सूत्रों के अनुसार राजनीतिक पत्रकारिता का अंत हो चुका है

सूत्रों के हवाले से आने वाली ख़बरों और पत्रकारिता के संकट को समझना ज़रूरी हो जाता है ताकि पता रहे कि ख़बरों के लिए जिन ज़रूरी तत्वों पर आप भरोसा करते हैं वह भरोसे के लायक है भी या नहीं

ख़बरों की दुनिया में सूत्रों को लेकर भूचाल आया हुआ है या तो सूत्र बदल गए हैं या फिर पत्रकार पत्रकार नहीं रहे. सवाल है कि ग़लत जानकारी देने वाले पत्रकार ग़लत जानकारी देने वाले सूत्रों के साथ क्या करते हैं. क्या ग़लत जानकारी देने के बाद भी उन सूत्रों के संपर्क में रहते हैं या नए सूत्र बना लेते हैं जो नए सिरे से ग़लत जानकारी दे सके. एक पाठक और दर्शक के लिए सूत्रों के हवाले से आने वाली ख़बरों और पत्रकारिता के संकट को समझना ज़रूरी हो जाता है ताकि पता रहे कि ख़बरों के लिए जिन ज़रूरी तत्वों पर आप भरोसा करते हैं वह भरोसे के लायक है भी या नहीं.

सूत्रों के हवाले से हर बार मुख्यमंत्री बनने और हर बार नहीं बनने का रिकार्ड गुजरात के नितिन पटेल के नाम हो सकता है. उसी तरह सूत्रों के हवाले से हर बार उप मुख्यमंत्री बनने और हर बार नहीं बनने का रिकार्ड गुजरात से ही यूपी गए एके शर्मा के नाम हो सकता है. नितिन पटेल 2014 के बाद से ही सूत्रों के हवाले से मुख्यमंत्री बन रहे हैं. इस बार भी मुख्यमंत्री पद के लिए नाम चला लेकिन सूत्रो ने यह नहीं बताया कि नितिन पटेल मंत्रिमंडल से ही बाहर होने वाले हैं. उसी तरह एके शर्मा को भी पत्रकारों ने सूत्रों के हवाले से कई बार यूपी का नया उप मुख्यमंत्री बनवाया है. एके शर्मा कभी मंत्रिमंडल का हिस्सा ही नहीं बन पाए और इन दिनों प्रदेश बीजेपी के 17 उपाध्यक्षों में से एक हैं. एके शर्मा 1995 से 1997 के बीच मेहसाणा के ज़िलाधिकारी रहे हैं, नितिन पटेल उसी मेहसाणां के कड़ी क्षेत्र से विधायक थे, जब 1995 में पहली बार कैबिनेट मंत्री बने थे. मेरी राय में दोनों चाय पे चर्चा करें और इन सूत्रों का पता लगाएं. मूड हो तो कुछ हमें भी बताएं. 

बीजेपी कवर करने वाले कई पत्रकारों की पहचान बीजेपी और उसके नेता के बचाव और गुणगान की हो चुकी है. इससे भ्रम होता है कि सत्ता के भीतर उनकी काफी पैठ है और ख़बरों पर नज़र लेकिन इस मामले में उन्हें भनक तक नहीं लगी कि गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्य में क्या हो रहा है. एक पत्रकारों के नाम अपवाद के तौर पर यहां लाना ठीक नहीं रहेगा क्योंकि हमारा फोकस पत्रकारिता के तंत्र के भीतर आए विध्वंस पर है. माना जाता है कि पार्टी जब विपक्ष में होती है तब पत्रकारों की पहुंच ज़्यादा सुलभ होती है. कांग्रेस के अलावा दूसरे विपक्षकों दलों में भी पत्रकारों को अब कुछ भनक तक नहीं लगता और न उन्हें कवर करने वाले पत्रकार ऐसी खबर लिखते हैं जिससे पार्टी के भीतर की कुछ जानकारी मिले. जिस तरह से बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार ख़ाली हाथ बैठे रहे वही हाल पंजाब में कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकारों का हुआ. लगता है पत्रकारिता को भी अब इसी तरह के पत्रकार चाहिए जिनकी ख़बर या तो ग़लत हो या वे ग़लत खबरों को आत्मविश्वास के साथ पेश कर सकें. 

पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी का नाम तो किसी सूत्र ने नहीं लिया लेकिन सूत्रों ने जिनका नाम लिया वे मुख्यमंत्री नहीं बने. किसी एक चैनल का नाम लेना ठीक नहीं क्योंकि ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों और वेबसाइट में चन्नी से पहले सुखजिंदर रंधावा का नाम सूत्रों के हवाले से छप गया. 

फिर सूत्रों का मन बदला और अंबिका सोनी का नाम चलवा दिया. तभी सूत्रों को लगा होगा कि सुनील जाखड़ का नाम चलवाते हैं तो सुनील जाखड़ का चलवा दिया. बीच बीच में सूत्रों को ब्रेक लेना होता था तो नवजोत सिंह सिद्धू का ही नाम चलने लगता था. अब कोई सूत्र था भी या नहीं यह एक खुला प्रश्न है, मुमकिन है कि सूत्र न हो और यह भी हो सकता है कि पत्रकार ही आपस में एक दूसरे के सूत्र बन गए हों. भूपेंद्र पटेल और चरणजीत सिंह चन्नी का मुख्यमंत्री बनना बता रहा है कि राजनीतिक पत्रकारों की ज़रूरत समाप्त हो चुकी है.

सूत्र पत्रकारिता की जान हैं. इसकी रक्षा करना एक पत्रकार का धर्म माना जाता है लेकिन यहां सूत्र के नाम पर ही पत्रकार पत्रकारिता की हत्या करने लगे हैं. सूत्रों के नाम पर आए दिन प्लांट होता रहता है. फिलहाल यहां जो संकट दिख रहा है वह कुछ पत्रकार और सूत्रों के अनुसार छपी ख़बर के ग़लत निकल जाने का संकट नहीं है. यह बता रहा है कि पत्रकारिता के भीतर संपर्क बनाने और ख़बरों को सूंघ लेने और खोज लेने की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. इस पूरी प्रक्रिया में चैनलों और अखबारों ने निवेश करना बंद कर दिया है. पत्रकार चाटुकारिता के मामले में सत्ता का करीबी लग सकता है लेकिन ख़बरों के मामले में वह भी उतना ही दूर और लाचार है. अगर सिर्फ यही पूछ लिया जाए कि आज आपकी ख़बर क्या है तो बहुत से जवाब नहीं दे पाएंगे. दूसरा सत्ता और पार्टी के भीतर पत्रकारों के लिए दरवाज़ें बंद किए जाने लगे हैं. सत्ता से उसका संबंध ट्विटर के ज़रिए ही रह गया लगता है.

31 साल के धवल पटेल ने पिछले साल मई में जब सूत्रों के हवाले से खबर लिखी कि विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है तब पुलिस ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा कर दिया. उनकी खबर को वेबसाइट से हटा लिया गया और धवल पटेल गिरफ्तार कर लिए गए. बाद में धवल पटेल ने भारत ही छोड़ दिया. यह प्रसंग बताता है कि सूत्रों के हवाले से सही खबर करने पर जेल हो सकती है, ग़लत ख़बर करने से कुछ नहीं होता है. क्या राजनीतिक पत्रकारिता का अंत हो चुका है? नेता ही ख़ुद से राजनीतिक पत्रकारिता कर रहे हैं? 

राजनीतिक पत्रकारों की ज़रूरत तो रहेगी भले ही उनकी वरिष्ठता के अनुसार अब वैसी ख़बरें नहीं मिला करेंगी. ट्विटर पर आनिंद्यो चक्रवर्ती ने राजनीतिक पत्रिकारिता के संकट को संक्षेप में रखने का प्रयास किया है. 

