जितिन प्रसाद के जरिये बीजेपी ने साधे एक तीर से कई निशाने 

BJP को अगर मिशन 2022 में कामयाब होना है तो वह ब्राह्मणों की उपेक्षा नहीं कर सकती. इस समुदाय का पिछले तीन चुनावों से पार्टी को जमकर समर्थन मिला है. राज्य में उनकी संख्या 10 प्रतिशत से भी अधिक है और चुनाव परिणाम तय करने में उनकी एक बड़ी भूमिका होती है.

जितिन प्रसाद के जरिये बीजेपी ने साधे एक तीर से कई निशाने 

Jitin Prasada को यूपी में कांग्रेस के बड़े नेताओं में से गिना जाता था

नई दिल्ली:

आखिरकार जितिन प्रसाद (Jitin Prasad) का कांग्रेस (Congress) और गांधी परिवार से रिश्ता टूट ही गया. यह तीन पीढ़ियों का रिश्ता था जो अब बस किसी तरह से निभाया जा रहा था. हालांकि वो 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले भी बीजेपी (BJP) नेताओं के संपर्क में थे, लेकिन तब बात नहीं बनी थी. वो चुनाव लड़े और फिर हार गए. उन्हें बाद में पार्टी आलाकमान ने पश्चिम बंगाल चुनावों में प्रभारी बनाया लेकिन वहां कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली. पिछले कुछ वर्षों से वो खुद को मध्य उत्तर प्रदेश का कद्दावर ब्राह्मण नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे.वो राज्य में ब्राह्मणों पर कथित ज्यादतियों का मुद्दा उठाते थे.

इस साल एक जून को उन्होंने विश्व ब्राह्मण दिवस पर लोगों को बधाई दी. पिछले साल परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश बहाल करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा, जिसे योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद खत्म कर दिया था. ब्राह्मणों में एकजुटता के लिए ब्रह्म चेतना परिषद नाम का एक गैर राजनीतिक मंच भी बनाया. उन्हें साथ लाकर बीजेपी ने राज्य के ताकतवर ब्राह्मण समुदाय को संदेश दिया है कि वह राज्य में योगी सरकार के शासन में अपनी उपेक्षा का आरोप लगा रहे इस समुदाय की चिंता का ध्यान रख रही है.

एक बड़ा तबका यह आरोप लगाता है कि योगी आदित्यनाथ ठाकुर कार्ड चलते हैं और ब्राह्मणों की उपेक्षा करते हैं. यह भी खबरें हैं कि बीजेपी कई ताकतवर ब्राह्मण नेताओं को किनारे कर दिया गया है, जिनमें वरिष्ठ मंत्री भी शामिल हैं. कलराज मिश्र को राज्यपाल बना कर राजनीति से हटाना और लक्ष्मीकांत वाजपेयी जैसे नेता को हाशिए पर डालना भी इसका एक कारण है. 

बीजेपी को अगर मिशन 2022 में कामयाब होना है तो वह ब्राह्मणों की उपेक्षा नहीं कर सकती. इस समुदाय का पिछले तीन चुनावों से पार्टी को जमकर समर्थन मिला है. राज्य में उनकी संख्या 10 प्रतिशत से भी अधिक है और चुनाव परिणाम तय करने में उनकी एक बड़ी भूमिका होती है. 1989 तक ये समुदाय कांग्रेस पार्टी को समर्थन देते आया और अनुसूचित जाति के साथ कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक माना गया. लेकिन राम मंदिर आंदोलन ने हिंदुत्व का उभार किया और ब्राह्मण बीजेपी के साथ जुड़ गए. इसी के चलते राज्य में बीजेपी सत्ता में आई. अटल बिहारी वाजपेयी जैसे ताकतवर ब्राह्मण नेता भी इसका एक बड़ा कारण रहे. लेकिन बाद में वाजपेयी और कल्याण सिंह की खटपट और उनकी बगावत ने बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया.

एक आश्चर्य करने वाले घटनाक्रम में ब्राह्मणों ने बहुजन समाज पार्टी की मायावती को भी साथ दिया जब उन्होंने खुल कर ब्राह्मणों को विधानसभा चुनाव में टिकट दिया. इसका बीएसपी को लाभ भी मिला और उसने बड़ी ताकत के साथ सत्ता में वापसी की. लेकिन 2013 में हिंदुत्व का एक बड़ा चेहरा नरेंद्र मोदी जब राष्ट्रीय क्षितिज पर छाया तो ब्राह्मण खुद को बीजेपी के साथ दोबारा आने से नहीं रोक सके. 2017 में बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया था और मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा था. लेकिन चुनाव के बाद योगी को कमान सौंपी गई.

