नफरती डिबेट को लेकर चैनलों को कब तक पड़ती रहेगी डांट

ये हासिल है हज़ारों करोड़ के विज्ञापन और दिन रात के निवेश से चल रहे गोदी मीडिया का। मैंने कई बार कहा है कि आप इस देश की किसी भी चीज़ पर गर्व कर सकते हैं मगर गोदी मीडिया पर नहीं। केवल यहां ही नहीं, दुनिया में कहीं भी जाएंगे, गोदी मीडिया के कारण शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

नई दिल्ली:

गोदी मीडिया ने हिन्दू मुस्लिम डिबेट के ज़रिए न सिर्फ समाज में ज़हर फैलाया है बल्कि राजनीति और पत्रकारिता दोनों के आंगन को गंदा और भद्दा कर दिया है। आज पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू मुस्लिम नफरती डिबेट पर सख्त टिप्पणी की है,पिछले दो वर्षों के दौरन कई मौकों पर हाईकोर्ट ने और सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू मुस्लिम डिबेट और टीवी डिबेट के सिस्टम पर सख्त टिप्पणी की है।आज एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के एम जोसेफ ने कहा कि सबसे ज्यादा हेट स्पीच मीडिया और सोशल मीडिया पर है। हमारा देश किधर जा रहा है? उन्होंने केवल न्यूज़ चैनलों के डिबेट पर टिप्पणी नहीं की है बल्कि यह भी कहा है कि राजनीतिक दल इससे पूंजी बनाते हैं और टीवी चैनल एक मंच के रूप में काम कर रहे हैं. सबसे ज्यादा नफरत भरे भाषण टीवी, सोशल मीडिया पर हो रहे हैं, दुर्भाग्य से हमारे पास टीवी के संबंध में कोई नियामक तंत्र नहीं है. इंग्लैंड में एक टीवी चैनल पर भारी जुर्माना लगाया गया था. दुर्भाग्य से वह प्रणाली भारत में नहीं है. एंकरों को यह बताना चाहिए कि अगर आप गलत करते हैं तो परिणाम भुगतने होंगे. समस्या तब होती है जब आप किसी कार्यक्रम के दौरान किसी व्यक्ति को कुचलते हैं. जब आप टीवी चालू करते हैं तो हमें यही मिलता है

ये हासिल है हज़ारों करोड़ के विज्ञापन और दिन रात के निवेश से चल रहे गोदी मीडिया का। मैंने कई बार कहा है कि आप इस देश की किसी भी चीज़ पर गर्व कर सकते हैं मगर गोदी मीडिया पर नहीं। केवल यहां ही नहीं, दुनिया में कहीं भी जाएंगे, गोदी मीडिया के कारण शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। एक न एक दिन इस देश को, इस समाज को इस नतीजे पर पहुंचना ही होगा कि हज़ारों करोड़ों के विज्ञापनों से लैस गोदी मीडिया और पत्रकारिता के नाम पर ऐंकरों ने इस देश की राजनीति और पत्रकारिता को बर्बाद कर दिया। आज आप उनके पीछे खड़े होकर जितनी तालियां बजाना चाहते हैं, बजा लीजिए लेकिन एक दिन दिखेगा कि गोदी मीडिया कुछ और नहीं, जनता नाम की हस्ती को मिटा देने का हथियार है। लोकतंत्र का हत्यारा है।एक दिन नहीं, एक हफ्ता नहीं, एक महीना नहीं, एक साल नहीं, बल्कि आठ साल से यह तमाशा रोज़ न्यूज़ चैनलों पर चल रहा है। सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं होती, तो धर्म के नाम पर ये ऐंकर दूसरे धर्म को ललकारने लगते हैं, जिससे भ्रम फैले जाए कि पत्रकारिता कर रहे हैं। वो सवाल कर रहे हैं जो पूछने से लोग डरते हैं। जहां सवाल पूछना चाहिए, जिससे सवाल पूछना चाहिए, उसके सामने हलक सूख जाती है। जस्टिस के एम जोसेफ ने ठीक पहचाना है कि इस डिबेट से राजनीतिक दल लाभ उठाते हैं। 

