Lahda Aam Story: गर्मी आते ही भारत में जिस फल की सबसे ज़्यादा चर्चा होती है, वह है आम. बाजार में आम की दर्जनों किस्में मिलती हैं, लेकिन कुछ आम ऐसे होते हैं जिनका स्वाद ही नहीं, उनकी कहानी भी लोगों को हैरान कर देती है. ऐसा ही एक आम है बनारस का मशहूर ‘लंगड़ा आम'. आम के तो पैर होते नहीं, फिर इसका नाम लंगड़ा कैसे पड़ा? इसके पीछे छुपी कहानी सैकड़ों साल पुरानी है—और आज भी उतनी ही ज़िंदा.
आम की इन किस्मों के स्वाद के साथ उसकी कहानी और ऑरिजिन जानना भी काफी दिलचस्प होता है. इसी कड़ी में हम बात कर रहे हैं बनारस के लंगड़ा आम की. कभी सोचा है कि आम के पैर तो होते नहीं, फिर इस आम का नाम लंगड़ा कैसे पड़ा होगा..? यह एक ऐसी कहानी है जो सैकड़ों साल पुरानी है और आज भी लोगों की जुबान पर जिंदा है. इसके नाम से लेकर स्वाद तक, हर चीज इसे बाकी आमों से अलग बनाती है.
नाम के पीछे छुपी अनोखी कहानी (The Story Behind the Name)
‘लंगड़ा' नाम सुनते ही पहली बार में अजीब जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे की कहानी काफी दिलचस्प मानी जाती है. कहा जाता है कि बनारस के एक मंदिर में रहने वाले एक साधु, जो पैरों से दिव्यांग थे, उन्होंने आम के पौधे लगाए थे. जब इन पेड़ों पर फल आए, तो उनका स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि यह पूरे इलाके में मशहूर हो गया. लोग पहचान के लिए इसे “लंगड़े साधु वाला आम” कहने लगे. साधु महाराज तो एक दिन स्वर्ग सिधार गए, लेकिन आम की पहचान उन्हीं से बनी रही. धीरे-धीरे यही नाम छोटा होकर ‘लंगड़ा' बन गया. आज लंगड़ा आम बनारस ही नहीं पूरी दुनिया में मशहूर है.
क्यों पकने के बाद भी हरा रहता है लंगड़ा आम
लंगड़ा आम की सबसे अलग पहचान इसका रंग है. जहां ज़्यादातर आम पकने के बाद पीले या लाल हो जाते हैं, वहीं लंगड़ा आम पूरी तरह पकने के बाद भी हरा ही दिखाई देता है. यही वजह है कि कई लोग पहली नज़र में इसे कच्चा समझ बैठते हैं.
लेकिन इसका असली जादू इसके अंदर छुपा होता है—केसरिया रंग का मुलायम, लगभग बिना रेशे वाला गूदा और संतुलित मिठास, जो इसे हर उम्र के लोगों का पसंदीदा बनाता है.
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स्वाद और बनावट में बाकी आमों से कैसे अलग है
इस आम का गूदा बेहद मुलायम और लगभग बिना रेशे वाला होता है, जिससे इसे खाना आसान और मजेदार बन जाता है. इसकी मिठास संतुलित होती है, न ज्यादा तेज और न फीकी. यही वजह है कि इसे सीधे काटकर खाने के साथ-साथ शेक, डेजर्ट और चटनी में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है. Also Read: Viral Mango Peeling Hack: गिलास से ऐसे छीलें आम, न वेस्टेज होगी न मेहनत
बनारस की मिट्टी और GI टैग से जुड़ी पहचान
लंगड़ा आम का असली स्वाद बनारस की मिट्टी और वहां की जलवायु से जुड़ा माना जाता है. इसी खासियत की वजह से इसे जीआई टैग भी मिल चुका है, जो इसकी पहचान को आधिकारिक तौर पर मजबूत करता है.
यह सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि बनारस की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुका है. लंगड़ा आम आमतौर पर जून के मध्य से बाजार में आना शुरू होता है और जुलाई के आखिर तक मिलता है.
सिर्फ आम नहीं, बनारस की विरासत है लंगड़ा आम
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल में भी इसकी खेती बड़े स्तर पर होती है. पिछले कुछ सालों में इसकी डिमांड विदेशों में भी बढ़ी है, जिससे इसका एक्सपोर्ट लगातार बढ़ रहा है. बिहार के भागलपुर में मिलने वाला ‘दुधिया लंगड़ा' अपनी खास खुशबू के लिए जाना जाता है, जिसे लोग दूध जैसी महक बताते हैं.
लंगड़ा आम सिर्फ अपने स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपनी कहानी और पहचान के लिए भी खास है. एक साधु की लगाई छोटी सी पौध से शुरू हुआ यह सफर आज देश ही नहीं, दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुका है.
FAQs
लंगड़ा आम का नाम लंगड़ा क्यों पड़ा?
कहा जाता है कि बनारस के एक मंदिर में रहने वाले दिव्यांग साधु ने ये आम के पेड़ लगाए थे. पहचान के लिए इसे ‘लंगड़े साधु वाला आम' कहा जाने लगा, जो आगे चलकर लंगड़ा आम बन गया.
क्या लंगड़ा आम पकने के बाद भी कच्चा लगता है?
हां, लंगड़ा आम पकने के बाद भी हरा ही रहता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह पका, मीठा और खुशबूदार होता है.
लंगड़ा आम कहां का सबसे मशहूर है?
लंगड़ा आम बनारस की पहचान माना जाता है और उसे GI टैग भी मिला हुआ है.
लंगड़ा आम कब मिलता है?
यह आमतौर पर जून के मध्य से जुलाई के आखिर तक बाजार में उपलब्ध होता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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