आषाढ़ की एक भीगी हुई सुबह. बिहार के गया जिले के बढ़निया गांव में मौसम की मेहरबानी हुई है.रात भर बरसे बादलों के बाद धरती की देह से उठती सोंधी महक पूरे गांव में फैल गई है. दूर-दूर तक फैले खेतों में घुटनों तक पानी भरा है. इसमें उगते सूरज की लालिमा झिलमिला रही है. खेत की मेड़ों पर रंग-बिरंगी साड़ियों में सजी महिलाएं हंसती-बतियाती चली आ रही हैं. उनकी मुट्ठियों में धान के कोमल बिचड़ों की हरी-हरी गठरियां हैं. पुरुष कंधे पर हल, फावड़ा और गमछा डाले खेत का अंतिम कादो तैयार कर रहे हैं. बच्चे मेड़ पर खड़े कौतूहल से यह दृश्य देख रहे हैं. कुछ ही देर में कीचड़, गीत, श्रम और मुस्कान मिलकर ऐसा लोकचित्र रचते हैं, जिसे देखकर लगता है मानो धरती स्वयं हरियाली का उत्सव मना रही हो.
धान रोपनी केवल खेती का एक चरण नहीं है; यह मिट्टी, मानसून और मनुष्य के रिश्ते का वार्षिक उत्सव है. यह वह दिन है जब पूरा गांव खेत में उतरता है, जहां जाति, वर्ग और संपन्नता की दीवारें कुछ समय के लिए धुंधली पड़ जाती हैं. खेत केवल अन्न उपजाने की जगह नहीं रहते, वे सामूहिक श्रम, साझी संस्कृति और सामाजिक एकता के जीवंत मंच बन जाते हैं.
धान की रोपनी का समय क्या है
भारतीय कृषि में धान खरीफ मौसम की प्रमुख फसल है और इसकी रोपनी समय पर होना पूरे कृषि चक्र की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. यही वह दौर होता है जब किसान अच्छी वर्षा की कामना के साथ भविष्य की फसल की नींव रखते हैं. उधर बांका जिले के अमरपुर प्रखंड के भदरिया गांव में खुशहाली है, बावजूद इसके कि इस साल गंभीर सूखे की भविष्यवाणी हवाओं में तैर रही है.
सुधाकर रजक कहते हैं, ''अकेले बिहार के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग 45 प्रतिशत भाग धान की खेती के अधीन है और राज्य की लगभग 75 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आज भी कृषि पर निर्भर है.'' उनके गांव पीरपैंती में ठीक-ठाक बारिश हुई है. इसलिए आषाढ़ का महीना केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में नई आशाओं के आगमन का संकेत होता है. इस प्रकार राज्य के मैदानी इलाकों में यह परंपरा आज भी सबसे अधिक जीवंत दिखाई देती है. सोन नहर प्रणाली का जल, पुनपुन और फल्गु जैसी नदियों की तलहटी और काली-भूरी मटियारी मिट्टी इस क्षेत्र को धान उत्पादन के लिए विशेष रूप से अनुकूल बनाती है. इस बारे में तिलौथू (रोहतास) के पद्माकर सिंह बताते हैं कि मटियारी (क्ले-लोम) मिट्टी की जलधारण क्षमता अधिक होने के कारण धान के पौधों के लिए आवश्यक नमी लंबे समय तक बनी रहती है. समतल भू-भाग, नहर सिंचाई और पर्याप्त मानसूनी वर्षा का संयोजन इस क्षेत्र में खरीफ धान की स्थिर एवं बेहतर उत्पादकता का आधार माना जाता है.

धान की रोपनी शुरू होने से पहले किसान खेत में पूजा-पाठ भी करता है.
Photo Credit: Amarendra Kishore
कब शुरू होती है धान रोपनी की तैयारी
जहानाबाद जिले में मोदनगंज प्रखंड स्थित एक गांव लक्षणबीघा के बंसरोपन प्रसाद कहते हैं,''धान रोपनी की तैयारी लगभग एक महीने पहले ही शुरू हो जाती है. किसान ऊंची भूमि पर छोटे-से खेत में 'बिचड़ा' या 'मोरी' तैयार करता है. चुने हुए बीजों को सावधानी से बोया जाता है. रोज़ उनकी देखभाल की जाती है. करीब एक महीने में जब पौधे एक बित्ता लंबे हो जाते हैं, तब उन्हें मुख्य खेत में रोपने का समय आ जाता है.''
रोपनी से एक दिन पहले खेत का 'कादो' किया जाता है. बैलों की टापों या ट्रैक्टर के पहियों से मिट्टी और पानी इस तरह मिलाए जाते हैं कि पूरा खेत मुलायम गारे में बदल जाए. बुज़ुर्ग किसान मुस्कराते हुए कहते हैं,''कादो जितना चिकना, खलिहान उतना भरा.'' यह लोकज्ञान है जो कहावतों के जरिए याद रखा जाता है. यही वह क्षण है, जहां लोकज्ञान और विज्ञान एक-दूसरे का हाथ थामे दिखाई देते हैं.