सभी को यह समझ लेना चाहिए कि यह डिबेट केवल गोदी मीडिया के स्टुडियो में नहीं हो रहा है। ये आता कहीं और है। कई तरह से इस डिबेट के लिए माहौल पैदा किया जाता है। इस डिबेट को आप बीजेपी की राजनीति से अलग नहीं कर सकते। प्रधानंमत्री से लेकर गृह मंत्री और अन्य मंत्रियों के कई बयान मिल जाएंगे तो परोक्ष रुप से एक समुदाय को अक्सर निशाना बनाते हैं।कपड़ों से पहचाने जाने का बयान हो या पाकिस्तान में पटाखे फूटने का बयान, या फिर गोली मार देने का बयान हो या शाहीन बाग में करेंट लग जाने का बयान, इन बयानों की आड़ में और इनकी शह पाकर गोदी मीडिया ने नफरती मुद्दों का ज़हर समाज में फैला दिया। यह डिबेट दो तराज़ुओं के बीच संतुलन का नहीं है बल्कि इसकी प्रकृति साफ साफ मुसलमान विरोधी है। एक समुदाय को हर तरह के अधिकार बोध से निहत्था कर देने की राजनीति और रणनीति है। डिबेट चलती रहे इसके लिए जानबूझ कर उल्टा सीधा बोलने वाले दोनों तरफ से लाए जाते हैं।

2020 में तबलीग जमात और कोरना को लेकर कवरेज के टापिक को याद कीजिए। ये वही फर्ज़ी हेडलाइन हैं जो डिबेट के नाम पर उस साल चलती रहीं, जिस साल कोरोना की दहशत फैली थी। इनके ज़रिए आपके दिमाग में तबलीग के नाम पर ज़हर और कूड़ा भर दिया गया। केवल गोदी मीडिया काम नहीं कर रहा था बल्कि सरकारी प्रेस कांफ्रेंस में तबलीग के लोगों की संख्या अलग से बताई जाने लगी। सरकारी एजेंसी और गोदी मीडिया को अलग करना मुश्किल हो गया था। माहौल बनाया गया और उसकी आड़ में तबलीग से जुड़े कई लोगों को जेल में डाल दिया गया।21 अगस्त 2020 में बांबे हाईकोर्ट के जस्टिस टी वी नलवाड़े और जस्टिस एम जी सेविलकर की बेंच ने कहा कि दिल्ली में मरकज़ के कार्यक्रम में जो विदेशी नागरिक आए थे उनके ख़िलाफ  प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में बड़ा प्रोपेगैंडा चला और यह छवि बनाने का प्रयास किया गया कि ये विदेशी भारत में कोविड-19 के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार हैं।तमाम हालात इस संभावना की ओर इशारा करते हैं कि विदेशियों को बली का बकरा बनाने के लिए चुना गया। समय आ गया है कि विदेशियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने वाले प्रायश्चित करें और इससे जो नुकसान हुआ है उसे ठीक करने का सकारात्मक कदम उठाएं। 

आज पहली बार जस्टिस के एम जोसेफ ने नफरती डिबेट पर टिप्पणी नहीं की है, सितंबर 2020 में भी सुदर्शन टीवी के मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस के एम जोसेफ ने सख्त टिप्पणी की थी।अब सवाल है कि इन्हें नफरती डिबेट करने से रोक दिया गया तो ये करेंगे क्या। अगर सीधे सीधे और दिन रात सरकार की वाहवाही करेंगे तो जनता समझ जाएगी, वो करना मुश्किल होता है , इसलिए धर्म के नाम पर डिबेट खड़े किए जाते हैं ताकि ये दूसरे धर्म को ललकारते हुए नज़र आएं, सवाल करते हुए नज़र आएं। इसलिए नफरती डिबेट का सिलसिला किसी न किसी रुप में जारी रहेगा।

राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा 15 वें दिन में पहुंचने जा रही है। जयराम रमेश ने ट्विट किया है कि 283 की यात्रा पूरी हो चुकी है। हर दिन राहुल 20 किलोमीटर से ज्यादा चलते हैं। इस यात्रा के शुरू होने से पहले की प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने मीडिया की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। एक सवाल स्वामित्व का भी था, जो आज जस्टिस के एम जोसेफ ने उठाए हैं बल्कि दो साल पहले भी उठाए हैं। सुदर्शन टीवी के मामले में जस्चिस जोसेफ ने विज्ञापनों और स्वामित्व को लेकर भी सवाल उठाए थे।राहुल गांधी ने विस्तार से बताया था कि आज देश में घर घर नफरत पहुंचा दी गई है। इस नफरत के खिलाफ भारत को जोड़ने निकले हैं। मीडिया जनता की आवाज़ को सरकार तक और जनता तक पहुंचने नहीं दे रहा है। तो जनता के बीच जाकर बताने निकले हैं। मीडिया राहुल के टी शर्ट पर दिन रात बहस कर लेता है मगर विपक्ष को न  दिखाने, जनता की आवाज़ दबाने और स्वामित्व को लेकर राहुल के उठाए गए सवालों से भाग जाता है।राहुल की इस यात्रा के दौरान सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उनकी बहस को आगे बढ़ा रही है। बल्कि इस बहस में अब मंत्री अनुराग ठाकुर भी शामिल हो गए हैं। भले ही वे नफरती डिबेट और डिबेट के भद्दे तरीकों तक सीमित हैं। 

सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि सरकार नियामक तंत्र बनाए, कोर्ट ने आज और आज से पहले की अपनी टिप्पणियों में विज्ञापन और स्वामित्व को लेकर भी सवाल उठाए हैं। अब जब सरकार के मंत्री ही नफरती डिबेट को खारिज कर रहे हैं तो क्या उनके पूछा जाना सही नहीं होगा कि सरकार ऐसे डिबेट वाले चैनल को विज्ञापन क्यों देती है, यह डिबेट पिछले हफ्ते तो नहीं हुई है बल्कि आठ साल से दिन रात चल रही है।क्या सरकार को नहीं लगा कि गलत हो रहा है? 

एशिया-प्रशांत प्रसारण विकास संस्थान की 47 वीं बैठक में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्री अनुराग ठाकुर ने  कहा कि मुख्यधारा के मीडिया के लिए सबसे बड़ा खतरा नए जमाने के डिजिटल प्लेटफॉर्म से नहीं, बल्कि खुद मुख्यधारा के मीडिया चैनलों से है।विषय का ध्रुवीकरण करते हुए झूठी खबरें फैलाने और अपनी तथ्यहीन बातों को सिद्ध करने के लिए बेहद तेज आवाज में चिल्लाने वाले मेहमानों को आमंत्रित करना एक चैनल की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि अतिथि, उनके विचार और दिखाये जाने वाले दृश्यों के संबंध में आपके निर्णय दर्शकों की नजर में आपकी विश्वसनीयता को परिभाषित करते हैं। आपका शो देखने के लिए दर्शक एक मिनट के लिए रुक तो सकते हैं, लेकिन वह कभी भी आपके एंकर, आपके चैनल या ब्रांड पर समाचार की विश्वसनीयता और पारदर्शी स्रोत के रूप में भरोसा नहीं करेगा।

मंत्री तक बचाव नहीं कर पा रहे हैं और न गोदी मीडिया मंत्री से पूछ पा रहा है कि अगर आप इस तरह से  हमारी धज्जियां उड़ाएंगे तो कैसे चलेगा जबकि हम यह सब किसके लिए कर रहे हैं, दुनिया को भी पता है।गोदी मीडिया की हालत ऐसी है कि न तो वह जस्टिस जोसेफ की टिप्पणियों पर बहस कर सकता है न अनुराग ठाकुर की बात को लेकर।एक मामले में तो स्थिति और भी जटिल है।सुदर्शन टीवी के ऐंकर केवल टीवी ही नहीं, बल्कि उसके बाहर अलग अलग सभाओं में उनके बयानों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सुदर्शन टीवी पर एक कार्यक्रम चलने वाला था यूपीएससी जिहाद। जामिया के कुछ छात्र यूपीएससी की परीक्षा पास कर गए थे। सुदर्शन टीवी को लगा कि जिहाद चल रहा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।तब सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी के प्रसारण को लेकर कई सवाल उठाए थे। तब से लेकर आज तक क्या हुआ, इसकी ठोस जानकारी सरकार और गोदी मीडिया उद्योग ही दे सकते हैं। उस समय जस्टिस के एम जोसेफ ने बहस के दौरान एक टिप्पणी की 

