किसान आंदोलन का एक साल, कहीं चुनाव राजनीति या वर्चस्व की लड़ाई में न बिखर जाए

आज किसान आंदोलन का एक साल पूरा हुआ है. कानून वापसी के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन किसानों को किसान बना गया. इस एक साल के दौरान किसानों ने उस पहचान को जी भरकर जिया है, जिसे किसान कहते हैं.

किसान आंदोलन का एक साल, कहीं चुनाव राजनीति या वर्चस्व की लड़ाई में न बिखर जाए

आगे के आंदोलनों के समय याद किया जाएगा कि किसान आंदोलन जैसा हो रहा है या नहीं

नमस्कार मैं रवीश कुमार, आज दूध क्रांति के जनक मिल्कमैन वर्गीज कुरियन की सौवीं जयंती है. आज संविधान दिवस भी है. आज किसान आंदोलन का एक साल पूरा हुआ है. कानून वापसी के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन किसानों को किसान बना गया. बहुत मुमकिन है कि यह पहचान जल्दी ही चुनावी राजनीति में हिन्दू, मुसलमान, अपनी-अपनी जाति अपने-अपने खाप और अलग-अलग संगठनों और उनके नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में बिखर जाएगी. लेकिन इस एक साल के दौरान किसानों ने उस पहचान को जी भरकर जिया है, जिसे किसान कहते हैं. जो पहचान बेहद रस्मी और उबाऊ हो गई थी कि ये हमारे अन्नदाता हैं, विधाता हैं. किसानों ने देख लिया कि सत्ता उन्हें जरूरत के हिसाब से अन्नदाता कहती है और जब जरूरत होती है, उसी अन्नदाता को आतंकवादी भी कहती है. एक ऐसे दौर में जब आंदोलनों का मजाक उड़ाया जाने लगा था, आपको याद नहीं होगा लेकिन याद दिला दे रहा हूं, 

साल था 2015 का, महीना था जुलाई और अगस्त, जिन लोगों को सुरक्षाकर्मी धकिया रहे हैं, वो भारतीय सेना के रिटायर्ड अफसर और कर्मचारी हैं. इनके साथ भी वही बर्ताव हुआ जो छह साल बाद किसानों के साथ हुआ. आप देख रहे हैं कि जंतर-मंतर पर कैसे इनके तंबू उखाड़ दिए गए और बैनर पोस्टरों को फाड़ दिया गया. इस दौरान सरकार की बेरुखी से आहत होकर पूर्व सैनिकों ने 22,000 मेडल राष्ट्रपति को लौटा दिए जो आज तक वापस नहीं लिए हैं. 15 जून 2015 से पूर्व सैनिकों ने जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया था. क्रमिक भूख हड़ताल के जरिए भारतीय सेना के ये अधिकारी वन रैंक वन पेंशन लागू किए जाने की मांग करते रहे. करीब 146 दिनों के बाद 7 नवंबर 2015 को सरकार ने आदेश निकाला. इस तरह से वन रैंक वन पेंशन की मांग का समाधान मान लिया गया लेकिन रिटार्यड मेजर जनरल सतबीर सिंह का कहना है कि उनका आंदोलन आज भी चल रहा है और 2357 दिन हो गए हैं. सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसकी सुनवाई 30 नवंबर को होनी है. 

1 मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था जो भी विसंगतियां हैं, उनका बातचीत से समाधान निकाला जाए, लेकिन मेजर जनरल सतबीर सिंह का कहना है कि आज तक बातचीत नहीं हुई. यह याद इसलिए दिला रहा हूं कि व्हाट्सएप में ये मीम देखा, जिसमें लिखा है कि मैं सिपाही हूं और किसानों से खुद को अलग कर रहा हूं. मैं अपने देश को ब्लैकमेल नहीं करता. इस तरह का मैसेज जो फार्वर्ड कर रहे हैं, वो सेना के ही रिटायर्ड अधिकारी के इस पुराने बयान को सुन लें जो उस वक्त उन्होंने कहा था. 

“जहां तक सिक्योरिटी का लेवल है यहां एक सैनिक रहता है, हम बेशक आज रिटायर्ड हैं हमारे अंदर वही अनुशासन है. यहां एक सैनिक है. अगर उस पर भी शक है तो फिर I think आगे क्या होगा."