पार्टी में कई नेताओं को लगता है कि उन्हें अभी चुनावों में खुद को साबित करना बाकी है, क्योंकि पार्टी गोरखपुर का लोकसभा उपचुनाव  हार गई थी और पंचायत चुनावों में दूसरे नंबर पर आई. लेकिन पिछले 24 घंटों में ऐसे दो घटनाक्रम हुए, जिनसे बीजेपी ने ब्राह्मणों को बड़ा संदेश दिया है. पहला वरिष्ठ सेवानिवृत्त नौकरशाह अनूप चंद्र पांडे को चुनाव आयुक्त बनाया और दूसरा जितिन प्रसाद को अपने साथ ले लिया. 

लेकिन जितिन प्रसाद ऐसा चेहरा नहीं है, जिसे पूरे राज्य के ब्राह्मणों का नेता माना जाए. वो 2014, 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव हार चुके हैं. हाल में पंचायत चुनाव में उनकी भाभी बीजेपी के उम्मीदवार के हाथों चुनाव हार गईं. उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया कि जितिन प्रसाद को बीजेपी में शामिल कराने के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह दिखाना है कि कांग्रेस जमीनी पकड़ खो रही है और वरिष्ठ नेताओं का गांधी परिवार के नेतृत्व पर भरोसा नहीं है. ऐसे चार नेता थे जो राहुल गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे- ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद और सचिन पायलट. इनमें से दो सिंधिया और प्रसाद अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.

सचिन पायलट ने पिछले साल बगावत कर राजस्थान में अशोक गहलोत का तख्ता पलटने की नाकाम कोशिश की थी. जबकि मिलिंद देवड़ा गाहे-बगाहे बीजेपी नेतृत्व का गुणगान करते रहे हैं. इन बीजेपी नेता के मुताबिक राहुल गांधी हर दिन ट्विटर पर पीएम मोदी पर कोविड प्रबंधन में नाकामी को लेकर हमला करते हैं, लेकिन उनकी अपनी पार्टी के नेता पीएम मोदी की तारीफ करते हुए बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. इसका मतलब साफ है कि राहुल गांधी दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने में नाकाम रहे हैं. वे और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश में पार्टी को दोबारा मजबूत करने की कोशिशों में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद खुल कर सामने आ रहे हैं. एक अन्य बीजेपी नेता ने कहा कि जितिन प्रसाद को इसलिए नहीं लाया गया क्योंकि वे खुद को एक बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में देखते हैं बल्कि यह कांग्रेस आलाकमान को भी एक संदेश है कि वे अपने घर को पहले ठीक करें. यह संयोग है कि जितिन प्रसाद उन 23 वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने कांग्रेस की कार्यपद्धति में बदलाव के लिए अंतरिम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा था और जिसे जी 23 कहा जाता है. यह इस बात का भी इशारा है कि कांग्रेस के भीतर संकट गहरा है और आने वाले दिनों में कुछ और भी नेता बगावत कर सकते हैं। 

यह कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के मिशन यूपी को भी झटका है. वहां वो लंबे समय से कांग्रेस संगठन की जड़ें मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं. वो कोविड महामारी में कुप्रबंधन को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमलावर हैं. पार्टी राज्य की कमान एक ब्राह्मण नेता को भी सौंपने पर विचार कर रही है. सॉफ्ट हिंदुत्व के कई कदमों से प्रियंका गांधी वाड्रा ब्राह्मण समुदाय पर डोरे डालना चाहती हैं ताकि वे अगर बीजेपी से नाराज होकर कोई दूसरा विकल्प तलाशना चाहें तो कांग्रेस के पास दोबारा वापस आएं. 2009 के लोकसभा चुनाव में ऐसा हुआ भी था. उधर, समाजवादी पार्टी भी बीएसपी के फार्मूले पर चल कर बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर विचार कर रही है. इसीलिए बीजेपी के लिए यह बहुत जरूरी हो गया था कि वह तुरंत इस बारे में निर्णायक कदम उठाए.

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता का कहना है कि जितिन प्रसाद को लाकर बीजेपी ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा का असली चेहरा सामने ला दिया है. शायद यह शेखी बघारने वाली बात हो, लेकिन यह तय है कि बीजेपी ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी सक्रियता का परिचय दे दिया है. पिछले 15 दिनों में पार्टी ने बड़े पैमाने पर फीडबैक लेने की कवायद की. सरकार और संगठन में कुछ बदलाव की बात कही.

पीएम मोदी के करीबी माने जाने वाले पूर्व नौकरशाह ए के शर्मा को सरकार में जिम्मेदारी देने की बात है, ताकि भूमिहार शर्मा को महत्व मिलने से अगड़ी जातियों को भी संदेश दिया जा सके. विपक्ष फिलहाल सुस्त और जमीन से नदारद है, लेकिन योगी आदित्यनाथ के लिए असली चुनौती बीजेपी के भीतर से ही है. बीजेपी जानती है कि अगले साल यूपी जीतना बहुत जरूरी है, ताकि 2024 का रास्ता साफ हो सके क्योंकि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है.


(अखिलेश शर्मा NDTV इंडिया के एक्जीक्युटिव एडिटर हैं)

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