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ईरान पर हमलाः परमाणु समझौता तो बहाना, अमेरिका का असली मकसद ये है

Syed Zubair Ahmed
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 02, 2026 20:52 pm IST
    • Published On मार्च 02, 2026 20:02 pm IST
    • Last Updated On मार्च 02, 2026 20:52 pm IST
ईरान पर हमलाः परमाणु समझौता तो बहाना, अमेरिका का असली मकसद ये है

एक राष्ट्रपति जो ‘हमेशा के लिए युद्ध' खत्म करने के वादे के साथ व्हाइट हाउस लौटे और नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत भी रखते थे- आज वही पश्चिम एशिया में इराक युद्ध के बाद की सबसे बड़ी अमेरिकी सैन्य तैनाती की अगुवाई कर रहे हैं. पहले, अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करते हुए अमेरिकी बलों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कराकास के राष्ट्रपति भवन से उठा लिया और अब ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली खामेनेई के घर पर बमबारी हुई और वे मारे गए. यही आज की हकीकत है और ट्रंप के दौर में अमेरिका ऐसा ही बनता दिख रहा है. ये दबंगई है, वो भी बिना किसी जवाबदेही के.

पूरा पश्चिम एशिया ऐसे अराजक हालात में धकेल दिया गया है, जैसा दशकों में नहीं देखा गया. हवाईअड्डों पर अफरा-तफरी है, बंदरगाह शहरों में बेचैनी है, अमेरिकी ठिकाने हाई अलर्ट पर हैं और ईरान के पलटवार के खतरे में हैं. इधर लाखों भारतीय कामगार, जो हर साल कई डॉलर की रकम घर भेजते हैं, एक ऐसी जंग में फंसे हैं जो उनकी नहीं है. इस उथल-पुथल में बीमा प्रीमियम बढ़ रहे हैं, शिपिंग लेन खतरे में हैं, तेल बाजार घबराया हुआ है और हर सरकार अपने नागरिकों को निकालने की योजना बना रही है.

याद आया इराक पर हुआ अमेरिकी हमला

ट्रंप प्रशासन ने साफ कर दिया है कि परमाणु समझौता कभी असली मकसद नहीं था; असली लक्ष्य इस्लामिक रिपब्लिक को हटाना था. माना जा सकता है कि ये हमले ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए नहीं, बल्कि अंदरूनी ढहाव, आर्थिक तबाही, राजनीतिक टूट और जनविद्रोह की जमीन तैयार करने के लिए हैं. ये इराक 2003 जैसा ही है, फर्क बस इतना कि इस बार निशाना कहीं बड़ा और जवाब देने में सक्षम है.

वॉशिंगटन की सोच शायद ये है कि भारी सैन्य दबाव से या तो तख्तापलट होगा या विपक्षी ताकतें वह कर देंगी जो प्रतिबंध और अलगाव नहीं कर सके. लेकिन इतिहास कुछ और कहता है. हालांकि इतिहास ने कभी अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं को रोका भी नहीं. सबसे खतरनाक बात ये है कि आगे की कोई ठोस योजना नजर नहीं आती. सत्ता परिवर्तन लक्ष्य है, लेकिन उसके बाद क्या? क्या अमेरिका ईरान पर कब्जा करेगा? उसे बांटेगा? कोई कठपुतली सरकार बिठाएगा? निर्वासित विपक्षी समूहों को समर्थन देगा जिनकी घरेलू वैधता नहीं? ये सब रास्ते अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में नाकाम रहे हैं. फिर भी वही पटकथा दोहराई जा रही है. असली मकसद शायद स्थिरता नहीं, बल्कि लंबा अराजक दौर हो, ताकि कोई क्षेत्रीय ताकत इजरायल या अमेरिका को चुनौती न दे सके. अगर यही रणनीति है, तो इंसानी कीमत कोई गलती नहीं, बल्कि योजना का हिस्सा है.

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Photo Credit: AFP

ट्रंप आखिर चाहते क्या हैं?