सैनिकों के साथ भी वही हुआ था जो छह साल बाद किसानों के साथ हुआ. वन रैंक वन पेंशन का मामला सुलझा हुआ घोषित करने के बाद भी अटका हुआ है. अगर आप जून से नवंबर तक का ही जोड़े तो सैनिकों को भी पांच महीने टिक कर आंदोलन करना पड़ा था. जिसके लिए खुद प्रधानमंत्री 15 सितंबर 2013 को रिवाड़ी की रैली में वादा कर आए थे. अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद किसान आंदोलन को चले जाने की सलाह देने वाले सतबीर सिंह से बात कर सकते हैं, वे भी सेना में अधिकारी रहे हैं और मेजर जनरल के पद से रिटायर हुए हैं. आज किसान आंदोलन के एक साल हो गए. सौरव ने नच्छत्तर सिंह से मुलाकात की, जो एक साल से सिंघु बोर्डर पर हैं. आंदोलन ही उनका घर है और घर में ही आंदोलन है.

यह कोई साधारण लड़ाई नहीं है. इस लड़ाई से एक साल के दौरान किसान आंदोलन ने यही हासिल किया है कि पहले के ऐसे आंदोलन याद आते हैं कि किसान आंदोलन जैसा हुआ था या नहीं और आगे के आंदोलनों के समय याद किया जाएगा कि किसान आंदोलन जैसा हो रहा है या नहीं. किसान आंदोलन दूसरे आंदोलनों का भी आंदोलन है. उन्हीं का दिया हुआ यकीन है कि आज सरकारी कर्मचारी उम्मीद कर रहे हैं कि पुरानी पेंशन की व्यवस्था लागू हो जाएगी और बैंक के कर्मचारियों को हौसला आ गया है कि निजीकरण रोक देंगे. 

इस बस में सवार ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन (एआईबीओसी) के सदस्य कोलकाता और मुंबई से दिल्ली की तरफ निकले हैं. 26 नवंबर को शुरू हुई यह बस यात्रा अकेली नहीं है, बल्कि इस तरह से कई और जगहों से बसों में भरकर बैंक अधिकारी 30 नवंबर को दिल्ली पहुंच रहे हैं. रास्तों में बैंक के कर्मचारी इनका स्वागत करते हैं, भाषण होता है और निश्चय को दोहराया जाता है. किसान आंदोलन ने सबका खोया हुआ इरादा वापस किया है कि आज के हिन्दुस्तान में निजीकरण और खुले बाज़ार के नाम पर बोले जा रहे झूठ का मुकाबला किया जा सकता है. किसान आंदोलन का असर बैंकर्स एसोसिएशन की प्रेस रिलीज में दिख रहा है. इसमें आम आदमी से संवाद दिखता है कि क्यों ये अधिकारी सरकारी बैंकों के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं. आंकड़े दिए गए हैं कि बैंकों के निजीकरण के बाद एस सी ,एस टी और ओबीसी के लिए अवसर और आरक्षण खत्म हो जाएगा. 2018 में बैंकों के कर्मचारियों की संख्या 8.44 लाख थी जो मार्च 2021 में 7.7 लाख हो गई है. 1947 से 1955 के बीच बैंकों के विफल होने के 361 मामले सामने आए थे जिनमें लोगों के पैसे डूब गए थे. यही कारण था कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था.इसलिए निजीकरण सही नहीं है. 

हर आंदोलन के खिलाफ धारणाएं बनाई जाती हैं लेकिन किसान आंदोलन ने अब तक के ज्ञात इतिहास में धारणाओं का बेहतर तरीके से मुकाबला किया है. Citizen for Information Resilience के Intelligence Director बेंजामिन स्ट्रिक की आज ही छपी रिपोर्ट आप देख सकते हैं. बेंजामिन को डिजिटल इंवेस्टिगेटर कहा जाता है. आप देख सकते हैं कि किस तरह लोगों को बांटने की कोशिश हुई और किसने की होगी ये आप समझ सकते हैं. किस तरह सिमरन कौर, गुंजन कौर, सनप्रीत कौर और जसमीन कौर जैसे पंजाबी और सिख नामों का इस्तमाल कर नकली अकाउंट खोले गए. लोगों को यकीन हो सके, इसके लिए पंजाब के कलाकारों और संगीतकारों के चेहरे और नाम का भी इस्तमाल हुआ. ट्वीटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अकाउंट खोले गए. नकली अकाउंट वाले खुद को असली सिख और आंदोलन में शामिल किसानों को नकली सिख बता रहे थे. किसानों को आतंकवादी और खालिस्तानी बताया जा रहा था और भारतीय सेना से जुड़ी सामग्री बनाकर खुद को देशभक्त बना रहे थे. कई ट्वीट को विदेशों में काफी लाइक्स और री-ट्वीट मिले हैं. 