“हमें दृश्य मीडिया के स्वामित्व को देखने की जरूरत है। कंपनी का संपूर्ण शेयरहोल्डिंग पैटर्न जनता के लिए साइट पर होना चाहिए। उस कंपनी के राजस्व मॉडल को यह जांचने के लिए भी रखा जाना चाहिए कि क्या सरकार एक में अधिक विज्ञापन डाल रही है और दूसरे में कम।"

केवल नफरती डिबेट का मामला नहीं, विपक्ष विरोधी पत्रकारिता का है। चुनावों में विपक्ष की खबरें गायब कर दी जाती हैं। आप कोई भी हिन्दी अखबार उठा कर देखिए, पूरा पन्ना एक दल के कवरेज से भरा रहता है। इस तरह का असंतुलन किसी भी लोकतंत्र को निगल जाएगा। विपक्षी दलों को पता है मगर कभी इधर तो कभी उधर की बात कर मामले को अधर में छोड़ देते हैं। हाल ही में अरविंज केजरीवाल ने भी इस तरह का गंभीर आरोप लगा दिया कि टीवी प किसे और कितना दिखाना है, कहीं और से कंट्रोल हो रहा है। 
सरकार खंडन कर देती है या प्रत्यारोप लगा देती है लेकिन गोदी मीडिया का कटेंट देख कर ही लगता है कि संतुलन गायब हो चुका है। इस समय केवल एक असंतुलन की बात हो रही है और वह है नफरती डिबेट।हाल में सेवानिवृत्त हुए चीफ जस्टिस एन वी रमना ने कहा था कि मीडिया घरानों के दूसरे बिज़नेस होते हैं। कई तरह की कंपनियां होती हैं जिसके कारण उन पर दबाव बढ़ जाता है और वे लोकतंत्र से समझौता कर लेते हैं। सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम को लेकर जब बहस चल रही थी तब से जस्टिस के एम जोसेफ और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने मानक बनाए जाने की बात की है। 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि "देश के भीतर सबसे अच्छा उपाय सुझाएं जिससे हम अपने मंच पर बहस में मदद कर सकें और फिर मानकों पर पहुंच सकें ...अब एक एंकर एक विशेष समुदाय को लक्षित कर रहा है। यह कहने के लिए कि हम एक लोकतंत्र हैं, हमें कुछ मानक तय करने होंगे।"

आज भी कहा है कि केंद्र सरकार क्या कर रही है। सरकार आगे क्यों नहीं आती है। राज्य को एक संस्था के रूप में जीवित रहना चाहिए। दो हफ्ते में जवाब देने के लिेए कहा है। आज भी नफरती भाषणों के मामले में अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। अब हम बढ़ते हैं जांच एजेंसियों की भूमिका की तरफ।क्या हम एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था में ज़बरन धकेले जा रहे हैं जिसमें एक ही दल दिखाई दे, बाकी सब या तो गायब कर दिए जाएं या फिर उनकी हालत ऐसी कर दी जाए कि लोग मान लें कि अब जो होगा उसी एक दल से होगा, आस-पास कोई विकल्प नहीं है।पिछले आठ साल में सत्ता पक्ष का अर्थ भारतीय जनता पार्टी की सरकार से ही रहा है। ऐसा नहीं है कि इस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर मीडिया में रिपोर्ट नहीं आई, या राजनीतिक आरोप नहीं लगे मगर जांच एजेंसियों की सक्रियता उस दिशा में कभी नहीं देखी गई। कर्नाटक की भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लग रहे हैं मगर वहां ED से लेकर CBI की सक्रियता नज़र नहीं आती है। जिस तरह से विपक्षी राज्यों में छापे पड़ने लगते हैं। 