न्यूज़, राष्ट्र-राज्य और सत्ता के सिस्टम का रोज़नामचा है. किसी भी न्यूज़ संगठन के तीन प्रमुख बीट होते हैं जिससे पता चलता है कि राज्य नाम की संस्था के भीतर क्या चल रहा है. राजनीति और सरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और बिज़नेस. इन तीनों बीट से आने वाली खबरें आम तौर पर अखबारों के पहले पन्ने पर होती है और न्यूज़ चैनलों में हेडलाइन की जगह पाती हैं. बाकी सारे मुद्दों को पीछे हटना पड़ता है. एक तरह से यह फार्मूला बन गया है कि न्यूज़ रूम में किस खबर को पहले नंबर या पहले पेज पर रखा जाएगा. इन तीनों बीट को कवर करने वाले रिपोर्टर की हर मामले में सबसे तेज़ तरक्की होती है और वही राजनीतिक संपादक और न्यूज़ ऐंकर बनते हैं. संपादक बनकर भी वे इसी प्रक्रिया को बनाए रखते हैं. पाठकों और दर्शकों की भी ट्रेनिंग इसी तरह से खबरों को पढ़ने और देखने की हो जाती है. उन्हें लगता है कि सत्ता, अर्थव्यवस्था और रक्षा की खबर ही असली ख़बर है. इस तरह की बीट के रिपोर्टर और संपादक सत्ता से अपने संबंध बनाए रखने के लिए मजबूर हो जाते हैं और जो कहा जाता है वही छापते हैं. ज्यादातर राजनीतिक ख़बरें किसी सोर्स की दी हुई होती है. इसलिए जो बड़ी खबर होती है वो कुछ और नहीं, प्लांट होती है. गुजरात और पंजाब में राजनीतिक पत्रकार इसलिए ग़लत साबित हुए क्योंकि पार्टी के भीतर सोर्स बनाने की प्रक्रिया ध्वस्त हो चुकी है. ( मोदी शाह सिस्टम ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. पत्रकार वही आगे बढ़ाते हैं जो उन्हें थमा दिया जाता है. हैंड आउट के अलावा सत्ता के गलियारे में उनकी पहुंच के रास्ते बंद कर दिए गए हैं. गांधी परिवार ने भी गोदी टाइप और लिबरल टाइप पत्रकारों से अपना संपंर्क काट लिया है. इसलिए बीजेपी और कांग्रेस में अब कोई नहीं है जो उच्च पदस्थ सूत्र कहला सके या करीबी सूत्र कहला सके. इसलिए दोनों बीट के पत्रकार बेख़बर पकड़े गए.)

आप किसी भी पांच छह राजनीतिक पत्रकार, राजनीतिक संपादक के ट्वीटर को फोलो कर लें. देखिए कि वे क्या लिख रहे हैं. आपको समझ आ जाएगा कि ये इतना काम कर रहे हैं तो बीजेपी के असली लोग क्या करेंगे फिर. राजनीतिक दल के भीतर संपर्क होने का झांसा बचा हुआ है इसलिए वे न्यूज़ रूम में बचे हुए हैं. ठीक उसी तरह से जैसे आप न्यूज़ ऐंकरों के मामले में देख रहे हैं. आज कल यह भी सुनने को मिलता है कि पार्टी लाइन से अलग लिख देने पर पार्टी के पत्रकारों के व्हाट्स एप ग्रुप से बाहर कर दिया जाता है. फिर मंत्रालयों के व्हाट्स एप ग्रुप से बाहर कर दिया जाता है. ऐसा हमेशा ही रहा है लेकिन इस स्केल पर कभी नहीं रहा. राजनीतिक दलों की प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के छक कर सवाल पूछने का सिलसिला भले खत्म हो गया है लेकिन कभी था ज़रूर. अब तो उसे मुख्यालय में आने से ही रोक दिया जाएगा.  

सत्ता के गलियारे में सूत्रों की दुनिया जटिल हो गई है. अधिकारी डर के मारे ऑफ रिकार्ड बात करने से डरने लगे हैं. दूसरी तरफ आतंक और अपराध से जुड़ी खबरों को देखेंगे तब पता चलेगा कि अभी भी सूत्र सक्रिय हैं और अधिकारी सूत्र बन कर जो मन में आ रहा है, बात कर रहे हैं, प्लांट कर रहे हैं. हर दिन इन सूत्रों के हवाले से आपके जीवन में कितना ज़हर बोया गया है. 