किसानों ने प्रोपेगैंडा के आतंक का भूत उतार दिया. वे आहत ही नहीं हुए कि हमवतनों के बीच पोस्टर लेकर खड़ा रहना पड़ता है कि किसान आतंकवादी नहीं हैं बल्कि मुकाबला किया. वे सोशल मीडिया और गोदी मीडिया के हमले के भय से आज़ाद हो गए. गोदी मीडिया ने पहले ही दिन किसानों को आतंकवादी और देशद्रोही कहना शुरू कर दिया था. किसानों ने बिना किसी हिंसा के गोदी मीडिया को अपने बीच से बाहर कर दिया. पोस्टर टांग दिया कि गोदी मीडिया वापस जाओ, हमें कवर मत करो. जिस मीडिया को हजारों करोड़ का विज्ञापन मिलता है, उस मीडिया की साख किसानों के बीच दौ कौड़ी की नहीं रही. किसान आंदोलन ने अपना ट्विटर हैंडल बनाया. इसके बीच लोगों ने अखबार निकाले, यू-ट्यूब चैनल बनाया. भारत के इतिहास में यह पहला आंदोलन है, जो मीडिया के बगैर एक साल चला है. इसकी जगह किसान आपस में आंदोलन को लेकर बात करने लगे. एक दूसरे के लिए मीडिया बन गए. 

हाउसिंग सोसायटी का व्हाट्सएप ग्रुप प्रोपेगैंडा का नया मैदान है. आप रिसर्च कर लीजिए और किसी से भी पूछ लीजिए.सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप में हर दिन नफरती और झूठा प्रोपेगैंडा फैलाया जाता है और इसके जरिए पोलिटिकल नैरिेटिव को कंट्रोल किया जाता है. शहरों में सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप ने किसानों के प्रति नफरत फैलाने में बड़ा काम किया. किसान आंदोलन के अनुभव बताते हैं कि आने वाले समय में जनता होना आसान नहीं होगा लेकिन अगर किसानों की तरह लड़ेंगे तो जनता हो सकते हैं. 

अकेले अकेले मार न खाओ, इकट्ठे होकर आगे आओ, ये नारा लग रहा है टिकरी बोर्डर पर. यहां भारतीय किसान यूनियन एकता उग्राहां ने गदरी बीबी गुलाब कौर नगर ही बसा लिया है. इस बड़ी रैली में कोई भी लाभार्थी की तरह बसों में लादकर नहीं लाया गया है. मगर मीडिया की नजरों से दूर यहां आंदोलन की सांगठिन तैयारी अलग ही स्तर की लगती है. यहां महिलाओं की भागीदारी और उपस्थिति काफी दिखती है. उधर गाज़ीपुर में गेहूं की बुवाई का सीजन होने के बाद भी किसान बड़ी संख्या में बैठे हुए हैं. इस एक साल में आंदोलन को लेकर किसानों का धीरज बढ़ता ही जा रहा है. वे जाने की जल्दी में नहीं हैं, बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी चाहते हैं. जिन सात सौ किसानों की मौत हुई है उनके लिए मुआवज़ा चाहते हैं और मुकदमे वापस चाहते हैं. हर सरकार के दौर में बार बार ठगे जाने वाले किसान इस बार किसी आश्वासन पर नहीं, अपने आंदोलन पर भरोसा करना चाहते हैं. इसलिए आज सिंघु बोर्डर और गाजीपुर बोर्डर पर किसान फिर से बड़ी संख्या में जमा हुए. सिंघु बार्डर पर पंजाब के अलग अलग ज़िलों से कई सौ ट्रैक्टर इस आंदोलन में पहुंचे हैं. टिकरी बोर्डर पर भी एक साल के मौके पर होने पर बड़ा जुटान किया गया है. 