आज बंगलुरु में कर्नाटक कांग्रेस ने इस तरह के पोस्टर लगा दिए जो देखने में Pay ™  के पोस्टर के जैसे लगते हैं। मगर इन पर Pay CM लिखा है। एक नंबर भी दिया गया है। कांग्रेस बताना चाहती है कि कमीशन सीधे आप मुख्यमंत्री को दे सकते हैं। बाद में इस पोस्टर को हटा दिया गया। खबरों तो छपती नहीं विपक्ष पोस्टर लगाकर भी जनजागरण नहीं कर सकता है, कितनी मुस्तैदी से पोस्टर हटा दिए जाते हैं। अगर बीजेपी ने इस तरह से पोस्टर लगाए होते तब क्या इन्हें इस तरह से हटाया जाता? आज यह सवाल नहीं पूछना चाहते हैं कोई बात नहीं, बीस साल बाद टाइम मिलेगा। 

यही नहीं कांग्रेस ने 40percentsarkar(a).com नाम से एक वेबसाइट बनाई है,इस पर लेक्चर की बहाली से लेकर वाइस चांसलर की तैनाती में कितनी घूसखोरी चलती है उसके रेट दिए गए हैं। इस वेबसाइट के अनुसार एक लाख से अधिक रिश्वतखोरी की शिकायतें आई हैं। इस मामले की पृष्ठभूमि यह है कि जुलाई 2021 में कर्नाटक के कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने बकायदा प्रधानंमत्री को ही पत्र लिख दिया कि किसी भी प्रोजेक्ट की लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा घूस मांगा जा रहा है। अगर प्रोजेक्ट 1 करोड़ का है तो चार लाख घूस में मांगा जाता है। इस पत्र में कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने बकायदा हिसाब देकर बताया कि किस तरह से रिश्वत मांगी जाती है। इस पत्र में यह भी लिख दिया कि सबसे पहले मंत्री को 5 प्रतिशत कमीशन की राशि घूस के रुप में दी जाती है।टेंडर मिलने के पहले ही यह पैसा देना होता है। कांट्रेक्टर ने प्रधानमंत्री को यह भी लिख दिया कि कुछ सांसद भी दो प्रतिशत कमीशन लेते हैं। ज़िला से लेकर तालुक स्तर के प्रतिनिधि 5 से 10 प्रतिशत कमीशन लेते हैं। कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने लिखा कि काम शुरू होने से पहले ही 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा कमीशन में बंट जाता है। काम हो जाने के बाद बिल क्लियर होने के बाद 5 प्रतिशत घूस देनी होती है। जब यह पत्र लिखा गया तब येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे।

कांट्रेक्टर का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। नए मुख्यमंत्री और राज्यपाल से भी कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई बदलाव नहीं हुआ। इस पत्र में कांग्रेस के समय में 10 प्रतिशत कमीशन का भी हिसाब लगाया। कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने बाहर आकर बोलने का साहस भी दिखाया मगर ED CBI की टीम कर्नाटक में बीजेपी नेताओ मंत्रियों के घर नहीं जा सकी देखने के लिए कथित रुप से 40 प्रतिशत कमीशनखोरी से उनका घर कितना भरा हुआ है। यहां तक कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भी प्रधानंमत्री ने कमीशनखोरी का मामला उठाया था लेकिन जब उनकी पार्टी की सरकार में कमीशनखोरी डबल हो गई तब कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई .
“पहले कांग्रेस की अकेली सरकार थी तो मिस्टर टेन परसेंट थे, याद है मिस्टर टेन परसेंट. अब दो की जोड़ी बन गई तो मिस्टर टेन मिलाकर ट्वंटी परसेंट हो गया है।”  कर्नाटक में 40 प्रतिशत की कमीशन खोरी का आरोप साधारण तो नहीं था, तब जांच एजेंसियों ने बीजेपी नेताओं की तिजोरी क्यों नहीं खंगाले? बीजेपी का ही कार्यकर्ता था संतोष पाटिल, कथित रुप से कमीशनखोरी से तंग आकर आत्महत्या कर ली।

