पेट्रोल की मार के मुद्दे को उचित स्थान कब देगी सरकार

इतिहास में उचित स्थान बनाम वर्तमान को उचित स्थान, तय किया जाना चाहिए कि उचित स्थान का क्या मतलब है और ये कहां पर होता है

पेट्रोल की मार के मुद्दे को उचित स्थान कब देगी सरकार

बहुत ज़रूरी है कि हम उस उचित स्थान को तय कर दें जिसके न मिलने पर आए दिन राजनीति होती है. तय किया जाना चाहिए कि उचित स्थान का क्या मतलब है और ये कहां पर होता है. इतिहास के जिस मुद्दे को इतिहास की कक्षा में उचित स्थान मिलना चाहिए उसे लेकर टीवी पर चर्चा है और वर्तमान के जिस मुद्दे को मीडिया में उचित स्थान मिलना चाहिए उसके लिए कोई स्थान नहीं है.आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीज़ल के दाम उनकी चिन्ता रेखाओं में पहली हेडलाइन की तरह मौजूद है लेकिन अख़बारों और चैनलों के समाचारों में पेट्रोल और डीज़ल के दाम संक्षिप्त ख़बरों के कॉलम और स्पीड न्यूज़ के हवाले कर दिए गए हैं. 

इस साल 19 जनवरी को दिल्ली में पेट्रोल 85 रुपये लीटर था. यह भी कम महंगा नहीं था फिर 6 जून को 95 रुपया लीटर हो गया और 8 जुलाई को 100 रुपया लीटर हो गया और अब 105 रुपया लीटर से अधिक हो चुका है. इस तरह से दिल्ली के ही लोग दस महीने से महंगा पेट्रोल ख़रीद रहे हैं. दस महीने में 20 रुपये बढ़ा है. यानी हर महीने औसत 2 रुपये. कई शहरों में 110 पार कर रहा है. भोपाल और इंदौर में 114 पार है. राजस्थान के श्रीगंगानगर में पेट्रोल प्रति लीटर 117 रुपये से ऊपर जा चुका है.बजट और फर्ज़ी डिबेट के कारण न्यूज़ चैनलों की रिपोर्टिंग का ज़मीन से संबंध टूट चुका है. एक ही तरह की प्रतिक्रियाएं हैं लेकिन कोई होगा जो फीस नहीं दे पा रहा होगा, कोई होगा जो दवा नहीं खरीद पा रहा होगा, कोई होगा जो कार नहीं चला पा रहा होगा.मीडिया के इस दौर में लोगों के बीच मीडिया ही नहीं है और न मीडिया में लोगों के लिए जगह बची है. 

मीडिया अब अपने स्टुडियो में है जहां पर समय-समय पर इतिहास की थीम पर बहस हो रही होती है, जो प्रवक्ता पेट्रोल के दाम पर जनता के बीच जाने से कतराते हैं वो इतिहास की थीम के बहाने जनता के बीच ऊंची आवाज़ में कुछ भी बोल रहे होते हैं. इसकी शुरुआत बड़े नेताओं से होती है और फिर उनका सहारा पाकर बहस का जाल बिछ जाता है.

अमित शाह ने कहा है कि  “आज़ादी के बाद सरदार साहब को उचित सम्मान नहीं मिला, लेकिन इतिहास खुद को दोहराता है. आप किसी के साथ कितना भी अन्याय करो वो दब नहीं सकता है. मोदी जी ने सरदार साहब की विश्व में सबसे ऊंची प्रतिमा बनाकर इतिहास में भारत के लौहपुरुष को गौरवपूर्ण व सम्मानीय स्थान देने का काम किया है.”

हमने उचित स्थान की इतनी सीमित समझ बना ली है कि तीन हज़ार करोड़ की लागत से सरदार की प्रतिमा बना दी गई.देश भर में प्रतिमाओं की होड़ शुरू हो गई है.अगर उचित स्थान की यही समझ है कि किसकी मूर्ति किससे ऊंची हो तब तो इसका कोई अंत नहीं है. फिर तो जिन-जिन की मूर्ति की ऊंचाई सरदार पटेल की मूर्ति से कम है, उन्हें इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला. उन सबकी मूर्ति सरदार पटेल से ऊंची बने और एक-दूसरे से ऊंची होती चली जाए. 

