विज्ञापन

अमेरिका इराक से तो चला गया, क्या फिर लौट आएगा ISIS

डॉ. अमर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 02, 2026 17:21 pm IST
    • Published On अक्टूबर 02, 2026 17:21 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 02, 2026 17:21 pm IST
अमेरिका इराक से तो चला गया, क्या फिर लौट आएगा ISIS

इराक में बचे हुए अमेरिकी सैनिक भी 30 सितंबर 2026 को वहां से निकल गए. यह केवल एक सैन्य तैनाती के अंत की घटना नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया में अमेरिकी स्त्रातजी के एक लंबे अध्याय के समापन का भी संकेत  है. साल 2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सत्ता को हटाने के लिए इराक पर आक्रमण किया था. उसने 2011 में अपने सैनिक वापस बुला लिए थे. लेकिन यह वापसी स्थायी नहीं रही. साल 2014 में इस्लामिक स्टेट ने मोसुल पर कब्जा कर लिया. उसने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर अपनी खिलाफत स्थापित कर दी.यह देखकर अमेरिका को दोबारा लौटना पड़ा. इस बार उसका उद्देश्य शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि ISIS को कमजोर करना, इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित करना और आतंकवादी संगठनों की क्षेत्रीय पकड़ को खत्म करना था. 12 साल बाद अमेरिका का मानना है कि इराक अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद संभाल सकता है. लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है, क्या अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रहा या उसके जाने के बाद एक ऐसा शक्ति-शून्य पैदा होगा जिसका लाभ ISIS, ईरान समर्थित मिलिशिया और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां उठा सकती हैं? क्या इराक इस संक्रमण को संभाल पाएगा या फिर अफगानिस्तान जैसी अस्थिरता का खतरा दोबारा उभर सकता है?

क्या इराक में फिर खड़ा होगा आईएसआईएस

अमेरिका की मौजूदा वापसी को 2003 के इराक आक्रमण से अलग संदर्भ में समझना जरूरी है. उस समय अमेरिकी लक्ष्य केवल आतंकवाद से लड़ना नहीं था, बल्कि सद्दाम हुसैन की सत्ता को हटाना, कथित सामूहिक विनाश के हथियारों को समाप्त करना और इराक में एक स्थिर, लोकतांत्रिक और पश्चिम समर्थक सरकार स्थापित करना भी था. सद्दाम शासन शीघ्र गिर गया, लेकिन युद्ध से पहले जिन व्यापक विनाश के हथियारों के भंडारों का दावा किया गया था, वे नहीं मिले. इसके बाद असली चुनौती शुरू हुई. सरकार की पुरानी संस्थाओं को कमजोर करने, सेना को भंग करने, सुन्नी समुदाय में बढ़ते असंतोष, सांप्रदायिक हिंसा और अल-कायदा के उदय ने इराक को लंबे समय तक अस्थिर रखा. यही अस्थिरता आगे चलकर ISIS के उभार का कारण बनी. 

इसके विपरीत 2014 का अमेरिकी मिशन कहीं अधिक सीमित और स्पष्ट था. अब लक्ष्य शासन परिवर्तन नहीं बल्कि ISIS को समाप्त करना था. इस कसौटी पर अमेरिका काफी हद तक सफल रहा. मोसुल फिर से इराक के नियंत्रण में है, ISIS की खिलाफत खत्म हो चुकी है और इराकी सेना, काउंटर टेररिज्म सर्विस और कुर्द पेशमर्गा (कुर्दिस्तान क्षेत्र के आधिकारिक सशस्त्र बल) पिछले एक दशक में और सक्षम हुए हैं. इसलिए वाशिंगटन का तर्क है कि अब स्थायी अमेरिकी युद्धक उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है. लेकिन ISIS का क्षेत्रीय पतन उसके पूर्ण अंत का पर्याय नहीं है. संगठन के स्लीपर सेल अब भी इराक और सीरिया के कई इलाकों में मौजूद हैं, विशेषकर उन ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में जहां राज्य की उपस्थिति कमजोर है. अमेरिकी खुफिया सहायता, ड्रोन निगरानी, सैटेलाइट इंटेलिजेंस और लॉजिस्टिक क्षमता की कमी ऐसे क्षेत्रों में नए सुरक्षा अंतराल (सिक्योरिटी गैप) पैदा कर सकती है. यह वही तत्व है जो इराक के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा संदेह उत्पन्न करता है.

