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श्यामा प्रसाद मुखर्जी: एक ऐसा शिक्षक, जो छात्रों को मशीनी पुर्जे नहीं बनाना चाहते थे

रजनीश कुमार सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 23, 2026 12:40 pm IST
    • Published On जून 23, 2026 11:58 am IST
    • Last Updated On जून 23, 2026 12:40 pm IST
श्यामा प्रसाद मुखर्जी: एक ऐसा शिक्षक, जो छात्रों को मशीनी पुर्जे नहीं बनाना चाहते थे

आज (23 जून) को डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि है. उन्हें आमतौर पर राजनीति और राष्ट्रवाद के संदर्भ में याद किया जाता है, जबकि उनका एक महत्वपूर्ण पक्ष जिस पर बात नहीं होती वह है शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान. आज जब भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने की घटनाएं सामने आ रही हैं और साथ ही विद्यार्थियों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बढ़ती समस्याएं राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी हैं, तब मुखर्जी के शैक्षणिक दृष्टिकोण विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देते हैं. ऐसे समय में उनके विचारों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत महसूस होती है.

शिक्षा पर डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का दृष्टिकोण

जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश में शिक्षा के भविष्य को लेकर गंभीर चिंतन कर रहे थे.उपकुलपति के रूप में 22 फरवरी 1936 के अपने दीक्षांत भाषण में डॉक्टर मुखर्जी ने शिक्षा के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा था, ''हमारा आदर्श है कि हम निम्नतम से लेकर उच्चतम स्तर तक ऐसी शिक्षा की सहज सुविधा दे सकें और साथ ही शिक्षा-पद्धति को भी इस तरीके से बदलें कि हमारा शिक्षा का उद्देश्य वस्तुतः ठोस हो. हमारे तरुणों की छिपी हुई प्रतिभाएं जागृत हों और वे त्रिकोणात्मक (बौद्धिक, शारीरिक तथा नैतिक) शिक्षा से ऐसे सम्पन्न हों कि राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों, गांव, कस्बों अथवा नगरों में एकनिष्ठ सेवाएं दे सकें.'' उनकी दृष्टि में शिक्षा का वास्तविक मकसद व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास था. मुखर्जी आगे कहते हैं,''हमारा लक्ष्य है कि हम स्वस्थ और उदार शिक्षा की अधिकतम सुविधा दे सकें, व्यावसायिक तथा शिल्प-संबंधी शिक्षा का समुचित संविश्लेषण कर सकें और यह बराबर ध्यान में रखें कि कोई भी राष्ट्र अपने युवकों को महज भौतिक लक्ष्य को आगे रख, मशीनी पुर्जे बनाकर कभी महान नहीं बन सकता.'' डॉक्टर मुखर्जी के विचारों और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें केवल राजनेता नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी शिक्षाविद बताया है. 

डॉक्टर मुखर्जी ने शिक्षा जगत में अपनी यात्रा पिता आशुतोष मुखर्जी के सानिध्य में शुरू की, जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे. अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, 1934 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा उपकुलपति के रूप में कार्यभार संभाला. अपने कार्यकाल में उन्होंने भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का महत्वपूर्ण काम किया. बांग्ला को मैट्रिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम बनाया गया.बांग्ला, हिंदी और उर्दू में ऑनर्स परीक्षाओं की व्यवस्था की गई. साल 1936 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा बांग्ला में दिया गया दीक्षांत भाषण भारतीय भाषाओं को विश्वविद्यालयी प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था. मुखर्जी ने शिक्षा को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा. शारीरिक शिक्षा, छात्र कल्याण, रोजगार मार्गदर्शन, कृषि और विज्ञान शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और विद्यार्थियों के समग्र विकास पर विशेष बल दिया. नई शिक्षा नीति 2020 में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर जोर दिया गया है. यह विचार उन प्रयासों से मेल खाता है जिनका समर्थन डॉक्टर मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में किया था.