संतोष पाटिल ने ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री ईश्वरप्पा पर आरोप लगा दिया कि उनके लोग काफी कमीशन मांग रहे हैं। उन्होंने कर्ज लेकर तीन-चार करोड़ का काम किया था, अब इतना कमीशन मांगा जा रहा है कि देना मुश्किल है। संतोष पाटिल ने आत्म हत्या कर ली। संतोष पाटिल बीजेपी के ही कार्यकर्ता थे। मीडिया की खबरों के अनुसार संतोष ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भी पत्र लिखा था।बाद में पुलिस जांच में यह घोषित कर दिया गया कि ईश्वरप्पा ने कोई कांट्रेक्ट नहीं दिया है। तब सवाल उठा कि ठेकों की दुनिया में हर काम लिखित नहीं होता है। ज़ुबानी चलता है। इसका प्रमाण तो होता नहीं और वो भी पुलिस जांच कर क्लिन चिट दे रही है तो संदेह और गहरा होता है। 

यही नहीं कि कर्नाटक में सहायक दारोगा की भर्ती के मामले में घूसखोरी को लेकर सीनियर आई पी एस अफसर को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि कथित रुप से एक उम्मीदवार से अस्सी लाख रुपये तक मांगे गए हैं। इस मामले में कथित रुप से बीजेपी की एक पूर्व ज़िलाध्यक्ष के कालेज का भी नाम आया है जहां परीक्षा में धांधली को अंजाम दिया गया। 
उत्तराखंड में सरकारी भर्ती में भयंकर घोटाला हुआ, छात्रों ने एक नहीं, कई बार प्रदर्शन किए, उनकी ज़िंदगी उनके सपने बर्बाद हो गए, लेकिन इस घोटाले की जांच के लिए क्या ED CBI ने बीजेपी नेताओं की तिजोरी खंगाली? 

मध्य प्रदेश में राज्य के महालेखाकार ने पोषण आहार मामले में ढाई सौ करोड़ तक के घोटाले का इशारा किया है।लेकिन क्या किसी के यहां छापे पड़े हैं। राज्य सरकार ने आराम से कह दिया कि यह ड्राफ्ट रिपोर्ट है, फिर कहा कि ज़्यादातर कांग्रेस के राज में घोटाले हुए हैं, कांग्रेस का नाम लेना होता है तब बीजेपी सरकार बिना जांच के ही आरोप लगा देती है लेकिन जब उस पर आरोप लगता है तब ED CBI क्यों नहीं बुलाई जाती है?

इसी संदर्भ में इंडियन एक्सप्रेस के दीप्तिमान तिवारी की यह पड़ताल महत्वपूर्ण हो जाती है। 20 और 21 सितंबर के एक्सप्रेस में छपी यह रिपोर्ट उन आरोपों और धारणाओं को मज़बूत करती है जो विपक्ष की कमर तोड़ देने के लिए CBI और ED का इस्तेमाल हो रहा है।

दीप्तिमान तिवारी ने अपने विश्लेषण में दिखाया है कि 2014 के बाद से राजनेताओं के खिलाफ ED के मुकदमों की संख्या 4 गुना बढ़ गई है। इनमें से 95 प्रतिशत नेता विपक्षी दलों के हैं। 2014 के बाद से 121 बड़े नेताओं के खिलाफ ED ने जांच की है, छापे मारे हैं, पूछताछ किए हैं, इनमें से 115 नेता विपक्ष के हैं।दीप्तिमान तिवारी ने लिखा है कि CBI की तुलना में ED की स्टाफ क्षमता काफी कम है। एक तिहाई कम है। UPA के दस साल में ED ने केवल 26 नेताओं के खिलाफ जांच की थी, उसमें 14 नेता विपक्ष के थे। करीब 54 प्रतिशत। मगर मोदी सरकार के आठ वर्षों में ही यह संख्या 121 हो गई है और 95 प्रतिशत विपक्ष के नेताओं के खिलाफ जांच हुई है। 2014 के बाद से कांग्रेस, तृणमूल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं के खिलाफ सबसे अधिक ED के मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन ऐसा कोई मुख्य विपक्षी दल नहीं बचा है जिसके नेता के खिलाफ ED ने मामला दर्ज न किया हो। एक तरफ ED CBI के निशाने पर ज्यादातर विपक्ष के नेता हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जिनके खिलाफ इन एजेंसियों की जांच चल रही होती है, और ये बीजेपी में जा रहे होते हैं। 