औरंगाबाद जिले के नबीनगर प्रखंड के सिंदुरिया गांव में सांझ ढलते-ढलते पूरे गांव में खबर फैल जाती है, ''कल फलां किसान के खेत में रोक है.'' यह निमंत्रण नहीं, बल्कि सामुदायिक श्रम की घोषणा होती है. मध्य बिहार की यह परंपरा 'पलटा' या 'हुड़का' प्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है. आज पूरा गांव एक किसान के खेत में काम करेगा, कल वही किसान दूसरे के खेत में श्रम देगा. बिना किसी लिखित समझौते के पीढ़ियों से चलती आ रही यह व्यवस्था ग्रामीण समाज में विश्वास और सहयोग की सबसे बड़ी पूंजी है. इस परंपरा से छोटे और सीमांत किसानों को रोपनी जैसे श्रम-प्रधान कार्य समय पर पूरा करने में मदद मिलती है. इससे मजदूरी पर निर्भरता घटती है, कृषि लागत कम होती है और मानसून की सीमित अवधि का अधिकतम उपयोग संभव हो पाता है.
धान रोपनी के गीत
रोपनी वाले दिन सूरज निकलने से पहले ही खेत जीवंत हो उठता है. पुरुष बिचड़ों की गठरियां खेत के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाते हैं, जबकि महिलाएं पानी से भरे खेत में कतार बनाकर रोपाई शुरू करती हैं. सबसे अनुभवी महिला पहली सीध बांधती है. उसी के आधार पर पूरा खेत सीधी-सीधी हरी रेखाओं से भरने लगता है. ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है मानो किसी चित्रकार ने धरती के विशाल कैनवास पर हरियाली की महीन कूची चला दी हो.

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जैसे-जैसे हाथ चलते हैं, वैसे-वैसे गीतों की लय भी तेज होती जाती है. एक ओर से स्वर उठता है, दूसरी ओर से उसका उत्तर आता है. इन गीतों में प्रेम है, परिहास है, बारिश की कामना है, श्रम की थकान को हर लेने वाली मधुर लय है और अन्नपूर्णा से भरपूर फसल की प्रार्थना भी. कीचड़ में धंसे पैर, झुकते हुए शरीर और गूंजते लोकगीत मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं कि खेत किसी खुले रंगमंच में बदल जाता है. यहां हर स्त्री कलाकार है, हर किसान गायक है और हर पौधा भविष्य की समृद्धि का एक स्वर.
खेत में महिला-पुरुष की भूमिका क्या होती है
लोकजीवन के अध्येताओं का मानना है कि धान रोपनी केवल कृषि का श्रम नहीं, बल्कि सृष्टि के पुनर्सृजन का प्रतीक है. खेत में पुरुष भूमि को तैयार करता है, लेकिन उसमें जीवन का संचार स्त्री करती है. उसकी उंगलियां जब कोमल बिचड़ों को कीचड़ में रोपती हैं, तो वह केवल पौधा नहीं लगाती, बल्कि पूरे परिवार के आने वाले वर्ष की आशा, समृद्धि और अन्न का बीज धरती की गोद में सौंप देती है. शायद यही कारण है कि रोपनी के गीत इस परंपरा की आत्मा हैं. पीढ़ियों से बिना लिखे और बिना किसी संगीत विद्यालय के ये गीत मां से बेटी, दादी से पोती तक पहुंचते रहे हैं.
कवयित्री स्वर्णा झा कहती हैं,''इन गीतों में वर्षा का स्वागत है, नवविवाहिता का संकोच है, देवर-भाभी का हास-परिहास है, सास-बहू की नोकझोंक है और किसान के जीवन का संघर्ष भी. खेत में काम करती महिलाओं की एक टोली गीत उठाती है, दूसरी टोली उसका उत्तर देती है.'' उनके अनुसार, इस संवाद में कभी प्रेम झलकता है, कभी व्यंग्य, कभी हँसी और कभी जीवन-दर्शन. मिट्टी में सने हाथों के बीच गूंजते ये स्वर थकान को जैसे बहा ले जाते हैं. यही गीत खेत को श्रमस्थल से उत्सवस्थल बना देते हैं.
प्रो.(डॉ.) नीलम कुमारी मुजफ्फरपुर स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र की विभागाध्यक्ष हैं. वो बताती हैं, ''रोपनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां श्रम का सम्मान सबसे ऊपर होता है. खेत चाहे किसी संपन्न किसान का हो या छोटे कृषक का, रोपनी के समय सब एक ही पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं. काम पूरा होने के बाद जिस परंपरा की प्रतीक्षा सबसे अधिक रहती है, वह है 'साधु-भोज'. ग्रामीण समाज में इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि श्रम का सम्मान माना जाता है.''
खेत में मजदूरों का नाश्ता
जुलाई के मध्य में हम तीन लोग सुबह-सुबह गया जिले के बेलागंज प्रखंड के गांव सलेहपुर पहुंचते हैं. यहां सुबह के नाश्ते में चूड़ा, गुड़, सत्तू, प्याज़ और हरी मिर्च परोसी जाती है. खेती के तौर-तरीके देखने के मकसद से हम वहीं रुक जाते हैं. उस दिन पहरोपा था, एक ऐसी प्रथा जिसमें मजदूर कुटुंब सा हो जाता है. वह खेतों में काम करता है और दिन भर के मेहनत में उसे समूचे खेत में रोपनी पूरी करनी पड़ती है. बीच में भोजन का समय आता है. खेत की मेड़ पर केले के पत्तों या दोने-पत्तलों में भात, दाल, आलू-परवल की सब्ज़ी, बड़ियां, चोखा, पापड़, दही और अंत में गुड़ या खीर परोसी जाती है. सोन नदी के किनारे बसे अनेक गांवों में इस दिन मछली-भात बनाना शुभ माना जाता है, क्योंकि मछली जल, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है.

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सबसे मार्मिक दृश्य तब होता है, जब खेत का मालिक स्वयं पंक्ति में खड़े होकर सबको भोजन परोसता है. वह उस दिन मालिक नहीं, मेज़बान होता है. गांव के बुज़ुर्ग आज भी कहते हैं, ''जो धरती को अन्न देगा, पहले उसका पेट भरना चाहिए.'' इस एक वाक्य में भारतीय कृषि संस्कृति का पूरा दर्शन समाया हुआ है. यहां भोजन मजदूरी का हिस्सा नहीं, बल्कि श्रम के प्रति सम्मान का सार्वजनिक स्वीकार है. जब थाली में पहला कौर परोसा जाता है, तो उसमें केवल अन्न नहीं, आत्मीयता, कृतज्ञता और परस्पर विश्वास भी परोसा जाता है. खेत की मेड़ पर बैठा यह सामूहिक भोजन पीढ़ियों से मनुष्यता, बराबरी और साझे श्रम की उस परंपरा को जीवित रखे हुए है, जिसने गांवों को केवल बसाया ही नहीं, बल्कि उन्हें एक परिवार की तरह जोड़े रखा है.
लेकिन समय के साथ यह परंपरा बदल भी रही है. पंजाब, हरियाणा और महानगरों की ओर बढ़ते पलायन ने गांवों से श्रमिकों की संख्या कम कर दी है. रोपाई मशीनों ने कई क्षेत्रों में हाथों की जगह ले ली है. छोटे परिवारों, बदलती जीवनशैली और नकदी अर्थव्यवस्था ने 'पलटा' जैसी सामुदायिक श्रम-व्यवस्था को भी प्रभावित किया है. अब कई गांवों में रोपनी ठेके पर होती है और लोकगीतों की जगह मोबाइल फोन से बजते फिल्मी गीत सुनाई देते हैं.
किसान की उम्मीद क्या होती है
इसके बाद भी मध्य बिहार के कई गांवों में यह परंपरा आज भी सांस ले रही है. क्योंकि लोग जानते हैं कि धान केवल खेत में नहीं उगता, वह रिश्तों में भी उगता है. रोपनी का दिन गांव को फिर से एक परिवार बना देता है. वर्ष भर अलग-अलग दिशाओं में बिखरे लोग उसी कीचड़ में एक साथ खड़े होकर श्रम करते हैं, हंसते हैं, गाते हैं और साथ भोजन करते हैं. यह परंपरा टूटते सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ने का मौन माध्यम बन जाती है.
सांझ ढलने लगती है. दिन भर की मेहनत के बाद पूरा खेत हरे-भरे बिचड़ों की सीधी कतारों से भर चुका होता है. हल्की हवा चलती है और वे नन्हे पौधे एक साथ झूम उठते हैं. मेड़ पर खड़ा किसान देर तक उस दृश्य को निहारता रहता है. उसकी आंखों में केवल फसल नहीं, अपने बच्चों की मुस्कान, परिवार का भविष्य और पूरे वर्ष की आशा लहरा रही होती है. उसे विश्वास होता है कि यही कोमल पौधे कुछ महीनों बाद सुनहरी बालियों में बदलकर उसके आंगन को अन्न से भर देंगे. इसीलिए मध्य बिहार में एक पुरानी कहावत आज भी बड़े गर्व से दोहराई जाती है, 'धान की फसल महज खेतों में नहीं उपजाई जाती है, वह लोगों के मन, रिश्तों और उम्मीदों में भी उपजाई जाती है.'
शायद यही कारण है कि धान रोपनी केवल कृषि का काम नहीं, बल्कि मिट्टी, मनुष्य और प्रकृति के शाश्वत संबंध का सबसे सुंदर लोकपर्व है.
(डिस्क्लेमर: लेखक जनसरोकार से जुड़े वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और वृत्तचित्र फ़िल्मकार हैं. दिल्ली में रहते हुए उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक सामाजिक न्याय, आदिवासी जीवन, लैंगिक समानता, ग्रामीण भारत, पर्यावरण और गरीबी जैसे मुद्दों पर व्यापक मैदानी रिपोर्टिंग की है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )