मुस्लिम महिलाओं की तस्‍वीरों की बोली, सोशल मीडिया पर ये घिनौने सौदागर कौन हैं?

सुल्ली और बुल्ली डील ऐप में कोई छह महीने का अंतर भी नहीं है लेकिन दोनों ऐप में उन्हीं मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों का इस्तमाल किया गया है जो विरोध में आवाज़ उठाती हैं.

एक मोबाइल ऐप है बुल्ली बाई. हालांकि इसे अब उस प्लेटफार्म से हटा दिया गया है लेकिन इसी प्लेटफार्म से पिछले साल जुलाई में सुल्ली डील का ऐप डाउनलोड किया गया था. दोनों ही मामलों में केवल मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाया गया है. उनकी तस्वीरें डाली गई हैं और लोगों से बोली लगाने के लिए कहा गया है. पुलिस ने पिछली बार भी मामला दर्ज कर लिया था मगर आज तक कोई गिरफ्तार नहीं हुआ है. पुलिस ने इस बार भी मामला दर्ज कर लिया है. सुल्ली और बुल्ली दोनों ही नाम अभद्र और अश्लील माने जाते हैं.

सुल्ली और बुल्ली डील ऐप में कोई छह महीने का अंतर भी नहीं है लेकिन दोनों ऐप में उन्हीं मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों का इस्तमाल किया गया है जो विरोध में आवाज़ उठाती हैं. 67 साल की खालिद परवीण ने नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ आवाज़ उठाई थी जिनके खिलाफ हरिद्वार में भड़काऊ भाषण देने का मामला दर्ज हुआ है. हैदराबाद की पत्रकार आयशा मिन्हाज़ ने अपनी तस्वीर देख कर कहा है कि भारत में मुस्लिम औरतों की यह दुखद सच्चाई है. इससे भी बुरा हो सकता है. नाबिया ख़ान अपनी कविता को प्रतिरोध की आवाज़ कहती हैं, उनकी तस्वीर भी इस ऐप में है. कश्मीर की पत्रकार कुरतुल रहबर का भी फोटो है और रेडियो मिर्ची की मशहूर रेडियो ऐंकर सायमा का भी. किसी को नजीब की मां फातिमा नफीस का नाम याद रहा जिनका बेटा आज तक सरकार की पुलिस खोज नहीं सकी. मुंबई की वकील फातिमा ज़ोहरा ख़ान का भी फोटो मौजूद था. कइयों ने अलग-अलग शहरों में इस ऐप के खिलाफ केस किया है. 

इन दोनों ऐप को जिन्होंने बनाया है, डाउनलोड किया है, लाइक किए हैं या टिप्पणियां की हैं उन सभी का अलग से अध्ययन होना चाहिए. ताकि पता चले कि ये लोग किन घरों से आते हैं, इनके भीतर मुस्लिम महिलाओं के प्रति इतनी नफरत कहां से आई है. इन्हें किसी भी महिला के प्रति ऐसे ख्याल से आनंद कैसे मिल सकता है. 2018 में जम्मू के कठुआ में बलात्कार के एक मामले से जुड़ा प्रधानमंत्री मोदी का एक बयान है. उस दौरान एक बात हुई थी. बलात्कार के आरोपियों के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाली गई थी. ऐसा कभी नहीं हुआ था. प्रधानमंत्री ने उसका विरोध किया था या नहीं यह सवाल आप उन्हीं से पूछें लेकिन उन्होंने बलात्कार को लेकर सरकारों के बीच तुलना की राजनीति की निंदा ज़रूर की थी.

