भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 (1) कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर करेगा.
भारतीय संदर्भ में ये सेक्युलरिज्म की सबसे प्रभावशाली व संवैधानिक व्याख्या या परिभाषा है. इस लेख में हम इस परिभाषा के आधार पर नरेंद्र मोदी के राजकाज की समीक्षा करेंगे और देखेंगे कि ये शासन कितना सेक्युलर है.
भारत में सेक्युलरिज्म को नारेबाजी या विचारधारा या चुनावी मुद्दे के तौर पर देखने की गलत परंपरा रही है. यहां तक कि लोग भी खुद को सेक्युलर घोषित कर देते हैं. जबकि सेक्युलरिज्म शासन और व्यक्ति व समाज के संबंधों के आधार पर तय होता है. कोई व्यक्ति सेक्युलर नहीं हो सकता. शासन या विधान ही सेक्युलर हो सकता है.
भारत में सेक्युलरिज्म
भारत में सेक्युलरिज्म की व्याख्या में एक और समस्या रही है. कुछ पार्टियों और अकादमिक लोगों के एक समूह ने इसकी ये व्याख्या कर दी है कि अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम तुष्टिकरण ही सेक्युलरिज्म है. इसका विस्तार यहां तक होता है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति में जो कुछ श्रेष्ठ है, उसे नकारे बिना कोई आदमी या सरकार सेक्युलर नहीं हो सकती. इसका एक उदाहरण है मदरसों को सरकारी बजट से चलाना है या जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एससी और एसटी का संवैधानिक आरक्षण बंद कर उसे अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी घोषित कर दिया जाता है और वहां मुस्लिम आरक्षण लागू कर दिया जाता है. इसके बावजूद उसे पूरी तरह सरकारी अनुदान और बजट से चलाया जाता है.
इसकी तुलना में अब हम देखेंगे कि नरेंद्र मोदी के शासन को क्यों सर्वाधिक सेक्युलर कहा जाना चाहिए.
नरेंद्र मोदी की सरकार में सेक्युलरिज्म कैसा है
दरअसल नरेंद्र मोदी ने सेक्युलरिज्म को नारे या विचारधारा के तौर पर न देखना देखना तय किया. उनका सेक्युलरिज्म वहां निहित है, जहां उसे होना चाहिए या जो उसकी मूल या शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार है अर्थात नीतियों और राजकाज में. नरेंद्र मोदी की नीतियां लोककल्याण की ज्यादातर योजनाओं को सार्वभौमिक अर्थात यूनिवर्सल बनाती हैं. इसे वे सैचुरेशन या संतृप्तिकरण कहते हैं. इसका अर्थ है कि नीतियां ऐसी हों कि कोई भी छूटे नहीं. जब भी किसी योजना का लक्ष्य सौ फीसदी कवरेज होगा अर्थात जब वो हर किसी तक पहुंचेगी तो अपने आप धर्म, जाति, भाषा, औरत-मर्द के भेद से ऊपर उठ जाएंगी.यही वो आधार है जिससे हमें पता चलता है कि नरेंद्र मोदी भारतीय इतिहास में सबसे सेक्युलर सरकार चला रहे हैं.
दरअसल यूरोप के एक बड़े दार्शनिक और सिद्धांतकार जॉन रॉल्स ने ये सिद्धांत दिया था कि न्याय की बुनियादी शर्त निष्पक्षता है. वे कहते हैं कि कोई व्यक्ति या राज्य सर्वश्रेष्ठ न्याय तब करता है जब अपनी स्थिति के बारे में अनभिज्ञ बन जाता है. इसे वे अज्ञानता का पर्दा कहते हैं. ऐसा पर्दा होने से व्यक्ति ऐसी नीतियां बनाएगा, जो किसी को भी नुकसान न पहुंचाए क्योंकि नुकसान उठाने वाला कौन होगा, ये उसे पता नहीं होगा. वो व्यक्ति वह खुद भी हो सकता है.
इसी तरह सेचुरेशन या यूनिवर्सल होने पर कोई नीति हर किसी तक पहुंचती है और कोई नहीं छूटता. इसका मतलब हर तरह के धार्मिक, जातीय, लैंगिक भेदभाव से मुक्ति है. योजनाएं जब हर किसी तक पहुंचेगी तो स्वाभाविक रूप से न करप्शन हो पाएगा न भेदभाव. इन योजनाओं में न कोई हिंदू होगा, न मुसलमान, न बौद्ध, सिख या जैन. न कोई दलित होने के कारण छूटेगा न कोई सवर्ण होने के नाते. जो मिलेगा, सबको मिलेगा, बराबर मिलेगा. इस सिद्धांत में आधुनिकता का भी तत्व है. इसमें व्यक्ति को स्वतंत्र इकाई के तौर पर देखा जाता है, न कि किसी समूह या समाज या धर्म या जाति के अंश के तौर पर. यानी ग्रुप की पहचान को सरकार यहां अनदेखी कर देती है.
सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों को कैसे मिलता है
नरेंद्र मोदी के समय एक और बदलाव ये आया है कि कई सरकारी योजनाओं में लाभ सीधे व्यक्ति के खाते तक पहुंचता है. इसमें बीच में कोई नेता, दलाल या अफसर या ठेकेदार या कर्मचारी नहीं होता, जो ये तय करे कि किसे इस महीने की रकम मिलेगी और किसे नहीं. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से उस समस्या का समाधान हुआ है जिसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इन शब्दों में कहा था, ''हम सरकारी योजनाओं का जो एक रुपया केंद्र से भेजते हैं उसका सिर्फ 15 पैसा ही नीचे पहुंचता है, बाकी रकम बीच में ही लोग खा जाते हैं!''
अब हम उन योजनाओं को देखेंगे जिनका कवरेज बहुत व्यापक है और जो या तो यूनिवर्सल यानी हर किसी के लिए लागू हो चुकी है या उस दिशा में काम हो रहा है. इस समय भारत के करीब 95 करोड़ लोग किसी न किसी सरकारी योजना से सीधे जुड़े हैं. जबकि 2015 में सिर्फ 25 करोड़ लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा था. मिसाल के तौर पर, प्रधानमंत्री जनधन योजना में अब तक 57 करोड़ से ज्यादा लोगों के खाते खुले हैं और इसमें जमा रकम तीन लाख करोड़ के आसपास हो चुकी है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि आधे से ज्यादा खाते महिलाओं के हैं. ये खाते उन लोगों के हैं, जिनका पहले कोई बैंक खाता नहीं था. इन खातों के आधार और मोबाइल से जुड़े होने से 'जैम त्रिमूर्ति' अर्थात जनधन-आधार-मोबाइल का तंत्र बना है, जिसके कारण योजनाओं का लाभ प्रामाणिक रूप से सही व्यक्ति तक पहुंचा पाना संभव हुआ है. इससे लीक और भ्रष्टाचार की आशंका न्यूनतम हो गई है.
करोड़ों महिलाओं को दिया धुआं मुक्त रसोईघर
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने अब तक दस करोड़ से ज्यादा रसोई घरों को पूरी तरह या काफी हद तक धुआंमुक्त कर दिया है. ये महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है. महिलाओं को लकड़ी चुनकर लाने जैसी दिक्कतों से भी मुक्ति मिली है. आयुष्मान भारत योजना से वंचितों और गरीबों के लिए भी अस्पतालों में भर्ती होने, सर्जरी और इलाज कराना संभव हुआ है. इस योजना से 42 करोड़ लोग जुड़े हैं. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना बिना गिरवी के छोटा लोन देने के उद्देश्य से शुरू की गई है ताकि लोग इससे बिजनेस या कोई काम कर सकें और साहूकारों को चंगुल में न फंसें. इसमें अब तक 57 करोड़ लोन दिए गए हैं जिसकी कुल रकम लगभग 40 लाख करोड़ रुपए है.
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना कोविड महामारी के समय शुरू की गई थी, लेकिन उसे आगे भी लगातार जारी रखा गया. इसमें 80 करोड़ लोगों को सरकार अनाज देती है. इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा के साथ ये भी है कि लोग दोबारा भुखमरी के शिकार न बनें. इसी तरह जल जीवन मिशन के तहत नल से जल पहुंचाने का कवरेज 80 फीसदी से ज्यादा हो चुका है.
स्वच्छता मिशन के तहत लगभग हर घर में टॉयलेट बनाए जा चुके हैं. वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत हर परिवार के लिए पक्का घर बनाने की योजना अपने दूसरे चरण में है.
इनमें से किसी भी योजना में किसी को धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर बाहर नहीं रखा जाता है. सरकार ये भी कोशिश करती है कि कोई छूट न जाए. इसके लिए सघन रूप से विकसित भारत संकल्प यात्रा का अभियान चलाया गया. यानी सरकार न सिर्फ योजना बना रही है, बल्कि उसे लागू कर रही है.
आलोचक कह सकते हैं कि इसे सेक्युलरिज्म क्यों कहा जाए. पर जनता के लिए यही सेक्युलरिज्म है कि सरकार उनमें से हर किसी तक बिना भेदभाव के पहुंच रही है. हां, ये जरूर है कि वोट बैंक के लिए किसी विशेष समुदाय का तुष्टिकरण बंद हो गया है.
यही बात नरेंद्र मोदी को भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे सेक्युलर प्रधानमंत्री बनाती है.
(डिस्क्लेमर: लेखक सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार में वरिष्ठ सलाहकार हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )