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पीवी नरसिम्हा राव ने अपने विदेश मंत्री को ह्वील चेयर पर क्यों भेजा था ईरान, कैसे किया पाकिस्तान को नाकाम

विवेक शुक्ल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 03, 2026 23:16 pm IST
    • Published On मार्च 03, 2026 23:16 pm IST
    • Last Updated On मार्च 03, 2026 23:16 pm IST
पीवी नरसिम्हा राव ने अपने विदेश मंत्री को ह्वील चेयर पर क्यों भेजा था ईरान, कैसे किया पाकिस्तान को नाकाम

आज जब अमरीका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ी हुई है. इस मौके पर भारत अमरीका-इजरायल के साथ खड़ा नजर आ रहा है. ऐसे में 1994 की एक घटना को याद करना जरूरी है. उस समय भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजने का फैसला किया. जबकि दिनेश सिंह उन दिनों दिल्ली एम्स में भर्ती थे. स्ट्रोक के बाद वो बेहद कमजोर हालत में थे. ऐसे में सवाल उठता है आखिर इतनी क्या मजबूरी थी कि एक बीमार मंत्री को अस्पताल से सीधा ईरान भेजा गया?

क्या था पूरा मामला?

मार्च 1994 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही थी. पाकिस्तान, इस्लामी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के कई देशों के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाना चाहता था. अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता, तो मामला आगे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक जा सकता था, जो भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक मुश्किल बन सकता था.

ईरान क्यों अहम था? विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार के मुताबिक ओआईसी में आमतौर पर फैसले सहमति (कंसेंसस) से होते हैं. अगर कोई बड़ा देश जैसे ईरान साथ न दे, तो सहमति टूट जाती है और प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाता है. यहीं पर ईरान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी. भारत चाहता था कि ईरान इस प्रस्ताव का समर्थन न करे.

बीमार दिनेश सिंह को ही क्यों भेजा गया?

दिनेश सिंह उस समय स्ट्रोक से उबर रहे थे.उनका दिल्ली एम्स में इलाज चल रहा था. इसके बाद भी प्रधानमंत्री राव ने उन्हें ही भेजने का फैसला किया, क्योंकि वे खुद विदेश मंत्री थे और उनका कद और साख ज्यादा थी. ईरान को यह दिखाना जरूरी था कि भारत इस मुद्दे को कितना गंभीर मान रहा है. अगर कोई जूनियर मंत्री जाता, तो उतना असर शायद नहीं होता.एक बीमार और व्हीलचेयर पर आए विदेश मंत्री का जाना अपने आप में एक मजबूत संदेश था.

ईरान में क्या हुआ?

दिनेश सिंह का काम था प्रधानमंत्री राव का निजी संदेश ईरान के राष्ट्रपति अली अकबर हाशमी रफ़संजानी तक पहुंचाना. उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर वेलायती से भी सीधे बात की. बताया जाता है कि ईरानी नेतृत्व उनके स्वास्थ्य की हालत देखकर हैरान रह गया. इससे भारत की गंभीरता का अंदाज़ा उन्हें साफ हो गया.मिशन कुछ घंटों का ही था. दिनेश सिंह सीधे वापस भारत लौटे और फिर अस्पताल चले गए.

नतीजा क्या निकला?

आखिरकार ईरान ने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया. ओआईसी में सहमति नहीं बन पाई और पाकिस्तान की कोशिश कमजोर पड़ गई.ईरान के इस कदम से भारत जिनेवा में एक बड़ी कूटनीतिक हार से बच गया. इस तरह, राव का यह फैसला भले ही जोखिम भरा था, लेकिन उस समय की परिस्थितियों में बेहद अहम और सफल साबित हुआ.

सीधी भाषा में कहें तो,पीएम राव ने दिनेश सिंह को इसलिए भेजा क्योंकि दांव बहुत बड़ा था. भारत को हर हाल में उस प्रस्ताव को रुकवाना था. इसके लिए सबसे मजबूत संदेश भेजना जरूरी था— चाहे उसके लिए बीमार विदेश मंत्री को ही क्यों न जाना पड़े. 

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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