जब इर्द-गिर्द सकारात्मक माहौल न हो, तो चैंपियन घेरा खींचकर उसमें ऊर्जा भर देते हैं. और टी20 वर्ल्ड कप के कारनामों और खबरों की भीड़ के बीच राष्ट्रीय क्रिकेट गलियारे में एकदम से दिग्गजों की जुबां पर चढ़ गए नई स्विंग सनसनी आकिब नबी, घरेलू क्रिकेट के शेरों में से एक पारस डोगरा, शुभम पुंडीर, आईपीएल में सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेलने वाले अब्दुल समद, 24 साल के विकेटकीपर कन्हैया वाधवान, लेफ्टी पेसर सुनील राम कुमार सहित पूरी टीम और पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर अजय शर्मा की अगुवाई में कोचिंग स्टॉफ ने पिछले कुछ महीनों में देश के सबसे बड़े प्रीमियम टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी में ऐसा ही घेरा खींचकर सिर्फ राज्य की क्रिकेट का ही नहीं, बल्कि कई पहलुओं से जम्मू-कश्मीर के कायाकल्प करने का बड़ा संदेश बहुत ही मजबूती के साथ दिया है. टी20 वर्ल्ड कप की चर्चाओं और शोर के बीच साल 1959-60 में टूर्नामेंट में पदार्पण के बाद से 65 साल में कई बार के चैंपियन और सितारा खिलाड़ियों से सजे कर्नाटक को हराकर पहली बार कई रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनने वाले जम्मू-कश्मीर के कारनामे से सिर्फ क्रिकेट जगत ही नहीं, बल्कि खेल की दुनिया के बाहर के भी लोग हैरान हैं. और आखिर हो भी क्यों न! किसी सुपर हिट फिल्म की शानदार स्क्रिप्ट के समान जम्मू-कश्मीर की रणजी खिताबी जीत में कई बड़े संदेश छिपे हैं.
बातें हो रही हैं नए 'स्विंग किंग' आकिब नबी की, हिमाचल छोड़कर जम्मू-कश्मीर के लिए खेलने वाले कप्तान पारस डोगरा की. इस टीम के जज्बे की, सुपर से ऊपर कमाल की और कायाकल्प की. न ही इस राज्य के पास कभी मुंबई और कर्नाटक जैसे राज्यों जैसा क्रिकेट का समृद्ध इतिहास था, न ही सुविधाएं और न ही प्रेरणा के लिए बड़े-बड़े नाम थे! ऊपर से पिछले कई दशकों से राज्य और JKCA (जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन) के बद से बदतर हालात, लेकिन इसके बावजूद कुछ धुरंधरों ने मिलकर देश के बाकी राज्यों की एक से बढ़कर एक धुरंधर टीम को मात देते हुए देश और खासकर राज्य के युवाओं को बड़ा संदेश देते हुए पहली बार रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनकर बता दिया कि इरादे, सही सोच में हौसले, ख्वाब और सधी प्लानिंग का तड़का लगा दिया जाए तो फिर खेल ही नहीं, किसी भी पेशे में "पूर्ण राज" और कायाकल्प हासिल किया जा सकता है.
भारतीय रणजी ट्रॉफी के इतिहास के करीब 92 साल के इतिहास में 60 विकेट लेने वाले सिर्फ तीसरे गेंदबाज बनने वाले आकिब नबी ने पिछली और बड़ी हो रही कश्मीर की युवा फौज को बड़ा मैसेज भेज दिया कि आपको खुद की अपनी, घाटी की सूरत बदलने और "आजादी" के लिए एके-47 या पत्थर नहीं, बल्कि करीब 156 ग्राम की एक अदद चमड़े की गेंद ही काफी है. दो राय नहीं कि इस 'खिताबी कायाकल्प' का असर बहुत दूर तक जाएगा और राज्य सरकार को अगले सीजन से ही इस खिताबी जीत को बेसिक शिक्षा के पाठ्यमक्रम में जगह दे देनी चाहिए, जिससे बड़े हो रहे बच्चे और आने वाली पीढ़ियों के ज़हन में यह बात समा सके कि राज्य की सूरत और जिंदगी बम-बंदूकों से तो नहीं ही बदलेगी.

