केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से शुरु हुआ संवैधानिक विवाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई के लिए आ रहा है. लंबे अंतराल के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं पर सोमवार को अहम सुनवाई करने जा रहा है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच 9 जजों की संविधान पीठ के लिए सुनवाई की रूपरेखा तय करेगी. इस संविधान पीठ को सबरीमला मामले समेत धार्मिक प्रथाओं एवं मौलिक अधिकारों के टकराव से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर सुनवाई करनी है.
9 जजों की बेंच करेगी व्यापक सुनवाई
2018 में शीर्ष अदालत की पांच जजों की बेंच ने सबरीमला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक बताते हटाने का आदेश दिया था. इसके बाद दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मामला महज एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करना जरूरी है कि किसी धार्मिक प्रथा को “आवश्यक धार्मिक प्रथा” मानने की कसौटी क्या होगी, और ऐसे मामलों में न्यायपालिका के हस्तक्षेप की सीमा कहां तक है.
धार्मिक परंपराओं की समीक्षा का मुद्दा
इसी वजह से व्यापक संवैधानिक सवालों को 9 जजों की पीठ के पास भेजा गया था. ये अदालती सुनवाई केवल सबरीमला विवाद तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इस दौरान सुप्रीम कोर्ट विभिन्न धर्मों में प्रचलित प्रथाओं, धार्मिक स्वायत्तता, समानता के अधिकार और व्यक्तिगत गरिमा जैसे मुद्दों पर भी निर्णायक मार्गदर्शन दे सकता है. ये फैसला भविष्य में अदालतों द्वारा धार्मिक परंपराओं की समीक्षा के दायरे को भी स्पष्ट करेगा.
सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल
- 9 जजों की बेंच तय करेगी कि अदालतें किसी धार्मिक परंपरा की समीक्षा किस सीमा तक कर सकती हैं
- ये भी देखा जाएगा कि मौलिक अधिकार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता के टकराव को कैसे संतुलित किया जाए
- विभिन्न धर्मों में “आवश्यक धार्मिक प्रथा” की न्यायिक कसौटी जैसे व्यापक सवालों पर भी सुनवाई होगी
- पारसी समुदाय की अग्यारी (अग्नि मंदिर) में गैर पारसी या पारसी महिलाओं के प्रवेश से जुड़े अधिकारों पर विचार होगा
- दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना (FGM) से संबंधित संवैधानिक वैधता का मुद्दा भी उठेगा
सुनवाई पर देश भर की निगाहें
लंबे समय से लंबित इस सुनवाई पर देशभर की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि संविधान पीठ का अंतिम निर्णय धर्म और मौलिक अधिकारों के संतुलन को परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकता है. सबरीमला विवाद पर बने व्यापक संवैधानिक संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ के सामने केवल एक मंदिर से जुड़ा प्रश्न नहीं है बल्कि अलग-अलग धर्मों की प्रथाओं से जुड़े कई मुद्दे भी परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं.
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