उत्तर प्रदेश की छवि आठ-नौ साल पहले तक गिनती के एक्सप्रेसवे, नाम मात्र के चलते हवाई अड्डों और बिजली-पानी की बदहाली वाले एक ऐसे प्रदेश की थी, जहां निवेशक पैसा लगाने से डरते थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद विधानसभा के बजट सत्र में बताया कि उस दौर में उत्तर प्रदेश आर्थिक रैंकिंग में नीचे से तीसरे स्थान पर पहुंच गया था. जैसे-जैसे राज्य 2027 के अपने विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ता है, इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल केवल सड़कों-पुलों की कहानी नहीं रह गया, बल्कि यह उस आर्थिक बदलाव की नींव बन चुका है, जिसे सरकार खुद 'बीमारू से ग्रोथ इंजन' की यात्रा कहकर बुलाती है.
उत्तर प्रदेश का आर्थिक अनुशासन
इसी उपेक्षा और ठहराव को पीछे छोड़ते हुए योगी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर को अपने पूरे शासन-मॉडल का केंद्र बना दिया. राज्य का पूंजीगत व्यय 2016-17 के 71 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर अब एक लाख 77 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है, जबकि राजकोषीय घाटा 4.5 फीसद से घटकर 3 फीसद के करीब आ गया है, यानी खर्च ज़्यादा हुआ, लेकिन अनुशासन के साथ. आज राज्य के पास देश के सबसे बड़े एक्सप्रेसवे नेटवर्क का दावा है, दर्जनों हवाई अड्डे परिचालन में हैं या तैयार हो रहे हैं, मेट्रो कई शहरों में दौड़ रही है और हर ज़िला मुख्यालय को फोरलेन सड़क से जोड़ने का काम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. सरकार के अनुसार देश के कुल एक्सप्रेसवे नेटवर्क में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी साठ फीसद के आसपास पहुंच चुकी है.
राज्य सरकार के पहले औपचारिक आर्थिक सर्वेक्षण, जो फरवरी 2026 में विधानमंडल में पेश हुआ, ने इस पूरी कहानी को ठोस आंकड़ों में उतार दिया है. उत्तर प्रदेश की जीएसडीपी 2016-17 के 13 लाख 30 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 30 लाख 25 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है यानी 10.5 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से यह अर्थव्यवस्था दोगुनी से भी अधिक हो गई है. राज्य का अपना कर राजस्व 86 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर 2 लाख 9 हज़ार करोड़ रुपये को पार कर चुका है.
आम आदमी के जीवन पर इसका सबसे सीधा असर प्रति व्यक्ति आय में दिखता है, जो 2024-25 में 1 लाख हज़ार रुपये के करीब पहुंच चुकी है और आठ सालों में लगभग दोगुनी हो चुकी है. ऋण-जीएसडीपी अनुपात 28 फीसद पर स्थिर बना हुआ है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है- यानी राज्य भारी उधार लेकर नहीं, बल्कि बढ़ते हुए अपने राजस्व और अनुशासित खर्च के सहारे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहा है.

रोजगार और आर्थिक विकास के अवसर पैदा करती इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कम चर्चित पहलू यह है कि इस इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति ने सीधे रोज़गार और आर्थिक अवसर की एक नई ज़मीन तैयार की है. जब एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारे और एयरपोर्ट बनते हैं, तो सबसे पहला असर निर्माण क्षेत्र में मज़दूरों, इंजीनियरों, ठेकेदारों और छोटे व्यापारियों के लिए रोज़गार के रूप में दिखता है. लेकिन असली कमाल इसके बाद शुरू होता है, जब यही इंफ्रास्ट्रक्चर उद्योगों को आकर्षित करता है. बुंदेलखंड जैसे इलाके, जो कभी सूखे और पलायन का पर्याय थे, आज एक्सप्रेसवे के सहारे रक्षा औद्योगिक गलियारे जैसी बड़ी परियोजनाओं का हिस्सा बन चुके हैं. पूर्वांचल के ज़िले, जो पहले निवेश के नक्शे पर कहीं नहीं थे, अब लॉजिस्टिक और मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभर रहे हैं. जेवर का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है-एयरोसिटी, लॉजिस्टिक पार्क, वेयरहाउसिंग और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की एक पूरी शृंखला, जो लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार पैदा करने की क्षमता रखती है. यही वजह है कि राज्य में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की संख्या नब्बे लाख के पार पहुंच चुकी है और उद्योग क्षेत्र का सकल मूल्यवर्धन 27 फीसद के आसपास पहुंच गया है.
जब कोई युवा अपने ही ज़िले में रोज़गार पाता है, तो उसकी कमाई भी वहीं खर्च होती है, स्थानीय बाज़ार बढ़ता है और एक पूरा आर्थिक चक्र गांव-कस्बों तक पहुंच जाता है. यह सोच उस पुराने मॉडल से बिल्कुल अलग है, जहां उत्तर प्रदेश का युवा रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर था. आज हालात इतने बदल चुके हैं कि राज्य दूसरे राज्यों और यहां तक कि विदेशी निवेशकों को भी अपनी ओर खींच रहा है और सिंगापुर जैसे वैश्विक मंचों पर लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव इसका प्रमाण हैं.