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वैसे खत्म हुए रणजी सीजन के आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो एक बार को हैरानी होती है क्योंकि खिताब आंकड़ों की वैसी तस्वीर पेश नहीं करते, जैसे होने या दिखने चाहिए.सीजन के शीर्ष 15 बल्लेबाजों में आठवें नंबर पर वह अब्दुल समद (10 मैच, 748 रन, 57.53 औसत, 1 शतक, 5 अर्द्धशतक हैं) हैं, जो चारदिनी से ज्यादा टी20 फॉर्मेट में फिट होते हैं, तो कप्तान पारस डोगरा (10 मैच, 637 रन, 42.46 औसत, 2 शतक, 4 अर्द्धशतक) के रूप में सिर्फ दो ही बल्लेबाज शामिल हैं. वहीं बॉलिंग में शीर्ष 20 में दो ही बॉलर आकिब नबी और लेफ्टी पेसर सुनील राम कुमार हैं. साफ है कि जम्मू-कश्मीर को चैंपियन बनाने में आकिब नबी ने बहुत ही मोटी और लंबी लकीर खींची है, लेकिन शीर्ष प्रदर्शन में ज्यादातर खिलाड़ियों के न होने के बाद रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनना बाकी खिलाड़ियों के छोटे-छोटे, लेकिन अहम योगदान और कोच अजय शर्मा की जबर्दस्त प्लानिंग का एक बेजोड़ नमूना है. लेकिन खिताबी जीत का बड़ा श्रेय जम्मू-कश्मीर एसोसिएशन को भी देना होगा, जिसने खुद के भीतर झांकते हुए अपने ज्यादा जरूरी पत्ते दुरुस्त करने का काम किया.
कुछ साल पहले तक बिगडे़ हुए थे JKCA के हालात
कुछ साल पहले तक हालात ऐसे थे कि 2021 में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट को हस्तक्षेप कर स्थिति का जायज़ा लेना पड़ा था. एसोसिएशन शासन संबंधी विफलताओं, वित्तीय संकट,खराब बुनियादी ढांचे और करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोपों से जूझ रही थी. निजी लीग बंद हो गई थीं, बकाया भुगतान नहीं हुए थे, खिलाड़ियों के पास बुनियादी सुविधाओं और दिशा का अभाव था. लेकिन ऐसे हालात से निकल कर अगले 5 साल में रणजी ट्रॉफी चैंपियन बनना एक फिल्मी कहानी की तरह लगता है. यह बताता है कि किसी भी पेशे में चैंपियन बनने के लिए मैदानी योद्धाओं का कौशल जरूरी है, लेकिन बड़े सपने तभी सच होते हैं. जब जब ठीक वैसी ही सोच से पर्दे के पीछे प्रशासकीय कौशल का साथ मिलता है. और राज्य की व्यवस्था में कुछ ऐसी ही सोच पैदा करने का काम किया वर्तमान BCCI अध्यक्ष और जम्मू में जन्मे मिथुन मन्हास से.

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मिथुन मन्हास ने जगाई विकास की अलख
मन्हास अपने नजरिये से राज्य क्रिकेट की सूरत को बदलने का एक बार फिर से बीजारोपण किया. यह परिवर्तन धीरे-धीरे जरूर हुआ, लेकिन स्थिरता के साथ आगे बढ़ा. चार से अधिक साल तक मन्हास के नेतृत्व में एक समिति ने पर्दे के पीछे चुपचाप काम किया, ईंट-दर-ईंट जम्मू-कश्मीर क्रिकेट का फिर से निर्माण किया और इसे एक मजबूत इकाई में बदला. वह तीन सदस्यीय उप-समिति का हिस्सा थे.
पहले न राज्य क्रिकेट की कोई वेबसाइट थी, कई बिल बकाया थे, कोई ढांचा या प्रणाली नहीं थी. धीरे-धीरे, खासकर बुनियादी ढांचे में, स्पष्ट बदलाव दिखने लगे. इनमें कई प्रैक्टिस विकेट, टर्फ पिचें, इनडोर नेट्स, ड्रेसिंग रूम, साइट-स्क्रीन और बाउंड्री रोप शामिल हैं और इसमें मिथुन मन्हास का बड़ा योगदान रहा. अब सभी आयु वर्गों में अभ्यास सत्रों के लिए कूकाबुरा और एसजी गेंदों का उपयोग होता है. खिलाड़ी अब डॉर्मिटरी की जगह चार और पांच सितारा होटलों में ठहरते हैं. राज्य टीम को उच्च गुणवत्ता की किट मिलता है. वे व्यापक रूप से यात्रा करते हैं और विकास के लिए जरूरी अनुभव हासिल करते हैं. लाल मिट्टी की पिचें, जो कभी जम्मू-कश्मीर के लिए दूर की कौड़ी हुआ करती थीं, वे अब व्यवस्था का हिस्सा हैं. जीजीएम साइंस कॉलेज मैदान में आठ पिचें हैं. चार लाल मिट्टी की और चार काली मिट्टी की. सपोर्ट स्टाफ की संख्या भी कई गुना बढ़ी है. पहलेटीम एक ही कोच पर निर्भर रहा करती थी थी, लेकिन अब इस टीम के पास हेड कोच अजय शर्मा, बॉलिंग कोच पी. कृष्णा कुमार, फील्डिंग कोच दिशांत याज्ञिक, ट्रेनर सनी वर्मा, फिजियोथेरेपिस्ट चिराग पंड्या, वीडियो एनालिस्ट सुशील पजनू और मसाजर नरेश कुमार हैं.
(मनीष शर्मा ndtv.in में डिप्टी न्यूज़ एडिटर हैं...)
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