देश का लोकतंत्र किसानों से सजता है तो पत्रकारिता का लोकतंत्र रिपोर्टर से. जितने ज्यादा रिपोर्टर होंगे और उन्हें मौका मिलेगा, वह संस्थान उतना ज्यादा लोकतांत्रिक होगा. जितने ज्यादा ऐंकर होंगे और रिपोर्टर नहीं होगा, वह कम लोकतांत्रिक होगा या होगा ही नहीं. शरद शर्मा, रवीश रंजन, सौरव शुक्ला, मुकेश सिंह सेंगर जैसे सहयोगियों ने किसान आंदोलन को गंभीरता से कवर किया है. हाथ में कैमरा लेकर मीलों पैदल चले हैं और किसानों की बात रिकार्ड की है. सुधीर राम और मोहम्मद मुर्सलिन जैसे कई कैमरामैन हर मौसम में तपे हैं. हमने इन सभी के बूते प्राइम टाइम के 60 से अधिक एपिसोड किए. सौरव, शरद और रवीश ने शानदार काम किया है. शरद गाजीपुर बोर्डर पर बने एक अस्थायी टेंट में गए, जहां अमरोहा और बिजनौर के किसानों से उनकी मुलाकात हुई. पिछले एक साल से यही उनका घर है. 

शरद: आपका क्या नाम हुआ जी?
मेरा नाम महीपाल सिंह है.  मैं बिजनौर से हैं. 
शरद: इस दौरान क्या मन में आया कि चलें घर वापस?

“देखो जाने को सबका दिल करता है. हम ये नहीं कि सरकार हमारे साथ क्या करेगी. इतने संघर्ष पर हमारी नहीं मानी तो हम घर जाकर क्या करेंगे. मोदी जी ने हम से मिलने क्यों नहीं आए. हम यूपी से आते हैं. गन्ना खेती करते हैं. गन्ने पर कुल सात साल में पचीस रुपये बढ़ा दिए और बिजली का बिल 4500 से 17 हज़ार हो गया.  950 का खाद 1400 हो गया. डीजल 65 से 100 हो गया. हमें राज़ी करने के लिए लालीपाप दे रहे हैं. हमें किसी पर भरोसा नहीं है. ये हमारी नहीं सुनी. कुछ नहीं मिल रहा है.”

समरपाल सिंह अमरोहा निवासी ने कहा कि “रावण के भाई कुंभकरण थे. छह महीने सोते थे, छह महीने जागते थे. छह महीने न सोए होते तो सीता वापस हो जाती और युद्ध नहीं होता. मोदी जी की आंखें खुली हैं, आतंकवादी बताया आंदोलनजीवी बताया, कितने जख्म दिए, कितनी गाड़िया इनके ऊपर चढ़ाई. कितने किसान भाई शहीद हो गए. अगर ये आंखें पहले खुल जाती तो इतना बड़ा जख्म नहीं होता.”

सौरव ने सिंघु बोर्डर पर मोहिनी कौर से बात की है. मोहिनी पहले दिन से यहां डंटी हैं और किसानों के फटे कपड़े और पगड़ी सिल रही हैं. दिल्ली की रहने वाली हैं. लेकिन एक साल से यहीं रह रही हैं. कहती हैं कि इस एक साल में बहुत कुछ देख लिया. 2011 में पति की मौत हो गई और 2014 में बेटे की भी. किसानों में ही अपने परिवार को देखती हैं. एक साल बहुत कुछ देखा. आग लगी थी तो बड़ी मुश्किल से जान बचाई. लोग यहां से जा रहे थे पर वो सबसे कह रही थीं कि अपनी फ़सल बो-काटकर वापस ज़रूर आना. 

रास्तों को लेकर किसान आंदोलन को काफी बदनाम किया गया. सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला पहुंचा है. शरद शर्मा बता रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने यूपी की तरफ से दिल्ली जाने वाली सड़क की एक लेन खोल दी है. पहले दिल्ली से यूपी जाने का रास्ता खुला था. “बात यह हो गई है कि सुप्रीम कोर्ट में जब यह मामला आएगा दोबारा सुनवाई होगी सात दिसंबर को तब केंद्र कहेगी कि किसानों की मुख्य मांग थी कि तीनों कानून वापस लिए जाएं तो पीएम ने कह दिया है जो रास्ता बंद था, अपनी तरफ से खोल दिया है. ये कहा जाएगा कि किसान आंदोलन चल रहा है, संसद चलेगा तो ट्रैक्टर लेकर कूच करने की घोषणा की हुई है. इसलिए एहतिहायन सुरक्षा बढ़ा दी गई है. तो दो तर्कों के साथ केंद्र और दिल्ली पुलिस मजबूत तर्क रखेगी. अब किसानो को सोचना होगा कि वो सुप्रीम कोर्ट को क्या कहेंगे. यहां सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है. एक लेन पुलिस ने खोल दी है, लेकिन एक रास्ता बंद है. क्योंकि आंदोलन का हल नहीं निकला है, किसान सरकार की बात से संतुष्ट नहीं हो पाए हैं." 