एक्सप्रेस ने लिखा है कि असम के मुख्यमंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा जब कांग्रेस में थे तब 2014 और 15 में CBI और ED ने जांच शुरू की थी। शारदा चिट फंड घोटाले में। 2014 में CBI ने हिमांता बिस्वा सरमा के घर और दफ्तर पर छापे भी मारे थे। लेकिन उनके बीजेपी के चले जाने के बाद इन मामलों में क्या प्रगति हुई है, कहीं कोई खबर भी नहीं दिखती है। उसी तरह तृणमूल के शुवेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय के खिलाफ भी CBI ED ने जांच शुरू की थी, दोनों बीजेपी में चले गए। मुकुल राय तृणमूल में लौट आए हैं और शुवेंदु अधिकारी अभी भी बीजेपी में हैं। यही नहीं 2019 में ED ने आंध्र प्रदेश के सांसद वाई एस चौधरी के घर पर छापे मारे, संपत्तियां सील कर दी लेकिन कुछ समय बाद वाई एस चौधरी ने टीडीपी छोड़ दी और बीजेपी में चले गए।

यह तस्वीर तो अभी अभी की है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह बीजेपी में शामिल हुए, बीजेपी में इनका स्वागत किरण रिजीजू कर रहे हैं जो खुद कांग्रेस से बीजेपी में आ गए थे।अमरिंदर सिंह के बेटे रनिंदर सिंह के खिलाफ भी ED की एक मामले में जांच चल रही है। 19 नंवबर 2020 को ED ने फारेन एक्सेंज मैनेजमें एक्ट FEMA के मामले में पूछताछ की थी। रिनंदर सिंह भी बीजेपी में शामिल हो गए। लुदियाना कोर्ट ने ED को अनुमति दी थी कि वह मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और उनके बेटे रनिंदर सिंह की आयकर की फाइल की चांज कर सकती है। 

क्या अब भी कोई संदेह रह जाता है कि दलबदल और सरकार गिराने के पीछे  जांच एजेंसियों की भूमिका केवल संयोग है?क्या माना जाए कि बीजेपी ने कांग्रेस या तृणमूल के सबसे ईमानदार नेताओं को अपनी पार्टी में लिया है?अनुराग द्वारी की इस रिपोर्ट को देख कर भी अनदेखा कर दिया जाएगा। कांग्रेज़ों पर जैविक खेती की ट्रेनिंग दी गई, आदिवासी इलाकों में किसानों के नाम पर कथित तौर पर लूट हुई, जैविक खेती के लिए ऐसे बीज दिए गए जो भारत सरकार की गाइड लाइन में ही शामिल नहीं हैं।आरोप ये भी हैं कि आदिवासी किसानों को जैविक खेती के नाम पर ट्रेनिंग देने के लिये मिले 110 करोड़ रु. की भी बंदरबांट हो गई।

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आज पीएम केयर फंड के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की बैठक हुई है। इस बैठक में प्रधानमंत्री के अलावा पूर्व जस्टिस के टी थॉमस, पूर्व डिप्टी स्पीकर करिया मुंडा और रतन टाटा ने हिस्सा लिया। कोविड के दौरान पीएम केयर फंड को लेकर कई सवाल उठे थे। इस फंड से कई जगहों पर वेंटिलेटर बांटे गए थे, जिनकी गुणवत्ता को लेकर कई खबरें छपीं मगर क्या हुआ,पता नहीं। आज पूजा की एक रिपोर्ट है। पूजा बता रही हैं कि नागरुप के इंदिरा गांधी गर्वनमेंट मेडिकल कालेज में 265 वेंटिलेटर बिना इस्तेमाल के पड़े हुए हैं। इनमें से 200 वेंटिलेटर पीएम केयर फंड के तहत भेजे गए थे। सोचिए इन्हें चलाने वाले लोग नहीं हैं मगर मशीन भेज कर वाहवाही लूट जाती है। रिपोर्ट है कि किडनी का एक मरीज़ वेंटिलेटर का इंतज़ार करता रह गया और मर गया।