जिस पेशे को अपने पसीने से कमाल ख़ान ने सींचा वो अब उनसे वीरान हो गया...

कमाल खान एनडीटीवी से तीस साल से जुड़े थे, एक ऐसे काबिल हमसफर साथी को अलविदा कहना थोड़ा थोड़ा ख़ुद को भी अलविदा कहना है

हज़ार दुखों से गुज़र रही भारत की पत्रकारिता का दुख आज हज़ार गुना गहरा लग रहा है. जिस पेश को अपने पसीने से कमाल ख़ान ने सींचा वो अब उनसे वीरान हो गया है. कमाल ख़ान हमारे बीच नहीं हैं. हम देश और दुनिया भर से आ रही श्रद्धांजलियों को भरे मन से स्वीकार कर रहे हैं. आप सबकी संवेदनाएं बता रही हैं कि आपके जीवन में कमाल ख़ान किस तरीके से रचे बचे हुए थे. कमाल साहब की पत्नी रुचि और उनके बेटे अमान इस ग़म से कभी उबर तो नहीं पाएंगे लेकिन जब कभी आपके प्यार और आपकी संवेदनाओं की तरफ उनकी नज़र जाएगी, उन्हें आगे की ज़िंदगी का सफर तय करने का हौसला देगी. उन्हें ग़म से उबरने का सहारा मिलेगा कि कमाल ख़ान ने टीवी की पत्रकारिता को कितनी शिद्दत से सींचा था. एनडीटीवी से तीस साल से जुड़े थे. एक ऐसे काबिल हमसफर साथी को अलविदा कहना थोड़ा थोड़ा ख़ुद को भी अलविदा कहना है. 

उनकी तस्वीरों में एक हसीन शख्सियत का जादू है और ज़हीन तबीयत की रौनक. किसी को उम्र का अंदाज़ा नहीं हो सकता क्योंकि तमाम मसरूफ़ियत के बीच कमाल की फिटनेस कई बार कमाल की लगती थी. 13 जनवरी की रात बड़ा भयंकर दिल का दौरा आया और कमाल ख़ान को हमसे छीन ले गया. आपको कमाल की तस्वीरों में एक खास किस्म की सतर्कता और सावधानी दिख रही होगी. उनके स्वभाव में केवल नरमी नहीं थी, पुराने ज़माने की शख्सियतों का अक्खड़पन भी था. होना भी चाहिए, हर काम दो मिनट में और दो लाइन में निपटा देने वाली टीवी की पत्रकारिता हो चुकी है. उसके बीच कमाल ख़ान दो मिनट की बात कहने और लिखने के लिए दिन दिन भर लगा देते थे. ऐसे शख्स को हक़ है कि उसमें कुछ अक्खड़पन हो. ना कहने और टाल देने की अदा हो वर्ना टीवी की रफ्तार कब किस हुनरमंद को अपनी सुरंग में खींच लेती है और उसे ज़हीन से ज़हर में बदल देती है, मैं समझता हूं. अच्छी बात है कि कमाल उन चंद लोगों में शामिल थे जिन्हें साफ-साफ ना कहने और बहुत मुश्किल से हां कहने की आदत थी. उनकी इस अदा से आहत हो जाने वाले लोग भी आज रो रहे हैं कि कमाल सर नहीं है. यह बात वाकई हैरानी की है कि इतने लंबे समय तक कमाल ख़ान ने ख़ुद को कीचड़ में बदल चुकी टीवी पत्रकारिता में कैसे कमल की तरह बचाए रखा. अब यह सब पूछने के लिए कमाल नहीं हैं और न कमाल ख़ुद बताया करते थे. उनकी बताई गई तकलीफें बेहद रूटीन किस्म थीं. कि कई दिनों से काम कर रहा हूं. वक्त नहीं मिल रहा है कि फलां स्टोरी को ठीक से कर सकूं. काफी पढ़ना है वगैरह वगैरह. आप दर्शकों के साथ बहुत ज़ुल्म हुआ है कि एक इंसाफ़ पसंद पत्रकार बेईमान हो चुकी पत्रकारिता की दुनिया से चला गया है.

