, विशाल भारद्वाज, ज़ोया अख़्तर, ऋचा चड्ढा, स्वानंद किरकिरे, सुशांत सिन्हा, सुधीर मिश्रा, हंसल मेहता, रेखा भारद्वाज, राहुल बोस, नीरज घेवन, स्वरा भास्कर, सोनम, दीया मिर्ज़ा, मुंबई के कार्टर रोड के प्रदर्शन में गए. पांच साल तक डर का आलम ऐसा था कि कोई फिल्म स्टार सिर्फ सरकार की वाहवाही करता ही दिखता था या चुप ही रहता था. क्या फिल्म जगत ने उन खतरों को वैसे ही देखा है जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने 2018 की जनवरी में देखा था मगर उसके बाद चुप हो गए. बड़े बड़े स्टार बोल नहीं पा रहे हैं लेकिन ये स्टार अपने डर से आजाद हो रहे हैं.

गेटवे ऑफ इंडिया पर जाना बड़ी बात है लेकिन जेएनयू जाना और भी बड़ी बात है. मंगलवार शाम दीपिका पाडुकोण जेएनयू पहुंच गईं. आम तौर पर जिसकी फिल्म आती है वो राजनीतिक विवाद से दूर रहता है. दीपिका की फिल्म छपाक आ रही है जिसे मेघना गुलज़ार ने बनाई है. दीपिका न सिर्फ जेएनयू गईं बल्कि वहां गईं जहां पर छात्र संघ की अध्यक्षा आइशी थीं और कन्हैया जय जय भीम के नारे लगा रहे थे.

पैटर्न फिक्स है. दीपिका गईं हैं तो अब उनका ट्रोल होगा कि उनकी फिल्म का बहिष्कार किया जाए. इसी शो में एबीवीपी के सेक्रेट्री कह रहे थे कि ट्रोल के डर से कोमल शर्मा बाहर नहीं आ रही थीं. आप खुद देख लीजिएगा कि कौन किसको ट्रोल करता है. सोशल मीडिया पर दीपिका के बारे में क्या क्या कहा जाता है. भारत बदल रहा है. जो नहीं बदल रहे हैं वो बदला ले रहे हैं.

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