सरदार पटेल की जीवनी राजमोहन गांधी ने लिखी है. अहमदाबाद के नवजीवन ट्रस्ट से छपी है. 1991 में छपी थी, तब जब उचित स्थान नहीं मिलने की भरमाने वाली राजनीति को प्रमुख स्थान प्राप्त नहीं हुआ था. सरदार पटेल पर 611 पन्नों की जीवनी लिखने के लिए राजमोहन गांधी को 166 किताबों, संदर्भ ग्रंथों और पटेल के भाषणों के संग्रह का अध्ययन करना पड़ा. जाहिर है कई महीने या कई साल भी लगे होंगे. सरदार पटेल के भाषण और लेखों का संग्रह ही 15 खंडों में प्रकाशित है. पीएन चोपड़ा ने कोणार्क प्रकाशन के लिए संकलित किया है. उचित स्थान समझना है तो कुर्सी मेज को उचित स्थान बनाएं और पढ़ने का प्रयास करें. नवजीवन ट्रस्ट ने सरदार पटेल के पत्रों का संकलन छापा है. दुर्गा दास ने इसे संकलित किया है. दस खंडों में छपा यह संकलन 4000 रुपये का है और करीब पांच हज़ार पन्ने हैं. ये पत्र 1945 से 1950 के बीच के हैं जो उन्होंने लिखे हैं और जो उन्हें लिखे गए हैं. तो सरदार को जानना है तो पांच हज़ार पन्ने पढ़ने होंगे. केवल मूर्ति से काम नहीं चलेगा. 

यह एक तरीका हो सकता है लेकिन इस मूर्ति को आप केवल देखते ही हैं जानने के लिए तो किताबों के बीच ही जाना होगा. जिस अहमदाबाद एजुकेशन सोसायटी ने अहमदाबाद यूनिवर्सिटी की स्थापना की वो सरदार पटेल की कल्पना थी. लेकिन प्राइवेट यूनिवर्सिटी होने के बाद भी एबीवीपी के विरोध के कारण राम गुहा यहां प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन नहीं कर सके थे.सरदार पटेल के किसी भी भाषण को पढ़िए असहमति के बीच सहमति के सरदार थे वे. लेकिन यहां मूर्ति बनाकर बताया जा रहा है कि सरदार पटेल को इतिहास में उचित स्थान दिला दिया गया है.

एक मंत्रालय तो सरदार पटेल के नाम से ही जाना जाता है. जिस मंत्री ने सिख किसानों को इलाके से बाहर कर देने की धमकी दी, जिनका बेटा हत्या के आरोप में जेल में हो, वह मंत्री सरदार की विरासत वाले गलियारे में आराम से चलते हुए देखे जा सकते हैं. सरदार पटेल ने अपने पोते को कह दिया था कि मेरे सरकारी निवास पर मत आया करो. बीमार हूं तभी देखने आओ अन्यथा दूर रहो.सरदार की यह नैतिकता यहां बिछी कालीन के नीचे हैं जिस पर अजय मिश्रा चल रहे हैं. आज अजय मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने देश भर में कई जगहों पर रेल रोको आंदोलन किया.100 से अधिक रेलगाड़ियां प्रभावित हुई हैं. लखीमपुर खीरी में कलश यात्रा निकाली गई. मोर्चा चाहता है कि मंत्री जी इस्तीफा देकर उचित स्थान को प्राप्त करें. 

मूर्ति इतिहास नहीं है. वह केवल स्मृति है. अमित शाह मूर्ति की ऊंचाई बताते हैं लेकिन सरदार पटेल का इतिहास नहीं बताते हैं. 1928 में बारदोली सत्याग्रह इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत ने टैक्स काफी बढ़ा दिया था. अगर यही इतिहास आज अमित शाह बताते कि सरदार कितने बहादुर थे तब जनता सवाल करती कि फिर हम पर टैक्स का बोझ क्यों लादा जा रहा है. पेट्रोल और डीज़ल इतना महंगा क्यों है. इसलिए कहता हूं मूर्ति के नाम पर सरदार पटेल का इतिहास छिपाया जा रहा है. 