सबसे परेशान करने वाला सवाल अब ये नहीं कि ट्रंप ने लड़ाई क्यों चुनी. सवाल ये है कि जब ओमान की मध्यस्थता में जिनेवा में बातचीत आगे बढ़ रही थी, तब अमेरिका और इजरायल ने हमला क्यों किया? जंग किसी न किसी वजह से छेड़ी जाती है. कोई भी सैन्य जनरल कहेगा कि युद्ध का उद्देश्य होना चाहिए. किसी ‘मावेरिक' नेता की सनक पर जंग नहीं लड़ी जाती. अगर बातचीत आगे बढ़ रही थी, तो फिर परमाणु कार्यक्रम रोकना असली मकसद नहीं था. 

वॉशिंगटन हफ्तों से तेहरान में रेजीम चेंज की बात कर रहा था. इजरायल को एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाला मौका दिख रहा है- अपने आखिरी बड़े क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को खत्म करने का. सुरक्षा की भाषा हटाइए, तो तस्वीर साफ है. अमेरिका वैश्विक वर्चस्व दोबारा स्थापित करना चाहता है- संदेश ये कि कौन-सी सरकार बचेगी, ये वही तय करेगा. इजरायल पश्चिम एशिया में निर्विवाद सैन्य श्रेष्ठता चाहता है.

ये बलपूर्वक एकध्रुवीयता है. दुनिया से राय नहीं ली गई. संयुक्त राष्ट्र की बैठक नहीं बुलाई गई. सहयोगियों को बस बताया गया, पूछा नहीं गया. कहानी जानी-पहचानी है- पहले खतरा बताओ, फिर युद्ध को जरूरत बताओ, और जैसे ही बातचीत रंग लाने लगे, उसे खत्म कर दो. इराक के काल्पनिक ‘विनाशकारी हथियार' से लेकर लीबिया के ‘मानवीय हस्तक्षेप' तक और अब ईरान तक, कहानी वही है.

ट्रंप का पैटर्न

वेनेजुएला पर प्रतिबंधों का दबाव, फिर हमला और राष्ट्रपति की गिरफ्तारी. क्यूबा पर कब्जे की बात खुल कर करना. ग्रीनलैंड को व्यापारिक सौदे की तरह लेने की जिद. ये अलग-अलग घटनाएं नहीं, एक सोच का हिस्सा हैं. विरोधाभास साफ है. ‘फॉरएवर वॉर्स' खत्म करने का वादा करने वाला राष्ट्रपति अब इराक युद्ध के बाद की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती देख रहा है. अगर ये टकराव घरेलू चुनावी राजनीति से जुड़ा है, तो पिछले तीन दशकों का सबक दोहराया जा रहा है.

पेट्रो डॉलर के वर्चस्व बनाए रखने की लड़ाई

ट्रंप का पश्चिम एशिया युद्ध ये एलान है कि एकतरफा, दबाव वाली अमेरिकी ताकत ही वैश्विक व्यवस्था का केंद्र है. ब्रिक्स-जिसका ईरान भी सदस्य है- वैकल्पिक वित्तीय सिस्टम, ग्लोबल साउथ की एकजुटता- सब बातें उस वक्त बिखर जाती हैं, जब वॉशिंगटन में एक शख्स तय करता है कि कौन-सी सरकार गिरेगी. इसके पीछे ऊर्जा और मुद्रा की सख्त सच्चाई भी है. खाड़ी देश पूरी दुनिया में तेल के सबसे बड़े उत्पादक हैं. डॉलर वही मुद्रा है जिसमें तेल बिकता है. अगर ऊर्जा व्यापार डॉलर से बाहर जाता है, तो वो अमेरिकी ताकत को सीधी चुनौती है. इस नजर से देखें तो ये जंग सिर्फ ईरान नहीं, आर्थिक ढांचे पर नियंत्रण की लड़ाई है.