किसान बार बार याद दिला रहे हैं कि आंदोलन के पहले दिन से वे दोहरा रहे हैं कि उनकी मांगे क्या है. उनकी मांगों में एम एस पी की गारंटी भी शामिल है. उनका आंदोलन केवल कृषि कानूनों की वापसी के लिए नहीं था. 

किसान पहले भी दिल्ली आए थे. 2018 में देश भर के कई किसान संगठनों के बैनर तले हज़ारों किसान इन्हीं मांगों को लेकर रामलीला मैदान में जमा हुए थे और ससंद मार्ग पर संसद का आयोजन किया था. रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक रैली भी निकाली गई थी. किसानों ने सरकार के आश्वासन पर भरोसा किया और चले गए. 2017 में कई हज़ार किसानों ने अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर तले नाशिक से मुंबई तक लांग मार्च किया था. भूमि अधिग्रहण, कर्ज़ा माफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी एक बड़ी मांग थी. किसान सरकारों की दहलीज़ पर दस्तक दे रहे थे लेकिन सरकार और गोदी मीडिया को यकीन हो गया था कि इन किसानों के व्हाट्सएप में हिन्दु मुस्लिम की राजनीति का कोई मीम ठेल कर और टीवी में डिबेट करा कर भटकाया जा सकता है. यह भरोसा सही भी निकला और आगे भी सही निकलेगा लेकिन फिलहाल किसानों ने बता दिया है कि वे धर्म के नाम पर नहीं बंटने वाले हैं. एक साल तक वे बिना बंटे रहे हैं.  

“संविधान दिवस पर राजधानी पहुंचेंगे आज एक साल बाद ऐतिहासिक सफलता एक साल. संकल्प का एक साल. इसलिए आज जीत के जश्न का दिन है, आगे जो जंग है उसका जज्डबा दिखाने का दिन है आने वाले पचास सौ साल तक ये एक साल याद किया जाएगा इस एक साल में किसान ने स्थापित किया कि वो इतिहास के कूड़ेदान में नहीं है वो इस देश का वर्तमान और भविष्य है इस एक साल में किसान ने खोया आत्मसम्मान पाया और किसान ने राजनीतिक हैसियत का एहसास किया किसान ने एकता स्थापित की.


खेती की समस्याओं पर बात होनी चाहिए और भाषण में नहीं मेज़ पर होनी चाहिए.सरकार ने अभी तक बातचीत का कोई संकेत नहीं दिया है. राजनीति इन मुश्किल सवालों से भाग रही है. उस इन सवालों से भागने का एक रास्ता दिख गया है. वो रास्ता धर्म का है. इसलिए आज कल हर दल धार्मिक कार्यक्रमों के ज़रिए इन सवालों को धक्का देने में लगा है. जनता के हित से ज्यादा धर्म के हित को लेकर नेता नेता बन रहे हैं. यूपी का चुनाव आ रहा है. थोडे दिनों में आप भूल जाएंगे कि चुनाव नीतियों को लेकर हो रहा है या धर्म के गौरव को लेकर. और आप रोक नहीं पाएंगे क्योंकि आप किसान नहीं हैं. आप एक दर्शक हैं. आप ब्रेक ज़रूर ले सकते हैं तो ब्रेक ले लीजिए. 

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दाम केवल पेट्रोल और डीज़ल के नहीं बढ़े थे, इस दौरान रेल यात्राएं भी महंगी हो गई थीं. उस पर कम बात हुई. अनुराग की यह रिपोर्ट उन सवालों को बीच बहस में ला रही है जिससे हर कोई किनारा कर रहा है. आखिर सीनियर सिटिजन को मिलने वाली रियायत क्यों खत्म की गई, कितने करोड़ सिनियर सिटिज़न ने कोरोना के दौरान यात्राएं की हैं और रेलवे ने उनसे कितना कमाया है.