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अमरेंद्र किशोर

अमरेंद्र किशोर

कॉलमिस्ट
अमरेंद्र किशोर जनसरोकार से जुड़े वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और वृत्तचित्र फ़िल्मकार हैं. दिल्ली में रहते हुए उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक सामाजिक न्याय, आदिवासी जीवन, लैंगिक समानता, ग्रामीण भारत, पर्यावरण और गरीबी जैसे मुद्दों पर व्यापक मैदानी रिपोर्टिंग की है. उनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा...
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    बिहार के गांवों में लोगों को एक कर देती है धान की रोपनी

    अषाढ के महीने में होने वाली धान रोपनी श्रम, लोकगीत, साझी संस्कृति, स्त्री-सृजन और सामुदायिक जीवन का ऐसा महापर्व है, जो भारतीय ग्रामीण सभ्यता की आत्मा को आज भी स्पंदित करता है. इसके बारे में विस्तार से बता रहे हैं पत्रकार अमरेंद्र किशोर.                                

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    बारिश और बाजार पर कितने निर्भर हैं डिंडोरी के सोयाबीन किसान

    कभी 'सोया स्टेट' कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में सोयाबीन की खेती और उसमें आने वाली मुश्किलों के बारे में बता रहे हैं अमरेंद्र किशोर.

अमरेंद्र किशोर

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अमरेंद्र किशोर जनसरोकार से जुड़े वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और वृत्तचित्र फ़िल्मकार हैं. दिल्ली में रहते हुए उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक सामाजिक न्याय, आदिवासी जीवन, लैंगिक समानता, ग्रामीण भारत, पर्यावरण और गरीबी जैसे मुद्दों पर व्यापक मैदानी रिपोर्टिंग की है. उनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा वे लोग रहे हैं, जिनकी आवाज़ मुख्यधारा में अक्सर अनसुनी रह जाती है. देश के सुदूर आदिवासी अंचलों में लंबे प्रवास के दौरान उन्होंने कुदरती संसाधनों और स्थानीय समुदायों के बदलते रिश्तों को गहराई से समझा और उनके संरक्षण की वकालत की. ओडिशा की अनब्याही माताओं, सुंदरबन की बाघ विधवाओं और कालाहाण्डी के श्रमिकों पर उनका लेखन विशेष रूप से चर्चित रहा है. उन्होंने 'मजदूरों की मंडी कालाहाण्डी' शीर्षक से एक किताब भी लिखी है.