विज्ञापन

सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महिलाओं के लिए क्या बदलेगा, गरिमा और बराबरी कैसे मिलेगी

Anusha Soni
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 27, 2026 21:32 pm IST
    • Published On अप्रैल 27, 2026 21:28 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 27, 2026 21:32 pm IST
सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महिलाओं के लिए क्या बदलेगा, गरिमा और बराबरी कैसे मिलेगी

सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही सिर्फ सबरीमाला मंदिर विवाद को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के संवैधानिक सफर का एक अहम मोड़ है. इस समय नौ जजों का पीठ संविधान की सीमाओं को गहराई से समझने और परखने का काम कर रहा है.अदालत यह तय करना चाहती है कि धार्मिक आज़ादी की सीमा क्या है? इसे बराबरी, गरिमा (सम्मान) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के साथ कैसे संतुलित किया जाए. इन सवालों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट केवल अपने पुराने फैसले को दोबारा नहीं देख रही, बल्कि उन पुराने विवादों को भी साफ करने की कोशिश कर रही है जो अब तक पूरी तरह हल नहीं हो पाए हैं.

सबरीमाला मामला क्या है

नौ जजों का यह पीठ, भले ही सबरीमाला मामले की समीक्षा के कारण बनी हो, लेकिन असल में यह धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संबंध को समझने की एक बड़ी संवैधानिक प्रक्रिया है. जब अदालत इन सात सवालों पर विचार कर रही है, तो वह सिर्फ मंदिर में प्रवेश के मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में अलग-अलग समुदायों में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए एक स्पष्ट दिशा तय कर रही है. इसमें दाऊदी बोहरा समुदाय की महिलाओं से जुड़ी प्रथाओं (जैसे धर्म से बहिष्कार और महिलाओं के खतना), पारसी समुदाय की उन महिलाओं के अधिकार, जो धर्म के बाहर शादी करती हैं और मुस्लिम पर्सनल लॉ में महिलाओं को प्रभावित करने वाले व्यापक समानता के सवाल भी शामिल हैं.

संवैधानिक ढांचा यह तय करेगा कि क्या धार्मिक समूहों की स्वायत्तता (अपने नियम खुद बनाने का अधिकार) के नाम पर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को जारी रखा जा सकता है या फिर संवैधानिक नैतिकता और समानता को प्राथमिकता मिलेगी. इस वजह से यह सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनों पर दूरगामी असर डालेगी.

Add image caption here

Add image caption here

सबरीमाला मामले पर विशेष लेख

यह लेख पांच भागों की एक विशेष श्रृंखला की शुरुआत है. इसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ में चल रही कार्यवाही के संवैधानिक महत्व को गहराई से समझना है. इस श्रृंखला में विस्तार से बताया जाएगा कि सात प्रमुख सवालों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कैसे धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को नए सिरे से तय कर सकता है.

श्रृंखला के हर अगले भाग में अलग-अलग मुद्दों का विश्लेषण किया जाएगा- जैसे धार्मिक समूहों की स्वायत्तता, पर्सनल लॉ पर न्यायिक समीक्षा की सीमा और इन सबका महिलाओं के अधिकार, समानता और सुधार पर क्या प्रभाव पड़ेगा. इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि यह सुनवाई सिर्फ एक मामले का फैसला नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में धर्म और अधिकारों के बीच संबंध को तय करने वाला एक बड़ा कानूनी ढांचा तैयार कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों का पीठ जिन सात अहम कानूनी सवालों पर अभी सुनवाई कर रही है, उनका मकसद भारत के संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की आज़ादी की सीमा को स्पष्ट करना, धार्मिक समूहों के अधिकार तय करना और यह समझना है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अन्य मौलिक अधिकारों (संविधान के भाग-3) के साथ कैसे तालमेल बैठता है. ये सवाल सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिकाओं से सामने आए हैं, जिनमें मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी.

ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि ये सवाल महिलाओं के अधिकारों से जुड़े नहीं हैं. सही बात यह है कि इन सवालों में कहीं भी सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों का ज़िक्र नहीं है. आखिरकार, महिलाओं को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार मिला हुआ है. इसलिए पहली नजर में लगता है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलना अब कोई विवाद का विषय नहीं है. लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो समझ में आता है कि यह बहस महिलाओं के लिए बहुत अहम है, क्योंकि यह तय करेगी कि वे समाज और धर्म के अंदर अपने अधिकारों को कैसे हासिल करेंगी.

संवैधानिक अधिकार और परंपराएं

संविधान यह जरूर कहता है कि महिलाओं को नागरिक और प्रशासनिक मामलों में बराबरी का अधिकार है. लेकिन भारत जैसे गहराई तक जमें धार्मिक समाज में अब भी कई परंपराएं और मान्यताएं मौजूद हैं, जो यह मानती हैं कि महिलाएं धार्मिक संस्थाओं में नेतृत्व की भूमिका नहीं निभा सकतीं. उदाहरण के तौर पर, कोई महिला शंकराचार्य नहीं बन सकती, न ही शाही इमाम या पोप बन सकती है. अलग-अलग रूप में दिखने के बावजूद, महिलाओं के साथ इस असमानता का एक कारण यह बताया जाता है कि वे मासिक धर्म (Menstruation) से गुजरती हैं. मासिक धर्म के अलावा भी, कुछ परंपरागत कानून- जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ या शरिया कानून भी महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं. अलग-अलग समुदाय और धर्म इन नियमों और परंपराओं को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 26 के तहत अपने धार्मिक मामलों को खुद संभालने के अधिकार के जरिए सुरक्षित रखते हैं.