मार्च  2003 में इराक पर अमेरिका के हमले के बाद वहां लगी सद्दाम हुसैन की मूर्तियां गिरा दी गई थीं.

मार्च 2003 में इराक पर अमेरिका के हमले के बाद वहां लगी सद्दाम हुसैन की मूर्तियां गिरा दी गई थीं.
Photo Credit: AFP

यदि 2003 और 2026 के इराक की तुलना की जाए तो परिवर्तन बहुत व्यापक है.सद्दाम हुसैन के समय इराक एक अत्यधिक केंद्रीकृत, अधिनायकवादी राज्य था, जबकि इराक में आज एक संघीय संसदीय व्यवस्था है. इसमें शिया, सुन्नी और कुर्दों  की साझेदारी है. संसद के चुनाव नियमित हो रहे हैं. सत्ता परिवर्तन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हो रहा है. लेकिन मात्र लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस्तित्व अपने-आप में एक मजबूत लोकतांत्रिक राज्य की गारंटी नहीं बन सकता. इराक की राजनीतिक व्यवस्था लंबे समय से जातीय-सांप्रदायिक शक्ति-साझेदारी, संरक्षणवाद और गुटीय हितों से प्रभावित रही है. इससे राज्य की संस्थागत क्षमता कमजोर होती है. सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या इराक सशस्त्र गुटों पर नियंत्रण हासिल कर पाएगा.

इराक में ईरान का कितना हित है 

यहां ईरान का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है. अमेरिकी हस्तक्षेप की सबसे बड़ी स्त्रातजिक विडंबनाओं में से एक यह है कि सद्दाम हुसैन की सत्ता का पतन अंततः ईरान के लिए अनेक अवसर लेकर आया. सद्दाम का सुन्नी-प्रभुत्व वाला बाथवादी शासन दशकों तक शिया ईरान का प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी था. उसके पतन के बाद शिया राजनीतिक दलों और समूहों का प्रभाव इराक में बढ़ा. इनमें से कई के ऐतिहासिक संबंध ईरान से थे. ईरान ने धीरे-धीरे इराक में राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सैन्य नेटवर्क विकसित किए. पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज की अनेक इकाइयां औपचारिक रूप से इराकी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा हैं.इनमें से कुछ शक्तिशाली गुट अभी भी ईरान के साथ निकट संबंध बनाए हुए हैं. विडंबना यह है कि अमेरिका ने पहले ईरान के सबसे बड़े अरब प्रतिद्वंद्वियों में से एक को हटाया और फिर अगले दो दशकों का बड़ा हिस्सा उसी इराक में बढ़ते ईरानी प्रभाव को सीमित करने में लगा दिया.

Latest and Breaking News on NDTV

हालांकि यह मान लेना भी अतिसरलीकरण होगा कि अमेरिकी सैनिकों के जाते ही इराक पूरी तरह ईरानी प्रभाव में चला जाएगा. पिछले कुछ सालों में ईरान की व्यापक क्षेत्रीय स्त्रातजी को भी गंभीर झटके लगे हैं. इसमें सीरिया में बशर अल-असद शासन का पतन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. सीरिया केवल ईरान का सहयोगी राज्य नहीं था, बल्कि वह ईरान को इराक से सीरिया होते हुए लेबनान और हिजबुल्लाह तक जोड़ने वाले स्त्रातजिक भू-मार्ग का केंद्रीय हिस्सा था. असद के जाने के बाद इसे झटका लगा है. हिजबुल्लाह भी पहले की तुलना में कमजोर हुआ है. ऐसे में इराक ईरान के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि वहां ईरान के पास राजनीतिक दलों, आर्थिक नेटवर्क और सशस्त्र समूहों के साथ दशकों से विकसित संबंध मौजूद हैं. इसलिए अमेरिकी वापसी के बाद इराक, ईरानी स्त्रातजी में एक परिधीय क्षेत्र नहीं बल्कि और भी अधिक केंद्रीय स्थान ग्रहण कर सकता है.

