कैसे बनती है ख़बर, जो ख़बर नहीं है

भारत में दो तरह का गोदी मीडिया है. एक गोदी मीडिया और दूसरा अर्ध-गोदी मीडिया. दोनों ही किसी घटना को इस तरह से कवर करते हैं जैसे ख़बर है. यह बात पूरी तरह से गलत भी नहीं होती क्योंकि व्यवस्था और विचारधारा दोनों, इस तरह से इंतज़ाम कर देते हैं कि ख़बर के ख़बर होने में कोई संदेह नहीं रह जाता.

कैसे बनती है ख़बर, जो ख़बर नहीं है

एक दर्शक के लिए पर्दा हटाकर देखना ज़रूरी होता है कि ख़बरें कैसे बनती हैं और किसी मुद्दे को कैसे ख़बरों की शक्ल दी जाती है.ताकि लगे कि ख़बर है तो उसका कवरेज हो रहा है.लेकिन यह खेल इतना गहरा है कि कब खेल और पर्दा बदल जाता है, समझना मुश्किल है. इसलिए ख़बर को देखते और पढ़ते समय हर दिन नए सिरे से अभ्यास करना पड़ता है. बहुत से दर्शकों को पता नहीं चलेगा कि कुछ मामलों को बेवजह कवर किया जा रहा है. भारत में दो तरह का गोदी मीडिया है. एक गोदी मीडिया और दूसरा अर्ध-गोदी मीडिया. दोनों ही किसी घटना को इस तरह से कवर करते हैं जैसे ख़बर है. यह बात पूरी तरह से गलत भी नहीं होती क्योंकि व्यवस्था और विचारधारा दोनों, इस तरह से इंतज़ाम कर देते हैं कि ख़बर के ख़बर होने में कोई संदेह नहीं रह जाता. हर तरह से लगेगा कि यही पत्रकारिता है और यही ख़बर है. ख़बरों को सेट-अप करने से लेकर उन्हें वैधता प्रदान करने का काम कैसे होता है, इसे समझने का प्रयास करते हैं. 

- अदालत,अपील,वकील, दलील, तारीख़ और जांच, इन सबके ज़रिए मुद्दे खड़े किए जाते हैं
- लगातार इंटरव्यू चलता रहे, डिबेट में कोई आता रहे, इसके लिए लोग खड़े किए जाते हैं
- कोई याचिकाकर्ता बन जाता है, कोई इतिहासकार बन जाता है और कोई प्रवक्ता बन जाता है
- मामले में दो पक्ष बना दिए जाते हैं और मीडिया की हेडलाइन में प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाता है. 
- दर्शक को लगेगा कि मीडिया संदेह और सवाल को लेकर बहस कर रहा है 
- लेकिन संदेह की आड़ में बहस में दावेदारी इस तरह से होती जाएगी कि वक्ता का सच ही सच है
- वक्ता के सच को सच बनाने के लिए ऐंकर भी दहाड़ते हुए पार्टी बन जाता है 
- आस्था के नाम पर व्यापक समाज जमा हो जाता है, जिसके सामने ग़लत को ग़लत कहना मुश्किल हो जाता है
- बहस करने वाला मीडिया अपनी तरह से दावों की पड़ताल नहीं करेगा बल्कि दावों को ही इतिहास बताएगा
- फिर अदालत में सुनवाई के दिन इसके कवरेज के लिए चैनलों की तरफ से अनेक रिपोर्टर उतार दिए जाते हैं. 
- इंटरव्यू में किए जाने वाले हर तरह के दावों को फ्लैश किया जाने लगता है
-इस तरह दोनों पक्षों को दिखाने के नाम पर कई सारी ग़लत बातें सही की जगह लेने लगती हैं
- आपको लगेगा कि मीडिया मुद्दे को कवर कर रहा है

कोशिश करेंगे तो आपको दिख जाएगा कि कैसे पत्रकारिता के नाम पर फेक पत्रकारिता खड़ी कर दी गई है जो फेक न्यूज़ से आगे की चीज़ है. पत्रकारिता का संबंध मुद्दों के अन्वेषण यानी Investigation से है, जो ऐसे मामले में कभी नहीं किया जाता है. बल्कि इसकी जगह कवरेज के नाम पर पत्रकार होने का अभिनय किया जाता है. इसे एक और उदाहरण से समझिए.