प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार किसी की भी हो, बलात्कार बलात्कार होता है. यहां एक बात जोड़ना चाहूंगा कि किसी भी समुदाय की महिला हो, उसकी बोली लगाने का ख्याल भी उसी तरह सभी महिलाओं के खिलाफ़ होता है जैसे बलात्कार बलात्कार होता है. सुल्ली और बुल्ली बाई ऐप का मामला केवल मुस्लिम महिलाओं का मामला नहीं है. यह मामला बताता है कि समाज में औरतों को किस तरह से देखा जा रहा है. और देखने की यह छूट राजनीति और धर्म के आधार पर ली जा रही है, दी जा रही है. इसलिए जिन लोगों ने ऐसा ऐप बनाया है, चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम हों, जिन्होंने ये डाउनलोड किया है या इस पर लाइक से लेकर टिप्पणी तक की है उन सभी की काउंसलिंग की जानी चाहिए. मनोचिकित्सक के यहां कुछ हफ्तों के लिए भेजा जाना चाहिए जैसे किसी को नशे की लत छुड़ाने के लिए नशा मुक्ति केंद्र भेजा जाता है. यह मामला केवल पुलिस का नहीं है. पुलिस तो दो चार अपराधियों को पकड़ेगी लेकिन इस सोच के कई लोग जो घरों में मौजूद हैं उन्हें धरा जाना ज़रूरी है. काश इस तरह की सोच किसी ने आशीष, विशाल और कलुआ को सतर्क किया होता.

राहुल ख़ान की हत्या के आरोप में गिरफ्तार आशीष, विशाल और कलुआ को किसी ने सतर्क कर दिया होता. झगड़े की वजह जो भी रही हो लेकिन जब इन तीनों को राहुल ख़ान पर गुस्सा आया तो वे उसे मुल्ला कहने लगे और खुद को हिन्दू. मुल्ला मौलवी का इस्तमाल तो दोहों और कविताओं में होता ही है लेकिन इन तीनों का राहुल ख़ान को मुल्ला कहना अलग है. उसमें मुल्ला के बहाने मुसलमानों से घृणा है और यह घृणा राजनीति के ज़रिए भरी गई है. नफरत ही थी कि मुल्ला मुल्ला कहते कहते तीनों कथित रूप से हत्या कर बैठे. आशीष, विशाल और कलुआ का किसी राहुल खान या इस्माइल से झगड़ा हो सकता था, होता रहता है लेकिन उन्हें हत्या की सोच तक ले जाने वाले कौन से शब्द हैं, कौन सी सोच है, इसे आज समझ लीजिए. सोशल मीडिया, राजनीति और गोदी मीडिया की बहसों से जिन बातों को मंज़ूरी मिल रही है उन्हीं की चपेट में आकर ये तीनों हत्यारे बन गए और अब जेल में हैं. यह घटना पिछले साल दिसंबर की है और हरियाणा की है.

आपके दिमाग़ में नफरत के अलग अलग खांचे बनाए जाते हैं ताकि आप एक प्रकार की नफरत को दूसरे प्रकार की नफरत से सही ठहराते रहें. मिसाल के तौर पर मुमकिन है कि कोई बलात्कार को गलत कहेगा लेकिन आबादी के आधार पर फैलाए जाने वाली नफरती बातों को सही बताएगा. जैसे धर्म संसद में मुसलमानों के प्रति हिंसा की बात को कई लोगों ने गलत कहा लेकिन मुमकिन है उनमें से कई लोग कोरोना को तब्लीग जमात से जोड़ने की बात को सही बता चुके होंगे. मुमकिन है कि कई लोग दंगों को ग़लत कहें मगर सुल्ली डील ऐप डाउनलोड कर मज़ा लेने लगें. मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के प्रति यह सोच सुल्ली और बुल्ली डील्स के ज़रिए पहली बार सामने नहीं आई है.

दिल्ली दंगों के आरोप में जब सफूरा ज़रगर को गिरफ्तार किया गया तब उनके गर्भवती होने को लेकर खतरनाक तरीके से ट्विटर पर लिखा गया और मज़ाक उड़ाया गया. मई 2020 में सफूरा को लेकर अश्लील मीम बनाए गए. उनकी शादी को लेकर अनाप शनाप बातें कही गईं. इस वक्त सफूरा ज़मानत पर हैं. उसी तरह जब भी मुस्लिम महिलाएं सार्वजनिक मुद्दों पर बोलती हैं और लड़ती हैं तो उनके औरत होने और एक विशेष धर्म से होने का मज़ाक उड़ाया जाता है और उस आधार पर गालियां दी जाती हैं. एक तरफ आप बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे लगाते हैं और दूसरी तरफ इस्मत आरा, हिबा मोहसिन खान नाम की महिलाओं की तस्वीर लगाकर बोली लगाते हैं. उम्मीद है मेरी बात समझ आ गई होगी.

