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बद्री बाबा पर चढ़ते जिनके हाथ से बुने कंबल, वो हैं भारत के प्रथम गांव माणा की संबल

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 07, 2026 11:38 am IST
    • Published On जुलाई 07, 2026 11:38 am IST
    • Last Updated On जुलाई 07, 2026 11:38 am IST
बद्री बाबा पर चढ़ते जिनके हाथ से बुने कंबल, वो हैं भारत के प्रथम गांव माणा की संबल

उत्तराखंड के चमोली जिले के गांव माणा को भारत का प्रथम गांव माना जाता है. इस गांव की पहचान बद्रीनाथ धाम से जुड़ी आस्था से है. इससे इतर माणा की एक और पहचान है, भेड़ों के ऊन से कपड़े तैयार करने से लेकर उन्हें बाजार तक लाने के साथ-साथ खेती और पशुपालन करती गांव की महिलाएं माणा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.

बुग्याल से शुरू होती है आत्मनिर्भरता की कहानी

माणा गांव का दो बार प्रधान रहे पीतांबर सिंह मोलपा बताते हैं कि गांव वालों के 12 बुग्याल हैं, जिन्हें वे चरवाहों को किराए पर देते हैं. चरवाहे उनमें भेड़ चराते हैं. माणा के लोग उन चरवाहों से ऊन भी खरीदते हैं.

मोलपा बताते हैं कि गांव की लड़कियों के हाथों का बना कंबल बद्रीनाथ धाम में भगवान को चढ़ाया जाता है. उन्होंने बताया कि माणा गांव में बने कंबल को मंदिर में चढ़ाने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसी परंपरा के साथ गांव की महिलाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऊनी कपड़े बुनने का हुनर सीखती और आगे बढ़ाती रही हैं. माणा की पहचान आज भी उसके पारंपरिक ऊनी हस्तशिल्प से जुड़ी हुई है.

उत्तराखंड के चमोली जिले के माणा गांव को भारत का पहला गांव माना जाता है. यह गांव प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम के करीब ही स्थित है.

उत्तराखंड के चमोली जिले के माणा गांव को भारत का पहला गांव माना जाता है. यह गांव प्रसिद्ध बद्नीनाथ धाम के करीब ही स्थित है.
Photo Credit: Himanshu Joshi

बचपन में ही शुरू करती हैं सीखना 

26 साल की नीलम अपनी दुकान पर बैठी मिलीं, खुद के बनाए सुंदर और गर्म ऊनी कपड़ों के बीच नीलम बताती हैं कि गांव की आबादी करीब दो हजार है. इसमें करीब आधी महिलाएं हैं. वह कहती हैं कि देश का प्रथम गांव माणा शायद ऐसा इकलौता गांव होगा, जहां किसी परिवार की अर्थव्यवस्था में आधे से ज्यादा का योगदान महिलाओं का होता है.

नीलम के मुताबिक गांव की लड़कियां बचपन से ही ऊनी कपड़े बुनना सीख लेती हैं. बद्रीनाथ धाम के यात्रा सीजन के दौरान महिलाएं अपने हाथों से बुने स्वेटर, टोपी, कंबल, मोजे और दूसरे ऊनी कपड़े दुकानों में बेचती हैं.

आत्मविश्वास बढ़ा रहे हैं महिलाओं के समूह 

मोलपा बताते हैं कि ऊनी कपड़ों की बिक्री से गांव की महिलाएं यात्रा सीजन में लाखों रुपये तक की कमाई कर लेती हैं. इसके साथ ही वे खेती और पशुपालन में भी बराबर की भागीदारी निभाती हैं. गांव की महिलाओं ने मिलकर काम करने के लिए कई समूह भी बनाए हैं. इन समूहों के जरिए वे ऊनी उत्पाद तैयार करने, उन्हें बेचने और एक-दूसरे का सहयोग करने का काम करती हैं.

उत्तराखंड के माणा गांव में महिलाओं की ओर से तैयार ऊनी कपड़ों की एक दुकान.

उत्तराखंड के माणा गांव में महिलाओं की ओर से तैयार ऊनी कपड़ों की एक दुकान.
Photo Credit: Himanshu Joshi

मार्च 2026 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशनल रिसर्च (IJMER) में प्रकाशित डॉक्टर कृष्णा रॉय के शोध पत्र में माणा को जनभागीदारी आधारित विकास के एक उदाहरण के रूप में बताया गया है. अध्ययन के मुताबिक गांव में स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास कार्यक्रमों और सरकारी योजनाओं के जरिए पारंपरिक भोटिया ऊनी शिल्प को नए बाजारों से जोड़ने की कोशिश की गई है. शोध के मुताबिक, माणा में विकास का मॉडल समुदाय की भागीदारी और अधिकार आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है. अध्ययन में स्वयं सहायता समूहों, आजीविका कार्यक्रमों और पारंपरिक ऊनी शिल्प को बढ़ावा देने के प्रयासों को इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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