इराक के लिए चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी स्त्रातजिक ऑटोनॉमी को सुरक्षित रखे. पिछले सालों में बगदाद की सबसे उल्लेखनीय कूटनीतिक उपलब्धियों में से एक यही रही है कि उसने अमेरिका र ईरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखे. लेकिन यही संतुलन कई बार इराक को दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष का मैदान भी बना देता है. अमेरिकी ठिकानों पर ईरान समर्थित समूहों के हमले, उसके जवाब में अमेरिकी कार्रवाई और क्षेत्रीय तनाव ने बार-बार दिखाया कि इराक न चाहते हुए भी दो देशों की प्रतिस्पर्धा का मंच बन सकता है. अमेरिकी सैनिकों का जाना इस तरह के टकराव की एक वजह को कम कर सकता है, लेकिन अमेरिका-ईरान प्रतिद्वंद्विता समाप्त नहीं होगी. वह अब सैन्य ठिकानों की बजाय राजनीति, अर्थव्यवस्था, खुफिया नेटवर्क और गैर-राज्य समूहों के माध्यम से अभिव्यक्त हो सकती है.

क्या कुर्द हैं इराक की चुनौती

कुर्दों का सवाल भी अमेरिकी वापसी से सीधे प्रभावित होगा. इराक के कुर्द, अमेरिका के सबसे पुराने और भरोसेमंद क्षेत्रीय साझेदार रहे हैं. साल 2003 के बाद और विशेषकर ISIS के विरुद्ध संघर्ष में पेशमर्गा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. एरबिल एयर बेस (कुर्दिस्तान स्वायत्त क्षेत्र की राजधानी) में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति केवल आतंकवाद विरोधी अभियान का हिस्सा नहीं थी, बल्कि कुर्द क्षेत्र के लिए एक अप्रत्यक्ष सुरक्षा आश्वासन भी थी. लेकिन अमेरिका के जाने के बाद अब कुर्द नेतृत्व को चिंता है कि उसे ईरानी दबाव, ईरान समर्थित गुटों और ISIS गतिविधियों का और अधिक सामना करना पड़ सकता है. वहीं इराक की केंद्रीय सरकार और स्वायत्त 'कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार' के बीच बजट, तेल से होने वाली आय, क्षेत्रीय अधिकार और सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर पुराने विवाद आज भी बने हुए हैं. अमेरिका के जाने के बाद इसमें और कठिनाई आ सकती है.

सद्दाम हुसैन को 30 दिसंबर 2006 को फांसी दे दी गई थी. इसके अगले दिन अखबार पढ़ती एक इराकी महिला.

सद्दाम हुसैन को 30 दिसंबर 2006 को फांसी दे दी गई थी. इसके अगले दिन अखबार पढ़ती एक इराकी महिला.
Photo Credit: AFP

सीरिया की बदलती परिस्थितियां भी इराकी सुरक्षा समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ISIS का उदय ही इराक और सीरिया की कमजोर होती सीमाओं और राज्य नियंत्रण से संभव हुआ था. बशर अल-असद के पतन के बाद सीरिया फिर संक्रमण के दौर में है. नई राजनीतिक व्यवस्था, कुर्द नेतृत्व वाली शक्तियों का भविष्य, तुर्की की बढ़ती भूमिका और ईरान के कम होते प्रभाव ने उत्तरी मध्य-पूर्व का पूरा स्त्रातजिक मानचित्र बदल दिया है. यदि सीरिया स्थिर होता है तो यह इराक के लिए राहत होगी, क्योंकि उसकी पश्चिमी सीमा पर दबाव कम होगा. लेकिन यदि सीरिया फिर से राजनीतिक विखंडन,स्थानीय संघर्ष और सत्ता की प्रतिस्पर्धा में फंसता है तो ISIS जैसे संगठन सीमावर्ती क्षेत्रों में फिर से जगह बनाने का प्रयास कर सकते हैं. इसलिए इराक में अमेरिकी वापसी की सफलता का आकलन केवल बगदाद की परिस्थितियों से नहीं बल्कि सीरिया के भविष्य से भी जुड़ा रहेगा.

इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी पश्चिम एशिया से स्त्रातजिक रूप से पीछे हटना नहीं, बल्कि अमेरिकी सैन्य स्त्रातजी के पुनर्संयोजन का संकेत है. 2003 में अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य कब्जे और राज्य-निर्माण के जरिए क्षेत्रीय व्यवस्था को प्रभावित करना चाहता था; आज वह स्थानीय साझेदारों, दूरस्थ सैन्य क्षमता, तकनीकी श्रेष्ठता, खुफिया नेटवर्क और आर्थिक प्रभाव पर अधिक निर्भर है. इसके साथ पश्चिम एशिया के तेल और ऊर्जा संसाधन अभी भी अमेरिकी हितों के केंद्र में हैं. जब तक यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों का प्रमुख केंद्र बना रहेगा, अमेरिका इससे अलग नहीं हो सकता. इसलिए उसका लक्ष्य अब प्रत्यक्ष नियंत्रण के बजाय शक्ति-संतुलन बनाए रखना, आतंकवादी नेटवर्कों को सीमित करना, ईरानी प्रभाव पर नजर रखना और ऊर्जा और समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अधिक प्रतीत होता है.

इराक के सामने चुनौतियां कितनी हैं

हालांकि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी पावर वैक्यूम का है, लेकिन 2011 और 2026 की परिस्थितियों में स्पष्ट अंतर है. 2011 में अमेरिकी वापसी के बाद इराकी राजनीति तेजी से ध्रुवीकृत हुई, सीरिया गृहयुद्ध में डूब गया और ISIS ने दोनों देशों की अस्थिरता का लाभ उठाकर बड़ी क्षेत्रीय शक्ति खड़ी कर ली. आज इराकी सेना अधिक सक्षम है, सुरक्षा संस्थाओं को लंबा अनुभव है और ISIS पहले की तुलना में काफी कमजोर है. इसके बावजूद खतरे खत्म नहीं हुए हैं, बल्कि उनका स्वरूप बदल गया है. अब समानांतर मिलिशिया नेटवर्क, ड्रोन और मिसाइल क्षमताएं, ईरान-अमेरिका तनाव, कुर्द प्रश्न और सीरिया की अनिश्चितता अधिक इराक के लिए गंभीर चुनौतियां हैं.

इराक से अमेरिकी वापसी को केवल जीत या हार के रूप में नहीं समझा जा सकता. अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाया, लेकिन जिस व्यापक लोकतांत्रिक और स्थिर क्षेत्रीय व्यवस्था की कल्पना की गई थी, वह पूरी तरह नहीं बन सकी. उसने ISIS की खिलाफत खत्म की. लेकिन आतंकवाद का खतरा खत्म नहीं हुआ. उसने इराकी सुरक्षा बलों को मजबूत किया, लेकिन इराकी राज्य अभी भी सभी सशस्त्र शक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाया है. उसने इराक को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था दी, लेकिन साथ ही ऐसी परिस्थितियां भी बनीं जिनमें ईरान का प्रभाव असाधारण रूप से बढ़ा.

Latest and Breaking News on NDTV

इसलिए 30 सितंबर 2026 को अमेरिकी सैनिकों की विदाई का वास्तविक अर्थ आने वाले सालों में स्पष्ट होगा. यदि बगदाद ISIS को नियंत्रित रखता है, मिलिशिया को राज्य के अधीन करता है, कुर्दों के साथ स्थायी राजनीतिक समझ विकसित करता है, सीरिया से फैलने वाली अस्थिरता को रोकता है और अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है, तो यह वापसी इराक की वास्तविक स्त्रातजिक स्वायत्तता की शुरुआत साबित हो सकती है. लेकिन अगर सरकारी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, सशस्त्र गुट अधिक स्वतंत्र होते हैं और क्षेत्रीय शक्तियां इराकी राजनीति को अपने संघर्ष का माध्यम बनाती हैं तो अमेरिका ने जो जगह खाली की है, उसे बहुत जल्द कोई दूसरी शक्ति भर देगी. 

इराक में पिछले 23 साल की कहानी एक स्पष्ट स्त्रातजिक निष्कर्ष देती है, किसी शासन को सैन्य शक्ति से हटाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन उसके बाद एक स्थिर, सक्षम और संप्रभु राज्य का निर्माण कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है. यही वह सबक है जिसे अमेरिका इराक और अफगानिस्तान में भारी कीमत चुकाने के बाद भी पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सका है. अमेरिका का इराक युद्ध शायद समाप्त हो गया है, लेकिन इससे पैदा हुए क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अमेरिका के सामने नहीं, बल्कि इराक के सामने है- क्या वह स्वतंत्र रूप से अपनी सुरक्षा, राजनीति और विदेश नीति का भविष्य स्वयं तय कर पाएगा या वह एक बार फिर मध्य-पूर्व की बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान बन जाएगा?

(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Iraq Crisis, Us In Iraq, Us In Iraq Vs ISIS, ISIS
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com