आतंक के नाम पर आप आज भी होने वाली रिपोर्टिंग को ध्यान से पढ़िए. आज भी सूत्रों के हवाले से न जाने कितने बेगुनाह पकड़े जाते हैं और मीडिया के ज़रिए जनता के बीच आतंकवादी साबित कर दिए जाते हैं. पुलिस के सूत्रों के हवाले से न जाने कितनी बार बकवास और मनगढ़ंत ख़बरें छपी हैं और लोगों का जीवन बर्बाद किया गया है. बल्कि सूत्रों का यह सिस्टम पुलिस को छूट देता है कि वह किसी के बारे में दोष साबित होने से पहले कुछ भी जनता के बीच स्थापित कर दे. यह किताब पुलिस की कारस्तानियों के दस्तावेज़ हैं जिनमें उन युवाओं की कहानी दर्ज है जिन्हें पुलिस ने कहीं से उठाया और मीडिया के ज़रिए आतंकवादी साबित कर दिया. लोगों के बीच बनी धारणा की आड़ में बीस बीस साल तक युवाओं को जेल में रखा गया और बाद में वे सबूतों के अभाव में बरी हो गए लेकिन जब इन्हें पुलिस पकड़ती है तब आप गौर कीजिए कि किस तरह से सूत्रों के हवाले से इन्हें हर तरह से आतंकवादी बता दिया जाता है और पत्रकार पुलिस के नाम पर पुलिस का हर बकवास छापते हैं और आप पढ़ते हैं. सूत्रों ने जितना पत्रकारिता को समृद्ध नहीं किया उससे कहीं ज्यादा इसने पत्रकारिता को स्टेट के हाथ में छोटा चाकू बना दिया जिसके ज़रिए अनेक मासूम लोगों की गर्दन रेंत दी गई. स्पीकिंग टाइगर से छपी किताब  Framed as a Terrorist: My 14-Year Struggle to Prove My Innocence के लेखक आमिर खान 18 साल की उम्र में आतंक के मामले में गिरफ्तार हो गए और 14 साल जेल में रहे. 2018 में मानवाधिकार आयोग ने आमिर को दिल्ली पुलिस से पांच लाख का मुआवज़ा भी दिलवाया लेकिन आमिर की ज़िंदगी सूत्रों के हवाले से छपी खबरों के कारण तबाह हो गई. 

सूत्रों ने राजनीतिक पत्रकारिता को लापरवाह होने की छूट दी तो अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर होने वाली पत्रकारिता के हाथ में एक हथियार भी दे दिया जिसके सहारे कितने ही नौजवान आतंकवादी बना दिए गए या जिनके एकाउंटर को देश की रक्षा के लिए ज़रूर मान लिया गया. विश्वस्त सूत्र, आधिकारिक सूत्र, उच्च पदस्थ सूत्र, करीबी सूत्र, मेरे सूत्र आपके सूत्र, ये सब बहुत ज़रूरी होते हैं लेकिन इनके नाम पर जो ग़ैर ज़रूरी काम होता है उसे रोकने के लिए पत्रकारिता के भीतर जो सिस्टम होना चाहिए, वो अब नहीं है. ज़रूर कई बार ऐसी स्थिति आती है जब एक पत्रकार के लिए अपने सूत्र की गोपनीयता की रक्षा करना उसका धर्म बन जाता है. इस नैतिकता के बिना पत्रकारिता की कल्पना भी नहीं की जा सकती. 