कमाल की शान में कुछ कमी रह जाए तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा. उनकी विदाई का यह स्क्रिप्ट कम से कम उतनी मेहनत से तो लिखा ही जाना चाहिए जिस मेहनत से कमाल अपनी दो मिनट की रिपोर्ट का स्क्रिप्ट लिखा करते थे. चालीस पचास पंक्तियों की रिपोर्ट लिखने से पहले कई सौ पन्नों की किताबें पढ़ जाया करते थे. कुछ कहने से पहले आधिकारिक रूप से जांच परख लिया करते थे. तब जाकर लिखा करते थे, बोला करते थे. इस पूरी प्रक्रिया में एक संवेदनशील पत्रकार को कितने अंधेरों से गुज़रना पड़ता है, इसका अंदाज़ा वही लगा सकते हैं जो टीवी की दुनिया में बचे हुए हैं और उसी अंधेरे से गुज़रते हुए काम कर रहे हैं. कमाल ख़ान की भाषा पत्रकारिता की पुरानी भाषा है जो हमेशा नई लगती है. पुरानी से मतलब बीत चुके ज़माने की नहीं है, पुरानी से मतलब सही भाषा से है जिसे अब टीवी ने सत्ता की गुलामी में छोड़ दिया. हैरानी की बात यह है कि कमाल की स्क्रिप्ट हमेशा रोमन में आती थी. जब न्यूज़ चैनल शुरुआत कर रहे थे तब साफ्टवेयर की कमी के कारण सबने रोमन में हिन्दी लिखना सीखा. कमाल को एक बार आदत लग जाए तो कमाल से छूटती नहीं थी. उर्दू और हिन्दी के इस महारथी के लिखे स्क्रिप्ट को जब अपने ईमेल के इनबाक्स में देख रहा था तो इस पर नज़र पड़ गई. फिर लगा कि कमाल साहब कभी बदले ही नहीं. हम सब जब एनडीटीवी में आए थे तो किसी भी स्क्रिप्ट में इस तरह से लिखने की हिदायत दी गई थी. सबने इस तरह से लिखना छोड़ दिया मगर कमाल अपनी पहली तालीम को आज तक नहीं भूले. जो पत्रकार क्रेडिट लाइन पहले लिखता है वो वाकई इस पेशे को बहुत चाहता होगा. कैमरामैन का नाम लिखा है और रिपोर्ट दिल्ली में एडिट होगी या लखनऊ में इसका भी ज़िक्र है.

हर  हिस्से में कमाल ख़ान ने निर्देश लिखा है कि घंटों के फुटेज में बाइट का हिस्सा कहां मिलेगा ताकि एडिटर का समय बच जाए. इसे हम काउंटर कहते हैं. कमाल खान ने इस हिस्से में (00:07)(00:19) लिखा है जिससे सटीक जानकारी मिलती है कि यह बाइट मात्र 11 सेकेंड की है. ये कमाल ख़ान थे. मतलब अनुशासन के पक्के शख्स थे हमारे कमाल. आपके भी कमाल. जैसे इस स्क्रिप्ट के पहले VO I लिखा है. मतलब वायस ओवर वन. यह कमाल की आखिरी स्क्रिप्ट है और अंत अंत तक उन्होंने टीवी की पहली ट्रेनिंग नहीं भूली. और बात कहने का फ़न देखिए कम से कम शब्दों में सारी बात. जैसे  - V/O: (1)Yogi sarkar ke Ayush mantri Dharm Singh Saini bhi aj BJP chhor Samajwadi party mein shamil ho gaye. Dharam Singh Saini pichhdi jaati se aate hain.धर्म सिंह सैनी पिछड़ी जाति से हैं. इसके बाद कुछ नहीं लिखा. यह काफी था बता देना कि उनके जाने का महत्व क्या है और कैसे देखा जाना चाहिए.  हम चाहते हैं कि आप कमाल की आखिरी रिपोर्ट को पूरा देखें. 