खाड़ी देशों के लिए ये संकट अस्तित्व का है. वहां अपना डेरा जमाए और बेस बनाए अमेरिका ठिकानों को वो अपनी सुरक्षा छतरी के रूप में देखते हैं, पर अब वही बेस ईरानी जवाबी कार्रवाई का निशाना बन गए हैं. अपने देश को चलाने की उनकी ताकत कहीं और से लिए गए फैसले पर निर्भर दिखती है. वहीं उनकी समृद्धि अब एक ऐसे संघर्ष की बंधक बन गई है जिसे उन्होंने खुद नहीं चुना है.

इससे भारतीय और एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी अछूती नहीं हैं. ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी कामगार, व्यापार मार्ग-सब इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़े हैं. हर तनाव महंगाई, मुद्रा दबाव और घर लौटने की जद्दोजहद में दिखता है.

कभी कहा गया था कि दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है. ब्रिक्स का विस्तार, चीन की मध्यस्थता, रूस का प्रतिबंधों के बावजूद टिके रहना. इन सबने उम्मीद जगाई थी कि एक देश तय नहीं करेगा कि कौन-सी जंग जरूरी है. लेकिन आज वो सपना टूटता दिख रहा है. पश्चिम एशिया की ये जंग सिर्फ क्षेत्रीय संघर्ष नहीं. ये उस विचार की मौत है कि ‘पोस्ट-अमेरिकन' दुनिया आ चुकी है. फर्क बस इतना है कि इस बार दिखावा भी नहीं बचा.

ग्लोबल साउथ के लिए यह पल नया नहीं है, लेकिन ट्रंप का नजरिया खास तौर पर इसलिए साफ है क्योंकि इसमें पुराने डिप्लोमैटिक नाटक को भी छोड़ दिया गया है. हमें बताया गया था कि ईरान ने प्रेसिडेंट ओबामा के समय अमेरिका के साथ ट्रीटी साइन करने के मुकाबले अधिक रियायतें दी हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि ट्रंप इससे खुश नहीं थे.

उस सपने को अलविदा

सालों से, ग्लोबल पॉलिटिक्स की भाषा बदल गई थी. हम बहुध्रुवीय, उभरती ताकतों, एक ऐसी दुनिया की बात करते थे जो अब सिर्फ वॉशिंगटन के कंट्रोल में न हो. ब्रिक्स के देशों की संख्या बढ़ी. चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच बीच-बचाव किया. रूस उन प्रतिबंधों से बच गया जो उसे कमजोर करने के लिए थे. ग्लोबल साउथ ने जलवायु पर बातचीत में, ट्रेड फोरम में, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशन में सुधार पर बहस में अपनी आवाज उठाई. हम सपने देखने लगे थे कि वह दौर खत्म हो रहा है जिसमें एक देश तय करता था कि कौन सी सरकारें बचेंगी और कौन सी लड़ाइयां जरूरी हैं. यह माना जा रहा था कि बहुध्रुवीयता खत्म हो रही है और एक अधिक संतुलित वर्ल्ड ऑर्डर उभर रहा है.

वो वादा अब टूट गया है. यही वजह है कि पश्चिम एशिया में जंग सिर्फ एक क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है. यह एक आइडिया की मौत है. आइडिया ये कि पोस्ट-अमेरिकन दुनिया पहले ही आ चुकी है. मुझे निराशावादी कहो, लेकिन जिस नए वर्ल्ड ऑर्डर की बहुत अधिक चर्चा हो रही है, वह पुराने वाले जैसा ही दिखता है, और एक बार फिर इसे खून से लिखा जा रहा है- जिनेवा में नहीं, न्यूयॉर्क में नहीं, बल्कि तेहरान के आसमान और खाड़ी के पानी में. हां इस बार फर्क बस इतना ही है कि दिखावा भी खत्म हो गया है.

(डिस्क्लेमर: लेखक सैयद जुबैर अहमद लंदन में रह रहे वरिष्ठ भारतीय पत्रकार हैं. इन्हें पश्चिम मीडिया में तीन दशकों का अनुभव है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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