यही नहीं इतिहास में एडमिशन लेने वाले छात्र इतिहास ही न पढ़ सकें इसका इंतज़ाम किया जा चुका है.अब पटना यूनिवर्सिटी का ही उदाहरण लीजिए. बिहार का प्रमुख विश्वविद्यालय है. गंगा के किनारे बना है दरभंगा हाउस है. हबीब यहां गए थे. इमारत कितना खूबसूरत है. लाइब्रेरी भी अच्छी है.बाहर से देखकर लगेगा कि सब कुछ कितना शानदार है.यहां पोस्ट गेजुएशन में कुल 240 छात्र हैं.कुल 24 स्थायी टीचर होने चाहिए लेकिन एक ही स्थायी शिक्षक हैं प्रो दिनेश कमल. बाकी 6 बाहर से आते हैं. गेस्ट फैकल्टी हैं. यहां के छात्र एक दिन बाहर आकर कहेंगे कि हमें तो इतिहास में पटेल के बारे में बताया नहीं गया.ऐसा कहने वाले पहले खुद से यही पूछ लें कि जानने के लिए उन्होंने इतिहास की कितनी किताबें पढ़ीं या केवल मूर्ति देखकर ही इतिहास की पढ़ाई समझ ली. 

उचित स्थान की इस अनुचित राजनीति को समझिए.पेट्रोल के कारण जो महंगाई आई है उससे मिडिल क्लास में पहुंचे लोगों का उचित स्थान छिन रहा है, वे सरककर निम्न मध्यम वर्ग की तरफ जा रहे हैं और निम्न मध्यम वर्ग वाले ग़रीबी की तरफ. आज किसी का उचित स्थान सुरक्षित नहीं है. जो ग़रीब है और ग़रीब हो जाएगा, उनका अनुचित स्थान और अधिक अनुचित हो जाएगा. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी एक नई थ्योरी लेकर आए हैं. उन्होंने कहा कि ''मैं पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हूं, मैं आपको बता सकता हूं, कोविड से पहले, हमारे पास पेट्रोल की एक निश्चित खपत थी, डीजल की एक निश्चित खपत थी. आज पेट्रोल की खपत प्री-कोविड की तुलना में 10 से 15% अधिक है और डीजल की खपत 6 से 10% अधिक है. बेशक मैं कीमत के मुद्दे पर नहीं जाऊंगा क्योंकि इसका लीवर दूसरे लोगों के हाथ में है. लेकिन हम मूल्य स्थिरता के लिए काम करना जारी रखेंगे.''

मंत्री जी की इस बात को आप कागज के एक टुकड़े पर उचित स्थान दीजिए. पहले लिखिए और फिर देखिए कि उनकी बात का कोई मतलब निकलता भी है या नहीं. मंत्री जी कह रहे हैं कि कीमतों पर बात नहीं करूंगा क्योंकि ये किसी और के हाथ में हैं. फिर कहते हैं कि हम कीमतों को स्थिर करने का प्रयास करते रहेंगे. दस महीने से अधिक समय से पेट्रोल और डीज़ल के दाम आसमान छू रहे हैं. यही नहीं मंत्री जी कह रहे हैं कि खपत बढ़ गई है तो क्या सप्लाई कम हो गई है जिससे दाम बढ़े हैं? इस तरह मंत्री जी आधी अधूरी बात इस बात पर खत्म कर देते हैं कि मैं कीमतों पर बात नहीं करूंगा क्योंकि वो किसी और के हाथ में है.पेट्रोल पंप वाले कह रहे हैं कि उनके पंप की बिक्री काफी घट गई है. करनाल, बेगुसराय के पेट्रोल पंप मालिकों का कहना है कि उनके पंप से बिक्री पचास प्रतिशत तक घट गई है.

ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय बंसल ने भी यही बात कही कि लोगों ने पेट्रोल ख़रीदना कम कर दिया है. कोविड के पहले का जो स्तर था अभी तक वहां नहीं पहुंच  सके हैं. बंसल का दिल्ली में एक पेट्रोल पंप हैं. उनका कहना है कि उनके पंप पर 60 प्रतिशत सेल कम है. तीन-तीन पेट्रोल पंप की आवाज़ है कि लोग पेट्रोल कम खरीद रहे हैं. उनके पास पैसे नहीं हैं. आम आदमी की हालत यह हो गई है कि एक लीटर तेल भराना मुश्किल हो गया है. पेट्रोल पंप पर लोग 40 रुपये, 50 रुपये का पेट्रोल भरा रहे हैं. 
करनाल के मोहित ने बताया कि आमदनी कम हो गई है. पेट्रोल इतना महंगा है कि टंकी फुल कराना भूल गए हैं. मोहित नमकीन चीज़ों का कारोबार करते हैं. कहते हैं कि लोग वो भी नहीं खरीद रहे हैं. इसलिए जेब में जितना पैसा होता है उसी हिसाब से तेल डलवाते हैं. इनकी मायूसी को समझिए. लोग बच्चों की फरमाइश पूरी नहीं कर पा रहे हैं. इंदौर में पेट्रोल 114 रुपये लीटर से अधिक है. यहां भी कई लोग आधा लीटर पेट्रोल भराने लगे हैं. 

विपक्ष के नेता हर दिन बोल रहे हैं. आए दिन प्रदर्शन भी होते रहते हैं लेकिन इन मुद्दों को उचित स्थान से बेदखल कर इतिहास के नायकों के उचित स्थान की चर्चा हो रही है उसमें भी झूठ बोला जा रहा है. जब तथ्य सामने रखे जा रहे हैं, तो जवाब देते नहीं बनता. सावरकर मामले में क्या हुआ. सम्मान दिलाने के नाम पर झूठे तथ्यों का सहारा लिया गया. क्या झूठ को भी उचित स्थान चाहिए? फिर सच का उचित स्थान क्या होगा? हवाई जहाज़ का ईंधन पेट्रोल से सस्ता हो गया है. बेगुसराय से संतोष ने दो लोगों से बात की है. एक सरकारी नौकरी करते हैं जो पहले बाइक से जाते थे अब साइकिल से दफ्तर जाने लगे हैं और एक डाक्टर हैं जो पहले कार से पटना जाते थे अब ट्रेन से जाने लगे हैं.

हाल ही में डेक्कर हेरल्ड अखबार में विवेक कॉल ने लिखा था कि अप्रैल 2015 से मार्च 2021 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से 13 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये कमाए हैं. ज़्यादतर कमाई हाल के वर्षों में हुई है. टैक्स की मार कभी इतनी नहीं पड़ी. यह ऐतिहासिक है. फिर भी इस मुद्दे को उचित स्थान नहीं मिल रहा है. सरकार पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर क्यों नहीं बात करना चाहती है? 


बंगलुरु के लोग दस रुपये का टमाटर अस्सी रुपये में खरीद रहे हैं. प्याज़ पचास से सत्तर रुपये किलो मिल रहा है. दिल्ली की ओखला मंडी में भिंडी 80 से 100 रुपया किलो है. गाजर 60 रुपये किलो है. बारिश कारण है लेकिन डीज़ल का महंगा होना बड़ा कारण है.हर तरह से जनता की जेब से पैसे निकल रहे हैं. उसकी बचत घटती जा रही है. बैंकों में जमा राशि पर निगेटिव रिटर्न है. कहा जा रहा है कि जनता डरी हुई है इसलिए चुप है. यह भी कहा जा रहा है कि जनता खुश हैं इसलिए चुप है. ऐसी जनता को सामने आकर कहना चाहिए कि वह 117 रुपये लीटर होने से खुश है और दाम और बढ़ाए जाएं.जब तक ऐसे लोग सामने नहीं आते, उनकी बात की जा सकती जो इस महंगाई से दम तोड़ रहे हैं. जिनकी कमाई कई साल पीछे चली गई है. 

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इतिहास में किसे उचित स्थान नहीं मिला इन सबकी एक राष्ट्रीय सूची बननी चाहिए और उचित स्थान की तलाश होनी चाहिए ताकि एक ही बार में सबको स्थान मिले और काम की बात शुरू हो सके. तब तक आप भी अपनी मूर्ति बनवा लें और घर में उचित स्थान न मिले तो बेडरूम में ही लगा दीजिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को बता सकें कि जब पेट्रोल 117 रुपया लीटर था तब हम मूर्ति बने हुए थे.