इस खेल में केवल मोबाइल ऐप नहीं है, गोदी मीडिया भी है, नेताओं और धर्म गुरुओं के भाषण हैं. जो अपने भाषण में लाखों लोगों को मारने की बात करते हैं उसी वक्त आपको याद करना चाहिए कि लाखों लोगों की हत्या करने के लिए हज़ारों हत्यारे किनके घरों के बेटे बनेंगे? इतना समझ जाएंगे तो ऐसी बातों से अलर्ट होने लग जाएंगे. ध्यान रहे कि हर पल लाखों की संख्या में सामग्रियां तैयार कर ठेली जा रही हैं. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज़रिए आपके परिवार के मर्दों और बेटों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है. औरतें भी इस खेल में शामिल होने लगी हैं.

इतिहास को हिन्दू और मुस्लिम कालखंड में बांटने की रणनीति अंग्रेज़ों की थी ताकि इस आधार पर बांट कर वे राज कर सकें. यह रणनीति आज तक जारी है और इसी आधार पर आपके सामने गुलामी की कहानी खड़ी की गई ताकि आप अतीत का बदला लेना अपना कर्तव्य समझने लगें. इसके बाद आबादी का भूत खड़ा किया गया ताकि आबादी के नाम पर आप नफरत कर सकें. फिर धर्मांतरण और लव जिहाद के नाम पर ऐसा भूत खड़ा किया गया ताकि शादी और प्यार करने के निजी फैसलों पर नियंत्रण कायम किया जा सके. बीच बीच में थूक जिहाद की चर्चा टीवी के माध्यम से खड़ी की जाती है ताकि आप खाने को लेकर नफरत करने लगें. फिर गाय के नाम पर नफरत का सैलाब बहाया जाता है. बात यहीं तक नहीं रुकती है. यूपीएससी जिहाद नाम से चर्चा खड़ी की जाती है और इससे भी आगे जाकर कोरोना जिहाद का भूत खड़ा किया जाता है ताकि आप किसी न किसी बहाने मुसलमान से नफरत करते रहें. खाने से लेकर पहनने तक की हर चीज़ पर इसी तरह के जिहाद वाली सोच से हमला किया जाता रहा है. न्यूज़ ऐंकर ही कोरोना जिहाद का इस्तमाल कर रहे थे, उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो फिर सुल्ली डील और बुल्ली बाई ऐप को लेकर ही क्या कार्रवाई हो जाएगी.

नफ़रत से जुड़े मुद्दों का जाल इतना बड़ा हो चुका है कि आप निकलने के नाम पर उलझते ही जाएंगे. क्या आपको पता है कि आपका बेटा या पति इस तरह से सोचने लगा है, रिटायर्ड अंकिलों से भी चेक कर लीजिएगा. आपकी सुविधा के लिए इस सवाल को और सिम्पल कर देता हूं. क्या आप चाहेंगे कि आपका बेटा बलात्कारी और हत्यारा बने? हवा से यह सवाल नहीं आया है.

90 साल पहले के जर्मनी में ठीक यही हुआ था. हिटलर की नात्ज़ी सेना और उसके समर्थक यहूदियों के खिलाफ तरह तरह से नफरत फैला रहे थे. आबादी के नाम पर यहूदियों को टारगेट किया गया, नस्ल के नाम पर टारगेट किया गया. व्यापार में उनकी मौजूदगी के नाम पर टारगेट किया गया, रूस और कम्युनिस्टों के समर्थक के नाम पर टारगेट किया गया. टारगेट करने के लिए तरह तरह के झूठ रचे गए. इसी तरह से यहूदी औरतों को भी टारगेट किया गया. पहले उनके शरीर को लेकर तरह तरह की बातें होने लगीं. लोग हंसने लगे और बात करते करते घर परिवार की चर्चाओं में जगह देने लगे. तब सबको लगता था कि ठीक हो रहा है. कुछ भी ग़लत नहीं है. ठीक उसी तरह से जैसे बुल्ली बाई ऐप और सुल्ली डील के ज़रिए बहुतों के बीच इसे टेस्ट किया जा रहा है कि मुस्लिम औरतों को लेकर ऐसी बातें की जा सकती हैं. उनकी बोली लगाई जा सकती है. उनके वीडियो शेयर किए जा सकते हैं. हिटलर की जर्मनी में इसी तरह की सोच ने कई जर्मन लड़कों और मर्दों को हत्यारा और बलात्कारी बना दिया. उन्हें लगता ही नहीं था कि बलात्कार गलत है. अपराध है. आज दुनिया भर में औरतों के खिलाफ हिंसा को समझने के लिए उन लड़कों की करतूत को पढ़ाया जाता है क्योंकि वह केवल यहूदी औरतों के खिलाफ नहीं था बल्कि आगे चल कर कई देशों में इसे दोहराया गया और दोहराया जा रहा है.