कृषि के क्षेत्र में क्या बदलाव आया है
शायद इस आर्थिक कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू कृषि क्षेत्र में आया बदलाव है. राज्य सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि विकास दर 2016-17 के 8.8 फीसद से बढ़कर 2024-25 में 15.7 फीसद के पार पहुंच गई है, राष्ट्रीय औसत से कई गुना तेज़. यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि बेहतर सड़कों, सिंचाई परियोजनाओं और भंडारण सुविधाओं ने किसानों को मंडी तक पहुंचना आसान बना दिया. नतीजा यह है कि उत्तर प्रदेश आज 737 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद्यान्न उत्पादन के साथ देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक राज्य बन चुका है और राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 20 फीसद के पार जा चुकी है. प्रति हेक्टेयर फसलों का सकल मूल्यवर्धन 98 हज़ार रुपये से बढ़कर 1 लाख 73 हज़ार रुपये हो चुका है और दूध उत्पादन में राष्ट्रीय हिस्सेदारी के साथ राज्य देश में अव्वल है. यह आंकड़े दिखाते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ केवल शहरी-औद्योगिक तबके तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे गांव और खेत तक पहुंचा है.
यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की यह कहानी अब राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि पूरे देश के लिए एक व्यावहारिक सीख बन चुकी है. जो राज्य कभी बीमारू राज्यों की सूची में सबसे ऊपर गिना जाता था, अगर वही राज्य आज देश की अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है, खाद्यान्न उत्पादन में नंबर एक बन सकता है और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए भारी पूंजीगत निवेश कर सकता है तो यह बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों के लिए एक स्पष्ट संदेश है. यह पूरी यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विकसित भारत 2047' के सपने से सीधे जुड़ती है. देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में जब जीएसडीपी 10.5 फीसद की दर से बढ़ रही हो और कृषि विकास दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक हो, तो यह अकेले उत्तर प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे भारत की पांच ट्रिलियन डॉलर और उसके आगे की अर्थव्यवस्था की मज़बूत नींव बनता है.
योगी सरकार की चुनौतियां क्या हैं
लेकिन इस उपलब्धि को ईमानदारी से देखने के लिए यह मानना ज़रूरी है कि आने वाले महीनों और सालों में योगी सरकार के सामने इंफ्रास्ट्रक्चर के इस विशाल विस्तार को टिकाऊ बनाए रखने की चुनौतियां कम नहीं हैं. सबसे पहली चुनौती गुणवत्ता नियंत्रण की है. बीते कुछ हफ्तों में ही उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद कुछ नई सड़कों और एक्सप्रेसवे में स्लिपेज, दरारें और गड्ढों की शिकायतें सामने आई हैं. इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को टोल वसूली रोकनी पड़ी और निर्माण एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. जब राज्य हर महीने हज़ारों करोड़ रुपये की नई परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहा हो और चुनावी वर्ष नज़दीक हो, ऐसे में निर्माण की रफ़्तार और गुणवत्ता की निगरानी के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही ज़रूरी हो जाता है जितना नई घोषणाएं करना.

दूसरी बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण और मुआवज़े की है, जो हर बड़ी परियोजना के साथ किसानों और स्थानीय समुदायों के विरोध का कारण बनती रही है, चाहे वो एक्सप्रेसवे हों या नए औद्योगिक गलियारे. तीसरी चुनौती है क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की. पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बड़े शहरों में जितनी तेज़ी से निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर पहुंच रहा है, पूर्वांचल और बुंदेलखंड के दूरदराज़ इलाकों तक उसी रफ़्तार से लाभ पहुंचाना एक सतत चुनौती बनी रहेगी, ताकि विकास कुछ ज़िलों तक सिमटा न रह जाए. चौथी चुनौती वित्तीय है- जैसे-जैसे परियोजनाओं का आकार बढ़ता जाएगा, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए पूंजीगत व्यय को लगातार ऊंचा रखना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब चुनावी वर्ष में कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च का दबाव भी बढ़ता है.
पांचवीं और शायद सबसे दीर्घकालिक चुनौती है निर्माण के बाद रखरखाव और जवाबदेही की संस्कृति विकसित करना. सड़क, पुल और एक्सप्रेसवे तभी असली समृद्धि का रास्ता बनते हैं जब वे सिर्फ उद्घाटन के दिन नहीं, बल्कि बरसों बाद भी उतने ही मज़बूत और भरोसेमंद बने रहें. इसके लिए ठेकेदार कंपनियों पर सतत निगरानी, स्वतंत्र गुणवत्ता ऑडिट, पारदर्शी शिकायत-निवारण तंत्र और परियोजना पूरी होने के बाद नियमित रखरखाव की स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी, ताकि तेज़ी से बनाई गई हर परियोजना उतनी ही मज़बूती से टिक भी सके.
अगर यह संतुलन साध लिया गया, तो उत्तर प्रदेश की यह इंफ्रास्ट्रक्चर यात्रा न केवल राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के करीब ले जाएगी, बल्कि यह देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक स्थायी और अनुकरणीय मॉडल के रूप में स्थापित होगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)