जब भी उनसे किसी रिपोर्ट के लिए बात होती थी तो पूछा करते थे कि समय कितना है. उन्हें लंबी रिपोर्ट में भी मज़ा आता था और वे छोटी रिपोर्ट के माहिर तो थे ही. कमाल ख़ान को हमारे दर्शक बहुत याद कर रहे हैं. दरअसल टीवी की दुनिया के तमाम दर्शकों के पास कमाल ख़ान की अपनी यादें हैं. भले वो हमारे चैनल के दर्शक न हों. एक दर्शक ने हमें लिखा है कि 

शुभ प्रभात महोदय,
जबसे सुना है, रो रहा हूँ. यकीन नहीं कर पा रहा की एक इतने अच्छे इंसान हमारे बीच से अचानक चले गए. शायद खुदा को उनसे ज़्यादा ही मोहब्बत हो गई, हमसे भी ज़्यादा. कल उनका कार्यक्रम देखा था प्राइम टाइम में, कितनी सहजता से उन्होंने misogony पर, पितरात्मक सोच पर अपने विचार रखे थे और समझाया था. हमेशा उन्हे एक ही सहज भाव में देखा, कभी विचलित होते, गुस्सा होते नहीं देखा. परमेश्वर ने उन्हे हमसे अपने पास बुला लिया, परमेश्वर उनके परिवार को, चाहने वालों को हिम्मत और हौसला दे.
उन्हे सादर नमन 

13 जनवरी को मैं नहीं था.नग़मा सहर के साथ कमाल ख़ान प्राइम टाइम में थे.कमाल ख़ान को याद करते वक्त उनके काम करने की प्रक्रिया के बिना आप याद ही नहीं कर सकते. कितना और कब कहना है इसके लिए वे घंटों मेहनत करते थे. एक और बात कहना चाहता हूं. कमाल की इन तमाम मेहनत से टीवी की पत्रकारिता ने कुछ नहीं सीखा ये और बात है कि कमाल जैसे लोगों से खराब और बर्बाद हो चुकी पत्रकारिता जीवन भर दर्शकों के बीच अपना भरोसा कमाती रही. जहां है, जो है, जैसा है के आधार पर लिखा करते थे. पर थे तो शायर तबीयत के तो अपनी पीटूसी में कमाल कुछ और भी हो जाया करते थे. पत्रकार भी और पत्रकार से ज़्यादा भी.

यह सोचना पूरी तरह से ग़लत होगा कि शायरी और दोहे के इस्तेमाल से कमाल ने दर्शकों में पैठ बनाई. कई लोग ऐसा कहते हैं लेकिन मेरा मानना है कि यह कमाल के काम को ठीक से समझने का तरीका नहीं है. कमाल जानते थे कि उनके दर्शकों के जीवन में बहुत से दोहे हैं शायरी हैं कविता हैं और भजन हैं. इसके लिए भी वे काफी पढ़ते थे. बहुत सावधानी से चुनाव करते थे कि उनका पीस टू कैमरा यानी रिपोर्ट के अंत में जब रिपोर्ट अपनी बात कहता है, उसे कभी वे ताली बजाने का माध्यम नहीं बनाते थे बल्कि शायरी और दोहे के इस्तेमाल से अपनी रिपोर्ट को व्यापक बनाते थे. उसमें जान डालते थे ताकि देखने वाला एक पत्रकार की मेहनत का मर्म समझ पाए.  कमाल ने हमेशा इनका इस्तेमाल धर्म के नशे में चूर होकर हैवान हो चुकी यूपी की सियासत को निकल आने का रास्ता भी दिखाते थे. बताते थे कि आप तो ऐसे न थे. 

