विज्ञापन

हिमालय की ढलानों पर कितना सुरक्षित है पक्का घर बनाना, भूकंप में कौन सा घर अधिक सुरक्षित

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 03, 2026 13:51 pm IST
    • Published On जुलाई 03, 2026 13:51 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 03, 2026 13:51 pm IST
हिमालय की ढलानों पर कितना सुरक्षित है पक्का घर बनाना, भूकंप में कौन सा घर अधिक सुरक्षित

वेनेजुएला में आए दो शक्तिशाली भूकंपों से दुनिया का ध्यान एक बार फिर भूकंप संभावित इलाकों की तरफ गया है. हाल ही में प्रकाशित एक नए अध्ययन में सामने आया है कि पहाड़ी ढलानों पर बनी इमारतों को समतल जमीन पर बने भवनों की तरह नहीं देखा जा सकता. अध्ययन में अधिकांश मामलों में पाया गया कि ढलान बढ़ने के साथ इमारतों को अधिक नुकसान हुआ. शोधकर्ताओं ने पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग भूकंपरोधी भवन मानकों की जरूरत भी बताई है.

ढलान बढ़ने के साथ क्या बढ़ जाता है खतरा

'Innovative Infrastructure Solutions' जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन को चेन्ना राजाराम, शुभम सिंघल और जयाप्रकाश वेमुरी ने तैयार किया है. शोधकर्ताओं ने एक सामान्य तीन और चार मंजिला आरसीसी भवन के मॉडल बनाकर उन्हें समतल जमीन के साथ 10, 20 और 30 डिग्री ढलान पर परखा. इसके बाद इन भवनों पर सात बड़े भूकंपों के रिकॉर्ड किए गए झटकों का प्रभाव देखा गया. इनमें 1979 का इम्पीरियल वैली, 1980 का इरपिनिया, 1989 का लोमा प्रिएटा, 1999 का चाइ-चाइ और 2002 का डेनाली भूकंप शामिल थे.

अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश मामलों में 30 डिग्री ढलान पर बनी इमारतों को सबसे अधिक नुकसान हुआ. तीन मंजिला इमारतों की तुलना में चार मंजिला भवनों में नुकसान का स्तर ज्यादा था. शोधकर्ताओं के अनुसार, पहाड़ी ढलानों पर बने भवनों में सभी खंभों की ऊंचाई समान नहीं होती. इसी वजह से भूकंप के दौरान पूरी इमारत पर दबाव भी एक जैसा नहीं पड़ता और उसका व्यवहार समतल जमीन पर बने भवनों से अलग हो जाता है. अध्ययन में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें 10 डिग्री ढलान पर बनी इमारतों में 20 डिग्री ढलान वाली इमारतों की तुलना में अधिक हलचल दर्ज की गई.

पहाड़ की ढलान पर कितने मंजिला मकान बनाना सुरक्षित रहेगा

अध्ययन में पाया गया कि सबसे ज्यादा नुकसान इमारतों के निचले हिस्से में बने छोटे खंभों में हुआ और यही हिस्से भूकंप के दौरान सबसे अधिक प्रभावित हुए. शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत के मौजूदा भूकंपरोधी भवन मानक पहाड़ी ढलानों पर बनी इमारतों के लिए अलग प्रावधान नहीं करते, जबकि उनका व्यवहार समतल जमीन पर बने भवनों से अलग होता है.

इसी आधार पर अध्ययन में सिफारिश की गई है कि पहाड़ी ढलानों पर बनने वाली इमारतों के लिए अलग भूकंपरोधी डिजाइन दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं. शोधकर्ताओं ने यह भी सुझाव दिया है कि ऐसे भवनों के लिए निर्माण से पहले भूकंप के दौरान भवन के व्यवहार का विस्तृत विश्लेषण अनिवार्य किया जाए. अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर 30 डिग्री ढलान पर चार मंजिला इमारतों के निर्माण की अनुशंसा नहीं की गई है.

घर बनाने से पहले पहाड़ को समझें  

हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में माना जाता है. उत्तराखंड हिमालय का हिस्सा है. वर्ष 1803 का गढ़वाल भूकंप राज्य के इतिहास के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में गिना जाता है. इसके बाद 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए. 1999 के चमोली भूकंप ने भी व्यापक तबाही मचाई थी.

अध्ययन में सामने आए निष्कर्षों को हिमालय की परिस्थितियों से जोड़ते हुए उत्तराखंड के हल्द्वानी में रहने वाले भूगोल के प्रोफेसर बीआर पंत कहते हैं कि पहाड़ों में पारंपरिक निर्माण पद्धति स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और प्राकृतिक ढलानों को ध्यान में रखकर विकसित हुई थी. उनके अनुसार, पहले बड़े पैमाने पर पहाड़ काटकर समतलीकरण करने की बजाय प्राकृतिक ढलान के अनुरूप निर्माण किया जाता था. नीचे की ओर अपेक्षाकृत कम और ऊपर की ओर अधिक जगह छोड़कर निर्माण करने से पहाड़ की प्राकृतिक स्थिरता पर कम असर पड़ता था. उनका कहना है कि आज कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर कटिंग की जा रही है, जिससे ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.

प्रोफेसर पंत बताते हैं कि हिमालय के कई गांव पुराने भूस्खलन वाले क्षेत्रों में बसे हैं और कई गांवों के पीछे खड़ी ढलान मौजूद है. उनके अनुसार, पूरे हिमालय के बारे में एक जैसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि हर क्षेत्र की भूगर्भीय बनावट अलग है. उनके अनुसार, ग्रेट हिमालय और शिवालिक के बीच का अपेक्षाकृत परिपक्व क्षेत्र, जैसे श्रीनगर और गैरसैंण, अपेक्षाकृत अधिक स्थिर माना जाता है. वहीं चंपावत और वल्दियाखान जैसे क्षेत्रों की भूगर्भीय परिस्थितियां अधिक संवेदनशील हैं. प्रोफेसर पंत का कहना है कि पहाड़ों में पारंपरिक काष्ठ और स्थानीय सामग्री से बने भवन अपेक्षाकृत हल्के होते हैं. इसके विपरीत आरसीसी छतों वाली इमारतें गिरने पर लोगों के दबने का खतरा अधिक रहता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Venezuela Earthquake, Himalya
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com