फरवरी 2019 में हिन्दू अखबार में रफाल विमान के सौदे से जुड़ी कई ख़बरें छप रही थीं. तब इस कवरेज से परेशान केंद्र सरकार ने कहा था कि अखबार ने मंत्रालय से फाइलें चोरी की हैं और ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट का उल्लंघन किया है. इसके जवाब में हिन्दू अखबार के एनराम ने कहा था कि आप भले ही इसे चोरी किए गए दस्तावेज़ कहें, हमें परवाह नहीं है. हमें अपने विश्वस्त सूत्रों से ये दस्तावेज़ मिले हैं और हम अपने सोर्स की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है. कोई हमसे इन सूत्रों के बारे में जानकारी हासिल नहीं कर सकता है. हिन्दू अखबार ने ये जो दस्तावेज़ हासिल किए हैं और छापे हैं वो संविधान के अनुच्छेद 19 की भावना के अनुसार ही हैं जो हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है. केंद्र सरकार रफाल की जांच की याचिका विरोध इस आधार पर कर रही थी कि ये चोरी के दस्तावेज़ हैं तब अदालत ने कहा था कि आफिशियल सीक्रेट एक्ट में ऐसा कुछ नहीं है कि सीक्रेट की निशानी वाले दस्तावेज़ों को हासिल करना और छापने की मनाही है. इन्हें अदालत के सामने भी पेश किया जा सकता है. 

सरकार इन्हीं सूत्रों के नाम से आए दिन मनमानी ख़बरें छपवाती हैं लेकिन जब कोई पत्रकार सूत्रों के हवाले से सही ख़बर छाप देता है तो सरकार उस पत्रकार और सूत्र के पीछे पड़ जाती है. इसलिए सूत्रों के खिलाफ एकदम से राय बनाना आसान नहीं है. दिक्कत यह है कि एक खिड़की खुली रखने के नाम पर झूठ का पूरा दरवाज़ा खुल जाता है. 

इराक युद्ध के समय टोनी ब्लेयर ने अपने देश से झूठ बोला था और जब चिल्कओट कमेटी की रिपोर्ट आई तो इस झूठ के लिए माफी मांगी थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि किस तरह से सूत्रों के हवाले के नाम पर इराक के खिलाफ रसायनिक हथियार होने का झूठा प्रोपेगैंडा रचा गया औऱ एक देश पर हमला कर उसके लाखों लोगों को मार दिया गया. अमरीकी पत्रकार नॉर्मन पर्लस्टिन की इस किताब का नाम है ‘Off the record: the press, the government and the war against anonymous sources' इस पत्रकार ने विश्वस्त सूत्रों के साथ रिपोर्टर की बातचीत का डिटेल कोर्ट को सौंप दिया था. इन पर आरोप लगा था कि ऐसा कर नॉर्मन ने प्रेस को धोखा दिया है. बाद में नॉर्मन ने किताब लिख कर ह दलील दी कि बहुत ज़रूरी है कि सूचनाओं को लेकर सरकार की जवाबदेही तय हो और उनकी भी जो इन सूचनाओं को जनता के बीच लाते हैं. विश्वस्त सूत्रों का इस्तमाल प्रेस की आज़ादी के खिलाफ होता है. इसलिए ऐसा सिस्टम बने कि पत्रकार भी सूत्रों का नाम लें और सरकार सूचनाओं को आधिकारिक तौर पर रखने के लिए मजबूर हो. 

2021 के साल में इस किताब का ज़िक्र एन राम ने ही किया था. तब एन राम ने कहा था कि किसी संवेदनशील रिपोर्ट के लिए अपने सोर्स को गुप्त रखने की गारंटी देना हमेशा ही पेशेवर पत्रकारिता का हिस्सा रहेगा लेकिन 
अज्ञात सूत्रों के द्वारा ज़्यादातर बातचीत कांफिडेंशियल नहीं होती है. बल्कि विश्वस्त सूत्र का दर्जा उस सूत्र के लिए ही होना चाहिए जो लोक हित में बेहद ज़रूरी सूचनाएं साझा करता है और जो ऐसा करते हुए अपनी नौकरी, अपना जीवन और अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देता है. 

