भारतीय राजनीति में एक अलिखित नियम है: जो दिल्ली पर राज करना चाहता है, उसे पहले लखनऊ जीतना होता है. अस्सी लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय वर्चस्व की नींव है. यही वजह है कि पार्टी ने पिछले सप्ताह राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को इस राज्य का प्रभारी नियुक्त कर एक बेहद संकेतात्मक और रणनीतिक कदम उठाया है. बीजेपी नेतृत्व पिछले करीब दो साल से यूपी प्रभारी का पद खाली रखे हुए था. उसे अब भरा गया है. इस अहम ज़िम्मेदारी के लिए बिहार चुनाव में एनडीए को शानदार जीत दिलाने वाले संगठनात्मक रणनीतिकार तावड़े को चुना गया है, जबकि जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है.
यूपी में बिहार दोहराने की चुनौती
इस नियुक्ति का ऐतिहासिक वज़न समझने के लिए हमें 2013-14 के दौर में लौटना होगा. उस समय संगठन ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया था, जब राज्य में बीजेपी के पास केवल दस लोकसभा सीटें थीं और 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज़ 12 फीसद वोट मिले थे. शाह ने अगले एक साल में 93 हज़ार किलोमीटर की यात्रा की, 52 ज़िलों का दौरा किया और एक ऐसी सामाजिक इंजीनियरिंग खड़ी की, जिसने क्षेत्रीय क्षत्रपों की जातिवादी राजनीति को छिन्न-भिन्न कर दिया. नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी-गठबंधन को 80 में से 73 सीटों की ऐतिहासिक जीत के रूप में सामने आया. इसने अंततः अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष पद तक पहुंचाया. खुद अमित शाह ने हाल ही में एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती संगठन को दुरुस्त कर मोदी की लोकप्रियता को वोट में बदलना और जातिवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित के लिए मतदान का पैटर्न लोगों के मन में बिठाना था. यही वह पटकथा है, जिसे अब विनोद तावड़े के कंधों पर दोहराने की अपेक्षा की जा रही है.इसमें फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चुनौती और भी जटिल है, क्योंकि विरोधी पक्ष कहीं अधिक चतुराई से जातीय समीकरण साध चुका है.
तावड़े की नियुक्ति इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वे इस भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार दिखते हैं. महाराष्ट्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले तावड़े देवेंद्र फडणवीस सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं. हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों का प्रभार संभालने के बाद, विशेषकर 2025 के बिहार चुनाव में एनडीए की प्रचंड जीत में उनकी भूमिका को अहम माना गया. इसके बाद उन्हें बीजेपी की सबसे बड़ी और सबसे जटिल चुनावी प्रयोगशाला उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है. 62 साल के तावड़े एक मराठा नेता हैं. उन्हें नई राष्ट्रीय टीम में सुनील बंसल के साथ इकलौते ऐसे महासचिव के रूप में बरकरार रखा गया है, जो संगठन के प्रति उनके असाधारण योगदान का प्रमाण है. यह भी संयोग नहीं कि करीब डेढ़ साल से वे यूपी में सक्रिय रहे हैं, संगठनात्मक चुनावों, ज़िला स्तर की टीमों के गठन और कैबिनेट विस्तार जैसी प्रक्रियाओं में शामिल रहकर उन्होंने राज्य की नब्ज़ पहले ही टटोल ली है.

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यूपी में तावड़े की चुनौती क्या है
अब सवाल यह है कि तावड़े और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो अपने तीसरे लगातार कार्यकाल की तैयारी में जुटे हैं, के सामने असली राजनीतिक चुनौती क्या है. इसका जवाब एक शब्द में है: क्या हिंदुत्व-आधारित विकास का मॉडल जातिगत गोलबंदी की राजनीति पर विजय पा सकेगा? यह प्रश्न केवल अकादमिक नहीं, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से सीधे उपजा है, जिसने बीजेपी के अभेद्य किले की छवि को गहरी चोट पहुंचाई थी. समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने अस्सी में से 43 सीटें जीतकर बीजेपी-नीत एनडीए को छत्तीस सीटों पर समेट दिया. अकेले सपा ने 37 सीटें जीत कर देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव पाया. अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों में सेंध लगाकर बीजेपी के उस सामाजिक गठबंधन को तोड़ दिया, जिसे पार्टी ने 2014 के बाद बड़ी मेहनत से खड़ा किया था.