कमाल ख़ान बहुत पढ़ते थे. अपने शहर लखनऊ पर उन्हें बहुत नाज़ था जिस शहर की बदली सियासी फिज़ा ने कमाल खान जैसे नाम वाले पत्रकारों को अकेला कर दिया था. नफरत की सियासत से लैस वही नेता और हुक्मरान उनसे दूरी बनाने लगे थे जो कभी कमाल ख़ान की हर बात पर दाद दिया करते थे. लखनऊ की भाषा बिगड़ने लगी थी. ठोंक देने से लेकर सीधे लोक में भेज देने की भाषा पर लखनऊ दुनिया की किस बिरादरी में सर उठाएगा, ये लखनऊ जानता है लेकिन कमाल ख़ान को पता था कि जिस लखनऊ को वे देख रहे हैं वो उन्हें शर्मसार कर रहा है.

एनडीटीवी का न्यूज़ रुम आज अदब से वीरान हो गया. कमाल ख़ान अब नहीं हैं. टीवी की दुनिया बदल गई है. अब कोई दूसरा कमाल ख़ान नहीं आएगा.उसके दो कारण है. अब इस मुर्दा समाज में वो ताकत नहीं बची है कि उसके घरों से कोई ऐसा पत्रकार निकले और दूसरा एनडीटीवी जैसा चैनल भी नहीं जहां किसी को तीस साल तक अपनी ज़िद औऱ हुनर पर चलते हुए कमाल खान बनने का मौक़ा मिले. इतने बड़े देश में इस ख़ालीपन की बात करना कमाल को भी शर्मसार करता और उनके सहयोगियों और साथियों को भी.

यह कोई बड़ी बात नहीं है और न ही कमाल ख़ान को इससे फर्क पड़ता था योगी आदित्यनाथ भी कमाल ख़ान को मिस कर रहे होंगे. जिन्होंने कभी कमाल ख़ान को इंटरव्यू नहीं दिया. यह बात उनकी श्रद्धांजलि के साथ भी दर्ज की जानी चाहिए कि उस शहर का एक वरिष्ठ पत्रकार को सत्ता ने अपनी परिधि से दूर रखा लेकिन जनता ने उसे सीने से लगाए रखा.

नियति ने कमाल ख़ान को अपनी बात कहने का वक्त नहीं दिया. पर उनकी बातों में यह बातें दबी दबी चली आती थीं कि कमाल ख़ान एक पत्रकार को लोग कमाल ख़ान एक मुसलमान के रूप में देख रहे हैं. आज के इस हिंसक दौर में कई मुस्लिम पत्रकारों की यह दुविधा और पीड़ा है. कमाल ने खुद को कई बार संभाला और अपनी बात कहने के लिए कलम की निब सीधी रखी. वे जानते थे कि यूपी की राजनीति धर्म की आड़ में क्या-क्या गुनाह कर रही है फिर भी वे धर्म की बातें रखते वक्त बेहद सावधानी से अपनी बात कहा करते थे ताकि लोगों को आईने में चेहरा दिखता रहे.

कमाल ख़ान ने अयोध्या से अनगिनत रिपोर्ट की है. वे अयोध्या को कवर करते करते अयोध्या में रच बस गए थे. लखनऊ की तरह अयोध्या शहर भी याद करेगा कि किस कमाल से कमाल ने उसकी बात दुनिया के सामने रखी. गर्व के नाम पर नफरत के नारों से घिरी अयोध्या को कमाल ख़ान किस खूबसूरती से बचा लेते थे, जैसे कोई माली किसी टूटी हुई पंखुड़ी को उठाकर हथेली में रख लेता है. 

हमारे दर्शक आज सदमे में हैं. उनके संदेश लगातार मिल रहे हैं. सबका जवाब मुश्किल है मगर पता चल रहा है कि आज आप कितने उदास हैं. कमाल के बिना आपको दर्शक होना अधूरा अधूरा सा लग रहा है.आप भी याद करेंगे कि कोई कमाल ख़ान था जिसने इस मुल्क की मिट्टी और हवाओं से इतना प्यार किया. और उस प्यार को बहुत हिफाज़त से अपने लिखने और बोलने में धरा करता था.

आप दर्शकों ने कमाल के लिए कितना प्यार भेजा है. एक दर्शक ने लिखा है कि मुझे अच्छे से याद है एक बार जब लखनऊ में नई सरकार के शपथ हो रहा था तब कमाल खान ने कैमरे के सामने एक शेर कहा था: "तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्त-नशीं था, उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था". कमाल का पढ़ा हबीब जालिब का यह शेर आज भी आने वाले कल का भविष्य बताता है.

मैं हमेशा उनकी रिपोर्ट देखने को लालायित रहता था,ओर किसी दिन उनकी रिपोर्ट नही आती थी, तो लगता था, आज समाचार पूरे नही हुए.
कमाल का पत्रकार, 
बाकमाल अंदाज,
कमाल ही कर गया,
चला गया, वो
कमाल करके.

अच्छे और सच्चे लोग जो भारत को जोड़े रखना चाहते है , कम होते चले हैं.... कैसे होगा.... कुछ समझ नहीं रहा, Allah उन्हें बेहतरीन मुकाम अता करे और उनके घर के सब ही लोगो को सबर और इस नुकसान से उभरने की ताकत दे.... Aameen

एक कमाल की आवाज़ अचानक खामोश हो गईं.... अल्लाह कमाल भाई की मग़फ़िरत करे और उन्हें  जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता करे...... आमीन

बहुत अफसोस की बात हमारे बीच कमाल खान नहीं रहे जो एक वरिष्ठ पत्रकार थे मैं अल्लाह से दुआ करता हूं आला से आला मुकाम जन्नतुल फिरदोस में जगह आता फरमाए और सच्चे पत्रकार को  इज्जत अता फरमाए.

बार बार क्यों ऐसा लग रहा है कि कमाल ख़ान के बारे में कुछ बातें छूट गईं या हमने ठीक से नहीं कही. दरअसल उनका काम इतना विशाल और गहरा है कि आज के दिन बहुत सी बातें छूटने ही वाली हैं. उनकी बात याद आती है कि कैसे किसी स्टोरी को करने से साफ मना कर देते थे. दरअसल मना करना ही एक अच्छे रिपोर्टर की पहली निशानी है. उसे पता होना चाहिए कि कब ना कहना है. यह उसके काम के प्रति वफादारी है. वफादारी काम के प्रति होनी चाहिए किसी हुज़ूर के प्रति नहीं. उनके मना करने के कारण हमेशा पत्रकारिता के उसूलों के हिसाब से होते थे. 


कमाल की यह विदाई हम सब पर भारी पड़ रही है. परिवार के सदस्यों की तकलीफें तो इस वक्त यहां दर्ज नही है. अपने बेटे और अपनी पत्नी रुचि को बेहद प्यार करने वाले और उनके बारे में बात करते वक्त इस नफ़ासत से उनका नाम लेते थे कि लगता था कि बात करने की शालीनता यही है. इतना तो कहना बनता ही है कि बंदा बेहद खुद्दार था. उसकी पत्रकारिता का मेयार बहुत ऊंचा था. उसकी शोहरत आसमान तक पहुंचती थी मगर उसकी शख्सियत हमेशा मिट्टी के करीब रही. 

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कई सारे राजनेताओं ने कमाल के निधन पर श्रद्धांजलि अपर्ति की है. हम उन सभी के शुक्रगुज़ार हैं कि उन्होंने आज कमाल को याद करते वक्त पत्रकारिता के कुछ उसूलों को महसूस किया होगा जिसे उनकी ही बिरादरी के लोग सरेआम रौंद रहे हैं. आप दर्शकों की तरफ से भेजे गए हम तमाम संदेशों का एहतराम करते हैं. स्वीकार करते हैं कि आपके बीच उन उसूलों की समझ है जिसे कभी बारीक तरीके से तो कभी बेदर्द तरीके से रौंदा जा रहा है. पाकिस्तान के पत्रकार भी दुखी हैं. कमाल के काम की हवा उन्हें भी तालीम दिया करती थी कि सनक से भरे हुक्मरानों के सामने कैसे अपनी बात कहनी है और कैसे जनता की आवाज़ बनना है.