भारतीय पत्रकारिता की बड़ी समस्या यह है कि अधिकारी, कारपोरेट और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों को लाइसेंस देता है कि वे अज्ञात सूत्र के पर्दे के पीछे छिपे रहें और खबरों की जगह का मनमाना इस्तमाल करते रहें.
 ये वो सूत्र होते हैं जो सत्ता के करीब होते हैं लेकिन इनकी कोई जवाबदेही नहीं होती है. वे किसी का एजेंडा चला रहे होते हैं. 

नाम न ज़ाहिर करने की मांग पर रिपोर्टर की तरफ से शायद ही कभी सवाल होता है और यह डील आसानी से हो जाती है कि सूत्र कहकर खबर चला देंगे. न्यूज़रूम में भी इसे ठीक से जांचा परखा नहीं जाता है.

एंकर खुलकर प्रोपेगैंडा कर रहे हैं. तब रिपोर्टर के लिए न करने का स्पेस नहीं बचता है. राजनीतिक पत्रकार भी न्यूज़ ऐंकर होता है और न्यूज़ ऐंकर भी राजनीतिक पत्रकार. एक ही चैनल में एक पार्टी के कई सिपाही हो गए हैं. राजनीतिक पत्रकारिता का संकट ही पूरी पत्रकारिता का संकट है क्योंकि दो तिहाई से अधिक की पत्रकारिता राजनीतिक ही है. नेताओं को अब राजनीतिक पत्रकार की ज़रूरत नहीं है. उनके नेता खुद ही ट्वीट कर देते हैं. 

मई 2019 में जब बिज़नेस स्टैडर्ड के सोमेश झा ने रिपोर्ट छाप दी कि 45 साल में सबसे अधिक बेरोज़गारी के आंकड़े आए हैं. मंत्रालय से NSSO की उस रिपोर्ट को ड्राफ्ट रिपोर्ट कहा था और कुछ समय बाद जुलाई 2019 में वित्त मंत्रालयन ने एक सर्कुलर निकाल दिया कि अधिकारियों से बिना पूर्व अनुमति के पत्रकार मंत्रालय के भीतर नहीं आ सकते हैं. बकायदा आदेश निकला था. पत्रकारों ने जब हंगामा किया तब वित्त मंत्री के दफ्तर ने कहा कि मीडिया के प्रवेश को लेकर सुविधाएं बेहतर की जा रही हैं. एडिटर्स गिल्ड ने भी पत्रकारों के रोक पर हैरानी जताई थी. 


सवाल पूछने की कीमत बड़ी हो गई है. संपादक निकाल दिए जा रहे हैं. ऐंकर निकाल दिए जाते हैं. विज्ञापन रोक दिया जाता है. हाल ही में एक चैनल के ऐंकर ने दावा किया कि काबुल में एक होटल है उसकी पांचवी मंज़िल पर पाकिस्तानी सेना के अफसर तैनात हैं. एंकर ने खूबसूरत अंग्रेज़ी में झूठा दावा कर दिया कि उसे यह जानकारी सूत्रों से मिल रही है. बाद में पता चला कि उस होटल में कोई पांचवी मंज़िल नहीं है. सूत्रों ने प्रोपेगैंडा के नए नए द्वार खोल दिए हैं. दर्शक करें तो क्या करे. 

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आप सीधे नहीं कह सकते कि सूत्रों के हवाले से रिपोर्टिंग बंद कर दी जाए लेकिन ऐसी खबर आपने आखिरी बार कब देखी है. जिसमें पत्रकार मंत्रालय के भीतर से दस्तावेज़ों को लेकर आया हो और सरकार के दावों की पोल खोल रहा हो. बहुत कम ऐसी खबरें आती हैं. अख़बार की अपनी खबर भी नहीं होती है. सूत्रों के नाम पर घंटों विश्लेषण चलता है और आपका वक्त बर्बाद किया जाता है. इन खबरों की जगह जनहित से जुड़े कई गंभीर मुद्दे नहीं दिखाए जाते हैं. भारतीय पत्रकारिता को पत्रकारिता की नैतिकता और नियमों को फिर से हासिल करने में दशकों लग जाएंगे, अव्वल तो ऐसी कोशिश भी नहीं दिखती है.