यही वह पृष्ठभूमि है जो तावड़े और योगी के सामने खड़े इस राजनीतिक टेम्पलेट को इतना शक्तिशाली और भावनात्मक बना देती है. यह केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि यह तय करने की लड़ाई है कि क्या राम मंदिर, हिंदुत्व की सांस्कृतिक पहचान, डबल इंजन सरकार का विकास मॉडल और लाभार्थी योजनाओं का जाल, यह सब मिलकर जातिगत विभाजन की उस राजनीति पर भारी पड़ सकता है, जिसे दशकों से उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना का अभिन्न हिस्सा माना जाता रहा है. बीजेपी की छह-सूत्रीय रणनीति में बूथ सशक्तिकरण, सामाजिक संतुलन, योगी सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याणकारी कामों का प्रचार और करोड़ों लाभार्थियों से सीधा संपर्क शामिल है. यह सब मिलकर एक ऐसी कथा बुनने की कोशिश है, जिसमें विकास और हिंदुत्व एक साथ चलें, न कि परस्पर विरोधी शक्तियों के रूप में. यह भावनात्मक अपील इसलिए भी प्रभावी हो सकती है क्योंकि यह मतदाता को जाति की संकीर्ण पहचान से ऊपर उठाकर एक व्यापक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने का प्रयास करती है, जिसमें राम मंदिर एक भावनात्मक प्रतीक और एक्सप्रेसवे-रोज़गार व्यावहारिक प्रमाण दोनों साथ-साथ काम करते हैं.
बीजेपी कैसे करेगी सपा के पीडीए का मुकाबला
लेकिन इस शक्तिशाली टेम्पलेट के सामने कम से कम दो गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं, जिनसे तावड़े और योगी दोनों को जूझना होगा. पहली चुनौती यह है कि अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला अब भी ज़मीन पर मज़बूती से टिका हुआ है. वे इसे लगातार परिष्कृत कर रहे हैं, हाल ही में जनेश्वर मिश्र जयंती पर उन्होंने यहां तक कह दिया कि 'पी' का मतलब 'पंडित' भी है, यानी वे अब सवर्ण वोटों में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि बीजेपी के मूल आधार को ही चुनौती दी जा सके . यह दिखाता है कि जातिगत गोलबंदी की राजनीति स्थिर नहीं, बल्कि लगातार विकसित हो रही रणनीति है, जिसका सामना करने के लिए बीजेपी को भी उतनी ही चुस्ती से अपना सामाजिक समीकरण साधना होगा, खासकर तब जब गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित, जिन्हें बीजेपी ने कभी अपना गढ़ माना था, अब पूरी तरह एकजुट होकर पार्टी के साथ नहीं दिख रहे. दूसरी चुनौती संगठन और सरकार के बीच समन्वय की है, विश्लेषकों का मानना है कि 2024 की हार का एक बड़ा कारण संगठन और सरकार के बीच तालमेल की कमी तथा ज़मीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी थी. तावड़े की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या वे योगी सरकार और पार्टी संगठन के बीच उस समन्वय को फिर से स्थापित कर पाते हैं, जिसने कभी अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी को अभूतपूर्व सफलता दिलाई थी.
अंततः, विनोद तावड़े की नियुक्ति केवल एक संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव और उससे आगे 2029 के लोकसभा चुनाव तक की एक दीर्घकालिक रणनीतिक शुरुआत है. अमित शाह ने 2014 में जातिवाद की दीवारों को तोड़कर एक नया इतिहास रचा था; अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तावड़े अपने संगठनात्मक कौशल और योगी आदित्यनाथ के विकास व हिंदुत्व के मिश्रित मॉडल के सहारे उस इतिहास को दोहरा पाते हैं या फिर अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय कर देगा. जो भी हो, यह तय है कि आने वाले महीने भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे रोमांचक अध्यायों में से एक लिखेंगे. उसका केंद्र-बिंदु एक बार फिर लखनऊ ही होगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)