कई बार टीवी की रिपोर्टिंग में किसी ग़रीब की कहानी उसके आंसुओं के साथ भावुक बना देती है, लेकिन उसमें ग़रीबी के मूल कारणों का ज़िक्र नहीं होता, जिसकी जवाबदेही होनी चाहिए वह सरकार नहीं होती है,  उसकी नीतियां नहीं होती हैं. इस तरह से जहां आपकी नज़र होनी चाहिए, वहां से हटाकर रोते हुए ग़रीब पर टिका दी जाती है ताकि उसकी ग़रीबी नीतियों का नतीजा न लगे, उसकी अपनी नाकामी लगे. ऐसी रिपोर्ट में सरकार की तरफ से कोई वक्ता नज़र नहीं आता है. कुल मिलाकर यही कहना चाहता हूं कि ख़बरों के नाम पर आभासी ख़बरें होती हैं. वर्चुअल न्यूज़,  ख़बर नहीं होती है. आपकी आंखों के सामने ख़बरों की समानांतर दुनिया बना दी जाती है. जो ख़बर नहीं है, ख़बर की छवि है. जिसे अंग्रेज़ी में मिरर-इमेज कहते हैं, आप पैरलल यूनिवर्स भी कह सकते हैं. समानांतर दुनिया. 

यह मेरी अकेले की पीड़ा नहीं है, बल्कि गोदी मीडिया और अर्धगोदी मीडिया के भंवर में फंसे मेरे जैसे पांच-दस और लोग भी हैं जो हर दिन इस पेशे को गर्त में जाता देख हताश होते रहते हैं. हर तरफ कोर्ट में किसी मस्जिद की दीवार या उसके नीचे मंदिर के दावों की याचिका, बहस और उसका कवरेज़ है. कोर्ट का कमेंट है, अगली तारीख़ है, वकील का बयान है और यही सब हेडलाइन है. उसी कोर्ट में इंसाफ़ के दफन हो जाने और हासिल करने के संघर्ष के न जाने कितनी ख़बरें हैं, उनके कवरेज के लिए पूरे मीडिया में दो रिपोर्टर भी नहीं हैं. 

एक तरफ कोर्ट में याचिकाओं के स्वीकार किए जाने के बहाने कवरेज़ की आंधी चल रही है तो दूसरी तरफ इसी तरह के मामले में सरकार, कोर्ट के आदेशों को समय पर पूरा नहीं कर पाती है. आज हेट स्पीच मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछली सुनवाई में केंद्र से कहा गया था कि वह एक चार्ट बनाए, बताए कि कहां-कहां मामले दायर हुए हैं और किन मामलों में कार्रवाई हुई है. केंद्र ने कोर्ट में चार्ट दाखिल नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि हम चार्ट चाहते थे ताकि बार-बार यह भ्रम न पैदा हो.कार्यालय रिपोर्ट कहती है कि चार्ट दायर नहीं किया गया है. इन मामलों में सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों से कई बार उजागर हो चुका है कि सरकार कार्रवाई को लेकर कितनी तत्पर है. इस तरह की ढिलाई को लेकर कोई कवरेज नहीं है और है भी तो केवल नामभर के लिए. उसमें भी अदालत की टिप्पणी से आगे सरकार की जवाबदेही को लेकर सवाल कम ही है. 

इस तरह से आज दिनभर दिल्ली, मथुरा से लेकर वाराणसी की अदालतों की कार्यवाहियों को लेकर इतनी ख़बरें आती रहीं कि इनके अलावा दूसरी ख़बरें हैं भी या नहीं हैं, पता लगाना मुश्किल हो रहा था.आप इनसे हटकर अलग करना भी चाहें तो कुआं खोदने जैसा श्रम करना होगा. अलग से करने और दिखाने के लिए बहुत कुछ होता ही नहीं है. उम्मीद है आप समझने का प्रयास करेंगे. मैल्कम एक्स का एक बयान है  कि “पूरी धरती पर मीडिया से शक्तिशाली कोई तंत्र नहीं है. मीडिया अपनी इस अकूत शक्ति से  किसी बेकसूर को दोषी साबित कर दे और दोषी को बेकसूर बना दे. उसकी इस शक्ति का कारण यह है कि मीडिया जनता के दिलो-दिमाग़ को कंट्रोल करता है.” 

मैल्कम एक्‍स अफ्रीकी अमरीकी मूल के मुसलमान थे और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे.आज मैल्कम एक्स का जन्मदिन है. उनका जन्म 1925 में हुआ था. भारत में ऐसी ख़बरों और याचिकाओं की भरमार हो गई है कि यहां मंदिर है, यहां मूर्ति है. इनके किरदारों के बयानों से चैनलों और अखबारों के पन्नों को भर दिया गया है. व्यवस्था के हिसाब से गोदी मीडिया और अर्धगोदी मीडिया के ज़रिए राजनीतिक आंदोलन चलाया जा रहा है. राजनीतिक दल के कार्यकर्ता घर बैठे केवल व्हाट्स एप फार्वर्ड कर रहे हैं, बाकी का सारा काम मीडिया के संवाददाता कर रहे हैं. एक तरह से ऐसे मुद्दों के बहाने संवाददाता और ऐंकर चाहते हुए और न चाहते हुए भी, प्राक्सी कार्यकर्ता बन गए हैं. प्राक्सी का मतलब जैसे दारोगा के इम्तिहान में परीक्षार्थी की जगह कोई और परीक्षा देने आ जाता है. महंगाई से पीड़ित समाज महंगाई से पीड़ित है और मस्जिद में मंदिर मिलने के किस्सों में डूबा जश्न मना रहा है. 