कैसे हो छात्र कल्याण और रोजगार की व्यवस्था

डॉक्टर मुखर्जी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य, कल्याण और भविष्य को बहुत महत्व देते थे. उन्होंने छात्रों की सहायता के लिए विद्यार्थी-कल्याण-विभाग और कैरियर मार्गदर्शन की व्यवस्थाएं शुरू कीं. वे युवाओं को रोजगार दिलाने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायता देने के पक्षधर थे. इसके साथ ही उन्होंने विज्ञान, उद्योग और कृषि जैसी व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा दिया ताकि छात्र पढ़ाई के बाद काम पाने में सक्षम बन सकें. आज जब परीक्षा का दबाव, पेपर लीक, बेरोजगारी और विद्यार्थियों की मानसिक समस्याएं चिंता का विषय हैं, तब छात्र कल्याण और युवाओं के विकास पर उनका जोर विशेष महत्व रखता है.

प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी किताब 'अमर शहीद डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी' में जिक्र किया है कि 'मुखर्जी शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे.'

राष्ट्र निर्माण का केंद्र हैं शिक्षक 

श्यामा प्रसाद मुखर्जी शिक्षकों को भी राष्ट्र निर्माण का केंद्र मानते थे. डॉक्टर मुखर्जी का मानना था कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि चरित्रवान, स्वतंत्र विचारों वाले और देशभक्त नागरिकों के निर्माता होने चाहिए. उन्होंने कहा था,''शिक्षकों को अधिक अधिकार और सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि वे सच्चे, प्रामाणिक और देशभक्त नर-नारी, नेता और कार्यकर्ताओं का निर्माण कर सकें.'' लेकिन आज एक ओर लाखों अभ्यर्थी शिक्षक भर्ती की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में भारत में ऐसे 1,04,125 स्कूल थे, जिन्हें केवल एक शिक्षक चलाता था. इन स्कूलों में कुल 33,76,769 छात्र पढ़ते थे, यानी हर स्कूल में औसतन करीब 34 छात्र.

विद्यार्थियों को लेकर सपने और आज का सच

कलकत्ता विश्वविद्यालय के वार्षिक समारोह में डॉक्टर मुखर्जी ने एक कार्यक्रम में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा था,''मुझे युवकों के पुरुषार्थ पर अखंड विश्वास है और मैं बंगाल के विद्यार्थियों के नाम पर सरकार से मांग करता हूं कि उन्हें जीवित रहने, जीवन का उपभोग करने और अपने स्वास्थ्य का विकास करने की सुविधाएं दी जाएं, ताकि वे हमारी मातृभूमि के बड़े-से-बड़े हित को पूरा करने में सहायक सिद्ध हो सकें.'' लेकिन 2024 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं. एनसीआरबी के मुताबिक 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की. यह अब तक का सर्वाधिक दर्ज आंकड़ा है. जबकि देश में कुल आत्महत्याओं की संख्या में मामूली गिरावट दर्ज की गई.

आज जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित होती जा रही है, शिक्षक संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं और छात्र मानसिक दबाव के कारण जीवन तक खो रहे हैं. ऐसे समय में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की शिक्षा संबंधी दृष्टि केवल इतिहास में ही नहीं बल्कि वर्तमान में भी सार्थक लगती है. बहरहाल आज डॉक्टर मुखर्जी को याद करने का दिन है. श्रीनगर में 23 जून, 1953 को उनकी मृत्यु हुई थी. 

(डिस्क्लेमर: लेखक टीवी और डिजिटल मीडिया के पत्रकार हैं. वो राजनीति से जुड़े विषयों पर लेख लिखते रहते हैं. उनकी पढ़ने और इतिहास में विशेष रुचि है. बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में बिताए जीवन ने उन्हें समाज और राजनीति को करीब से जानने-समझने का अवसर दिया. वो एनडीटीवी आने से पहले आज तक में काम करते थे.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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