जर्मनी आज तक उस अतीत से पीछा नहीं छुड़ा सका है जबकि आज भी जर्मनी में नात्ज़ी विचारधारा से जुड़े लोगों को ढूंढ ढूंढ कर सज़ा दी जाती है. आपको इंटरनेट में ऐसी अनेक खबरें मिलेंगी कि नात्ज़ी दौर में भूमिका के आरोप में 90-90 साल के बुजुर्गों को सज़ा दी गई है. ऐसा आप भारत में नहीं सोच सकते. दंगों में शामिल लोग आरोप मुक्त हो जाते हैं और जब तक साबित होता है तब तक कई चुनाव जीत जाते हैं. इंसाफ़ के इस शानदार पैमाने के बाद भी जर्मनी उस अतीत को आज तक ढो रहा है क्योंकि हिंसा की हर कहानी में जर्मनी के उस दौर का ज़िक्र आ ही जाता है. जैसे कि हम आज कर रहे हैं. इसीलिए सुल्ली डील या बुल्ली बाई ऐप जैसी चीज़ का हमेशा विरोध करना चाहिए ताकि भविष्य में दुनिया के दूसरे देशों में भारत का ज़िक्र इस तरह से न आए.

23 साल की इस्मत आरा द वायर से जुड़ी पत्रकार हैं. पत्रकारिता में पढ़ाई के दौरान ही इस्मत की रिपोर्ट न्यूज़18डॉट कॉम, बीबीसी हिन्दी, क्विंट, न्यूज़ लौंड्री, आक्सफेम इंडिया, फर्स्टपोस्ट, हफिंगटन पोस्ट इंडिया और द हिन्दू में छपने लगी थी. इस्मत जाना माना नाम हैं, उन्हें इंडिया टुडे के कांक्लेव में बुलाया गया था. पिछले दो साल के दौरान इस्मत ने लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दों को हर तरह के एंगल से कवर किया है. बताया है कि इस मुद्दे की चपेट में लोगों ने इस कदर से सोचना बंद कर दिया है कि जो नाबालिक मानसिक रुप से विक्षिप्त है उस पर भी धर्मांतरण का केस लाद दिया गया. यूपी के हाथरस में बलात्कार की घटना की रिपोर्टिंग के दौरान भी इस्मत आरा को ट्रोल किया गया था और किया ही जाता रहा है. बहुत कम समय में इस्मत आरा ने अपनी रिपोर्टिंग का विस्तार किया है और जान जोखिम में डालकर अनजान जगहों पर गई हैं. इन तस्वीरों में इस्मत भारत की एक आम लड़की की तरह ही हैं जिसके अपने सपने हैं. जिसके पहली बार पायलट बन जाने या पहली बार ट्रक चलाने लेने की खबरों की हेडलाइन पर यह महान देश लोट पोट हो जाता है लेकिन उसी महान में सुल्ली डील और बुल्ली बाई ऐप भी आ जाते हैं जहां इस्मत जैसी मुस्लि‍म महिलाओं की तस्वीरें डाल कर बोली लगाने का सुख बांटा जाता है. हम इस्मत की इजाज़त से ही उनकी तस्वीरें दिखा रहे हैं, वैसे इंटरनेट पर जाकर इस नौजवान पत्रकार की हर रिपोर्ट पढ़ सकते हैं जिससे पता चल जाए कि इस्मत की तस्वीर इसमें क्यों है. क्योंकि वह लव जिहाद और धर्मांतरण के नाम पर खड़े किए जा रहे बोगस मुद्दों और नफरत के जाल को उजागर कर देती हैं. इस साल के पहले दिन जब इस्मत अपने व्हाट्सएप में बधाइयों का जवाब दे रही थीं, तो एक मैसेज में बुल्ली बाई डील्स का वीडियो देखकर सन्न रह गईं. इस्मत ने अपने ट्वीट मे लिखा, 'कितना दुखद है कि एक मुस्लिम महिला के नाते इस तरह के भय और घृणा के साये में नया साल शुरू करना पड़ रहा है.'

जुलाई 2021 में सुल्ली डील्स का मामला सामने आया था. उसमें भी मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें थीं और बोली लगाई जा रही थी. सुल्ली डील्स के समय आल्ट न्यूज़ ने काफी गहराई से इसे लेकर ट्वीट करने वालों की पड़ताल की थी. द वायर में इसे विस्तार से छापा गया था. मोहम्मद ज़ुबेर, प्रतीक सिन्हा और पूजा चौधरी ने एक एक चीज़ खंगाल डाली थी. एक ट्वीटर हैंडल का नाम था - ‘UrLocalSulliDealer' (@sullideals101) was operating since 2019, और बताया था कि योरलोकल सुल्ली डीलर के नाम से 2019 से ही एक ट्विटर हैंडल मौजूद था. इस तरह के कई अकाउंट से सुल्ली डील ऐप का प्रचार किया जा रहा था. हालांकि अब ये अकाउंट बंद कर दिए गए हैं लेकिन आल्ट न्यूज़ ने इन सबकी स्क्रीन शाट लेकर रिपोर्ट तैयार की थी. जैसे @sullideals786, @sullideals जिसमें बताया जा रहा है कि सुल्ली डील ऐप जल्दी ही आ रहा है. नीलामी के लिए ट्विटर पर बोट्स तैयार किए जा रहे हैं. एक अकाउंट मिला था @MCMughal जिसका पूरा नाम था महाराजा गुलाब सिंह अल्पसंख्यक कल्याण योजना. जिसके तहत मर्दों को मुस्लिम महिलाओं की बोली लगाने के लिए बुलाया जा रहा था. मई 2021 में यू ट्यूब में एक वीडियो लिंक मिलता है जिसमें दर्शकों के बीच मुस्लिम महिलाओं की बोली लगाने की बात की जाती है. उनका रेट तय करने की बात होती है. इनमें पाकिस्तानी महिलाओं की तस्वीरों का इस्तमाल किया गया था. यू ट्यूब ने इस वीडियो को बाद में हटा दिया. ऐसे अनाम अकाउंट के पीछे कई असली नाम थे. जैसे आल्ट न्यूज़ ने @LiberalDogeReal. हैंडल चलाने वाला बिहार का 23 साल एक लड़का था, रितेश झा. इस ऐप के लिए मुस्लिम लड़के जावेद आलम को दोषी ठहराया गया था लेकिन आल्ट न्यूज़ ने अपनी पड़ताल में पूरी तरह से गलत पाया. ज़ुबैर, प्रतीक और पूजा ने कई तरह के खातों के क्रम से साबित कर दिया था कि इसके पीछे की कहानी कुछ और है. क्रुनाल नाम से कोई था जो ट्विटर से लेकर कू पर एक ही नाम से खाता खोले हुए था, डंकचिकित्सक के नाम से. पूरी बात जानने के लिए आप पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं. ह‍ना मोहसिन ख़ान पायलट हैं इनकी तस्वीर सुल्ली डील्स में इस्तमाल की गई थी. हना ने मामला दर्ज कराया लेकिन उसका पीछा करना भी हना को बीमार सा कर गया और कुछ हुआ भी नहीं.

उनका भी कुछ नहीं होता जो आए दिन महिला पत्रकारों को अनाप शनाप लिखते रहते हैं और बलात्कार की धमकी देते रहते हैं. सरकार के सवाल करने वाली कई महिला पत्रकारों को इसका सामना करना पड़ता है. उन्हें दी जाने वाली धमकियों में बलात्कार की धमकी होती ही है. मामला जुलाई 2021 में भी दर्ज हुआ था और जनवरी 2020 में भी दर्ज हुआ है. अपराधी न तब पकड़े गए थे और न अभी तक पकड़े गए हैं.