ऐसे करोड़ों लोग होंगे,जो महंगाई की मार से पीड़ित होंगे, लेकिन, इसके बाद भी अखबारों में महंगाई की एक ख़बर छपती है, उस दिन छपती है, जिस दिन कोई सरकारी डेटा आता है, उस खबर के आगे-पीछे महंगाई के असर से जुड़ी बाकी खबरें नहीं होती हैं. ऐसा ही ज़्यादातर चैनलों में होता है. लेकिन,मंदिर को लेकर आप अखबारों और चैनलों को देखिए. इसी एक मुद्दे से सारी जगहें भरी पड़ी है. 

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू को एक साल की सश्रम कैद की सज़ा सुनाई है. सुप्रीम कोर्ट ने ही 15 मई 2018 को सिद्धू को एक हज़ार रुपये का जुर्माना देने का आदेश देकर छोड़ दिया था.तब भी इस फैसले को लेकर सवाल उठे थे. आज सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच का पुराना  फैसला बदल दिया. एक हज़ार की फाइन के अलावा एक साल की जेल भी काटनी होगी.1988 में पार्किंग में झगड़े के दौरान मारपीट से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. उसी मामले में सिद्धू को सज़ा मिली है. सिद्धू क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर सकते हैं. अगर वहां राहत नहीं मिली तो 364 दिन जेल में बिताने होंगे क्योंकि एक दिन वे जेल में बिता चुके हैं. 

आज रसोई गैस थोड़ी और महंगी हो गई.इन दिनों आपकी क्रय शक्ति की अग्नि परीक्षा हो रही है और आप हर बार महंगाई का सामना बहादुरी से कर भी रहे हैं. इसलिए इस ख़बर को यहीं छोड़ते हैं और छत्तीसगढ़ से आई इस रिपोर्ट को देखते हैं. अनुराग द्वारी बता रहे हैं कि कोरोना काल के बाद रेलवे बोर्ड ने ट्रेनों का नया टाइमटेबल जारी किया जिसमें छत्तीसगढ़ से गुजरने वाली दो दर्जन से ज्यादा ट्रेनों के स्टॉपेज ख़त्म कर दिए गए. जिसका दुष्प्रभाव लोगों के जीवन में दिखाई देने लगा है. कहीं छात्रों की पढ़ाई छूट गई तो लोगों का जीवन यापन का साधन ख़त्म हो गया है ...

 बेरोज़गारी से संबंधिक एक पॉज़िटिव न्यूज़ है. आस्ट्रेलिया भी उसी ग्लोब का हिस्सा है, जो इन दिनों ग्लोबल संकट से जूझ रहा है.लेकिन वहां बेरोज़गारी पचास साल में सबसे कम हो गई है. आस्ट्रेलिया के कई अखबारों में यह खबर छपी है कि बेरोज़गारी की दर में ऐतिहासिक गिरावट आई है. आस्ट्रेलिया के ब्यूरो आफ स्टेटिस्टिक के अनुसार पिछले महीने बेरोज़गारी की दर 3.9 प्रतिशत हो गई है. 1974 में बेरोज़गारी की दर 2.74 प्रतिशत थी, उसके बाद 3.9 प्रतिशत का ही नंबर आता है. यह भी देखा गया है कि पिछले महीने पक्की नौकरी की संख्या बढ़ी है और कच्ची नौकरी की संख्या में भारी गिरावट आई है. यह बड़ा बदलाव आया है. 

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हिन्दी प्रदेशों में कश्मीर को लेकर जिस तरह की धारणाएं हैं, उसे दूर करने का प्रयास किसी भी विपक्षी दल ने नहीं किया. ऐसा करने के लिए उन्हें मेहनत करनी पड़ती. पढ़ना पड़ता, कश्मीर के सवालों को समझना पड़ता और हिन्दी प्रदेशों के मन में जो सवाल हैं, उसे भी समझना पड़ता, तभी जाकर आप उन सवालों के जवाब दे पाते. क्या आप किसी एक विपक्षी नेता को जानते हैं कि जो कश्मीर को लेकर जनता के सवालों का जवाब दे सके, उनसे बात कर सके? क्या आपने कभी हिन्दी प्रदेश के विपक्षी दलों के नेताओं को कश्मीर पर बोलते सुना है? लोगों के मन में जो भ्रम बिठाया गया है, उस पर बोलते सुना है? इसका नतीजा यह हुआ है कि हिन्दी प्रदेशों में कश्मीर को लेकर एतरफा और मनमाना किस्सा फैल गया है. नज़ीर मसूदी की यह रिपोर्ट उस कश्मीर के परिचय कराती है जो एक साथ 'राहुल भट अमर रहे' का नारा लगाते हैं और 'रियाज अहमद अमर रहे' का भी.