आजादी के बाद, केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कानून बनाए, जिनका मकसद मंदिरों,मठों, दरगाहों जैसी धार्मिक संस्थाओं के कामकाज को नियंत्रित करना था.इन कानूनों को मंदिर प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. लेकिन ज्यादातर मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हस्तक्षेप को सही ठहराया और सुधारों को मंजूरी दी. कई बार ये सुधार काफी बड़े और व्यापक थे.देवारू के मशहूर मामले (श्री वेंकटराम देवारू बनाम मैसूर राज्य, 1958) को उदाहरण के तौर पर समझिए. इस मामले में एक कानून के जरिए सभी 'हिंदुओं' को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई, जबकि पहले यह अधिकार सीमित था.

अगर धार्मिक समूहों के अधिकार पूरी तरह से मान लिए जाते, तो संविधान का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता जिसमें सभी हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश देने की बात कही गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास टेंपल एंट्री ऑथराइजेशन एक्ट को सही ठहराया, जिसने सभी हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी. ऐसे करीब दर्जन भर मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के बनाए कानूनों को सही माना, ताकि सामाजिक सुधार हो सकें. आजादी के बाद टकराव यह था कि एक तरफ राज्य सुधार करना चाहता था और दूसरी तरफ धार्मिक संस्थाएं अपने मामलों को खुद चलाने का अधिकार मांग रही थीं. इस टकराव में ज्यादातर मामलों में सुधार की जीत हुई, जो संविधान की भावना के अनुरूप था.

Latest and Breaking News on NDTV

महिलाओं से जुड़े सवाल और उनके जवाब

शाह बानो केस (1985), शायरा बानो या ट्रिपल तलाक केस (2017) और सबरीमाला फैसला (2018) ऐसे कुछ गिने-चुने मामले हैं, जहां अदालतों के सामने सीधे 'महिला अधिकार' का सवाल आया.अब असली सवाल यह है कि क्या संविधान उन परंपराओं और प्रथाओं को बचाएगा जो महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती हैं? क्या धर्म और धार्मिक समूहों को महिलाओं के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव करने की अनुमति दी जा सकती है?
क्या परंपरागत (Customary) कानून, मौलिक अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं? क्या महिलाओं के मौलिक अधिकार सीमित हैं यानी क्या वे सिर्फ गैर-धार्मिक (Secular) मामलों में ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती हैं न कि धार्मिक या सामाजिक मामलों में? यही वे बड़े सवाल हैं, जिन पर आज की संवैधानिक बहस टिकी हुई है.

इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर फैसला करेगा, तो उसे यह याद रखना होगा कि वह महिलाओं से जुड़े सवालों पर भी फैसला कर रहा है. पिछले 50 सालों में महिलाओं के सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास ने उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में ज्यादा भागीदारी दी है. लेकिन इसके बावजूद, धार्मिक संस्थाएं और परंपराएं आज भी कई बार समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं और सुधार की कोशिशें समाज के इस हिस्से तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं.

इसी वजह से,शरिया कानून के तहत बहुविवाह (Polygamy) की अनुमति है. उसे कानूनी संरक्षण भी मिला हुआ है. कुछ समुदायों में आज भी महिलाओं का खतना जैसी प्रथाएं जारी हैं. अगर कोई महिला अपने समुदाय के बाहर शादी करती है, तो उसे बहिष्कृत किया जा सकता है, जबकि पुरुषों पर अक्सर यही नियम लागू नहीं होते हैं यानि धर्म और समाज का यह क्षेत्र अभी भी समानता से काफी दूर है.

इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक समूहों को अपने मामलों को खुद संभालने के अधिकार की सीमा तय करेगा तो वह भविष्य के कानूनी संघर्षों की नींव भी रखेगा. इस समय सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें महिलाओं ने भेदभावपूर्ण प्रथाओं को चुनौती दी है. अब यह नौ जजों पर निर्भर है कि वे तय करें कि क्या इन प्रथाओं को संविधान का संरक्षण मिलेगा या कानून सुधार का रास्ता खुलेगा.सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की यह सुनवाई सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उससे कहीं आगे जाकर बड़े संवैधानिक और सामाजिक मुद्दों को प्रभावित करेगी.

(डिस्क्लेमर: लेखक NDTV की कंसल्टिंग एडिटर हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से कानून की पढ़ाई की है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

पाठकों से अपील:  अगर आप भी किसी विषय पर लेख लिखना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप अपने पसंद के विषय पर लेख लिखकर हमें भेजें. लेख की शब्द सीमा 1500 शब्द है. लेख मंगल फॉन्ट में टाइप होना चाहिए. एक जरूरी बात, लेख मौलिक होना चाहिए, वह कहीं और प्रकाशित नहीं होना चाहिए, वह पूरा या आंशिक तौर पर भी कहीं से कॉपी किया हुआ या AI की मदद से तैयार किया हुआ नहीं होना चाहिए. लेख पसंद आने पर उसे हम अपने ब्लॉग सेक्शन में जगह देंगे. लेख को आप हमारी ईमेल आईडी पर Edit.Blogs@ndtv.com पर भेज सकते हैं.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com