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This Article is From Mar 08, 2019

जूताकांड : 'लो एंड ऑर्डर' का दौर, अज्ञात पर FIR!

विराग गुप्ता
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 08, 2019 19:20 pm IST
    • Published On मार्च 08, 2019 19:20 pm IST
    • Last Updated On मार्च 08, 2019 19:20 pm IST

उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर के कलेक्ट्रेट दफ्तर में सांसद और विधायक के बीच मारपीट के बाद उनके समर्थकों द्वारा तोडफोड़ भी की गई भाजपा हाईकमान ने इसे अनुशासनहीनता का मामला बताते हुए नेताओं को फटकार लगाई और मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. दूसरी ओर पुलिस द्वारा आईपीसी की धारा 143 (गैरकानूनी जमावड़ा), धारा 427 (शरारती तत्व) और सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के कानून के तहत अज्ञात लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करके मामले में लीपापोती कर दी गई. जिला योजना समिति की इस मीटिंग में राज्य सरकार के मंत्री, जिलाधिकारी,  सांसद, विधायकों समेत कई अन्य अधिकारी भी शामिल थे. इस प्रकरण में न तो वीडियो से छेड़छाड़ का डिफेंस है, न ही विपक्षी नेताओं का साजिश का आरोप और न ही किसी पक्ष ने इस घटनाक्रम से इंकार किया है, तो फिर दोषी लोगों के विरुद्ध नामजद एफआईआर क्यों नहीं होती?

अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर से मामले की लीपापोती
इस पूरे घटनाक्रम में तीन तरह के आपराधिक कृत्य हुए हैं. जनप्रतिनिधियों से मारपीट, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान और कदाचार-भ्रष्टाचार के आरोप. गाली-गलौच, धमकी और पिटाई के लिए आईपीसी की अनेक धाराओं के तहत विधायक और सांसद दोनों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने चाहिए. विधायक या सांसद पिटने के बावजूद यदि मामले दर्ज नहीं कराते तो कलेक्ट्रेट के प्रत्यक्षदर्शी अधिकारियों को दोषी व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराके अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए. सरकारी मीटिंग में विधायक को जूते और सांसद को थप्पड़ पड़ने के बावजूद मामला दर्ज नहीं हुआ तो इससे असामाजिक तत्वों का मनोबल बढ़ेगा. भविष्य में कोई व्यक्ति विधायक और सांसद के साथ यदि दुर्व्यवहार करे तो फिर उन मामलों में आपराधिक कार्यवाही कैसे होगी?

सरकारी सम्पत्ति को नुकसान और खजाने की बंदरबांट
जूतेबाजी के बाद दोनों पक्षों के समर्थकों द्वारा कलेक्ट्रेट परिसर में सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के साथ पुलिस अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार भी किया गया. हुड़दंगियों ने टीवी चैनल वालों को इंटरव्यू देते हुए विधायक और सांसद पर कदाचार के गम्भीर आरोप लगाए. सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों के अनुसार समर्थकों द्वारा किए गए नुकसान के लिए, उनके नेता की जिम्मेदारी और जवाबदेही होती है. सरकारी सम्पत्ति के नुकसान के लिए विधायक और सांसद दोनों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही होने से ही आम जनता में कानून के प्रति सम्मान बढ़ेगा. इन आरोपों के मद्देनजर विधायक और सांसद के खिलाफ कदाचार की लोकायुक्त या अन्य एजेंसी द्वारा जांच होनी चाहिए.

ट्रांसफर का गोरखधंधा और लॉ एंड आर्डर
मध्यप्रदेश में प्रचार के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य की कांग्रेस सरकार पर ट्रांसफर संस्कृति चलाने के आरोप लगाए हैं. उनके अनुसार मध्यप्रदेश में लॉ एंड ऑर्डर की बजाए 'लो एंड ऑर्डर' शुरू हो गया है, जिसमें पैसे लेकर ट्रांसफर होते हैं. विधायक राकेश सिंह बघेल और सांसद शरद त्रिपाठी के बीच भी थानेदार के ट्रांसफर को लेकर ठनी थी, जिसमें विधायक जीत गए. जातीय समीकरण या राजनीतिक आग्रहों से ट्रांसफर होने से पुलिस अधिकारियों का मनोबल गिरता है. जूता कांड से उत्तर प्रदेश के लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़े होने के साथ लो एंड ऑर्डर संस्कृति का भी खुलासा होता है. यह भाजपा का आंतरिक मामला नहीं है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टोलरेंस की बात करने वाले प्रधानमंत्रीजी लो एंड ऑर्डर के खिलाफ सख्त कार्यवाही करके एक नई मिसाल क्यों नहीं पेश करते?  

विज्ञापन, नाम, फोटो और जूते के तालमेल से हो सही विकास
संत कबीर नगर में सड़क शिलान्यास के शिलापट पर सांसद का नाम नहीं होने से यह अशोभनीय घटना हुई. चुनावों के पहले पूरे देश में शिलान्यास और उद्घाटनों की बाढ़ आई है. अमेठी में स्मृति ईरानी और राहुल गांधी के बीच विवाद से यह भी नहीं पता चल रहा कि उद्घाटन कब हुआ और किसने किया? शिलान्यास और उद्घाटनों में पार्टी और सरकार के बीच खत्म होता फर्क, लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार जो व्यक्ति अधिकार और मान्यता ले,  उसे जवाबदेही भी लेनी चाहिए. शिलान्यास के नाम पर जनता के पैसों की बर्बादी पर रोक लगाने के लिए अब जल्द ही कानून बनना चाहिए. विधायक, सांसद और मंत्रीगण जनता के पैसे से विकास कार्य कराते हैं, जो उनकी संवैधानिक जवाबदेही भी है. जो नेता शिलापट और अखबारों में अपना नाम आगे बढ़ाते हैं, वे लोग योजनाओं में विलम्ब या भ्रष्टाचार के मामलों की जवाबदेही भी क्यों नहीं लेते?

माननीय सांसद, विधायक के विशेषाधिकार हनन पर कार्यवाही हो
उत्तर प्रदेश समेत सभी राज्य सरकारों ने विधायकों और सांसदों के सम्मान के लिए प्रोटोकॉल निर्धारित किया है. लोकतंत्र के इन प्रहरियों को सरकारी महकमों में माननीय का दर्जा मिलता है. सरकारी मीटिंग में सांसद एवं विधायक द्वारा एक-दूसरे को पीटे जाने पर विधानसभा और संसद की गरिमा भी भंग हुई है. लोकसभा के चुनावों की अधिसूचना अभी जारी नहीं हुई है तो फिर सांसद की पिटाई पर लोकसभा अध्यक्ष और विशेषाधिकार समिति द्वारा कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? विधायक को सांसद द्वारा जूते से पीटे जाने पर राज्य विधानसभा द्वारा यदि कार्यवाही नहीं की गई, तो आम जनता में इसका क्या संदेश जाएगा?

 

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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