हमारे सहयोगी मुकेश सिंह सेंगर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जुलाई महीने में जब सुल्ली डील्स मामले में केस दर्ज हुआ था तब दिल्ली पुलिस ने अमरीका में गिटहब प्लेटफार्म को नोटिस जारी किया था. आज तक इस प्लेटफार्म ने जवाब नहीं दिया कि सुल्ली ऐप बनाने वाला कौन था. आईटी मंत्री अश्वनी वैष्णव ने ट्वीट किया है कि गिटहब ने यूजर को सुबह ही ब्लॉक करने की पुष्टि की है और आगे की कार्रवाई की जा रही है. दिल्ली और मुंबई पुलिस साथ मिलकर काम कर रही है. जिन महिलाओं के नाम आए हैं उन्होंने केस तो किए हैं मगर किसी को उम्मीद नहीं कि अपराधी पकड़ा जाएगा.

इन मामलों में एक पैटर्न और है. अकाउंट का बंद कर देना. इससे बहुत नुकसान नहीं होता है. नई आईडी से नया अकाउंट फिर बन जाता है. कई बार हम इसी को कार्रवाई मान लेते हैं कि ट्विटर ने अकाउंट बंद कर दिया और डिलिट कर दिया. आप किसी मंत्री के बारे में कुछ बोल दें तो मानहानि का नोटिस आ जाता है लेकिन यहां थोक के भाव में महिलाओं को निशाना बनाया गया है लेकिन ख़ानापूर्ति होती लग रही है. मामले दर्ज होते हैं और अपराधी बच जाते हैं.

कभी नस्ल के नाम से तो कभी जाति के नाम से, कभी मज़हब के नाम से तो कभी मुल्क के नाम से औरतों के शरीर को निशाना बनाया जाता रहा है. अमरीका में अश्वेत औरतों के साथ जो हुआ और भारत में दलित औरतों के साथ जो आए दिन होता रहता है उसे आप इस संदर्भ में देखेंगे तब आप समझ पाएंगे कि सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई डील्स का मामला केवल मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ नहीं है, यह सभी महिलाओं के खिलाफ है. समुदाय के नाम पर औरतों को निशाना बनाया जाता है ताकि उनके और अपने समुदाय की औरतों के शरीर पर हिंसा के अधिकार को स्थापित किया जा सके. मतलब मर्द यह समझ लें कि औरतों को अलग अलग बहाने से मारना उनका अधिकार है. केवल आम औरतों को निशाना नहीं बनाया जाता है, जो महिलाएं सत्ता में चोटी के पदों पर होती हैं वे भी नहीं बचती हैं. ट्विटर और फेसबुक पर ये औरतों आए दिन किसी न किसी बहाने से ऐसी सोच का शिकार होती रहती हैं. उनके पोस्ट पर अभद्र टिप्पणियां लिखी जाती हैं जिन्हें आप गंदी गंदी बातें कहते हैं. इसलिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ट्रक पर लिखने से कुछ नहीं होने वाला है. घर में बात करने से होने वाला है.

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उम्मीद है आप इसे समझेंगे. ऊपर से छोटी और समान्य लगने वाली इन घटनाओं के भीतर साज़िश की गहराई पर नज़र रखिए. दूसरों के घरों में आग लगाने के नाम पर आपके घरों में आग लगाने की तैयारी है. इसलिए हमेशा इन बातों का विरोध कीजिए. ब्रेक के बाद चीन से जुड़ी खबर है. सीमा पर चीन को लेकर तनाव है. तनाव की खबरों का आना कभी कम नहीं हो रहा है. बस चीन की चर्चा पाकिस्तान की तरह नहीं होती है. 2020 में भ्रम फैलाया जा रहा था कि मोबाइल ऐप डिलिट कर कोई बड़ी कार्रवाई की जा रही है. 2021 में चीन से आयात पहले से ज़्यादा बढ़ गया है. पिछले छह सालों में आयात बढ़ा ही है. बढ़ना ही था.