विज्ञापन
This Article is From Oct 21, 2021

इसे राष्ट्रवाद का टीका न बनाएं

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 21, 2021 22:12 pm IST
    • Published On अक्टूबर 21, 2021 22:12 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 21, 2021 22:12 pm IST

देश में एक अरब टीके लगाने का जश्न मनाया जा रहा है. इस जश्न में शरीक होने से पहले मुझे अपराजिता शर्मा की याद आ रही है. वह एक सेहतमंद लड़की थी- देश के सर्वश्रेष्ठ कॉलेज मिरांडा हाउस में हिंदी पढ़ाती थी और कला की दुनिया में अनूठे प्रयोग किया करती थी. वह एक खुशमिज़ाज-मिलनसार लड़की थी, सोशल मीडिया पर जिसके अनुकर्ताओं और प्रशंसकों की संख्या बहुत बड़ी थी. लेकिन बीते शुक्रवार को वह नहीं रही. पता चला कि उस दिन उसे लगातार दिल के दौरे पड़े. उसके दो दिन पहले ही उसने टीका लगवाया था.

यह बताना मुश्किल है कि अपराजिता के दिल के दौरे का उसके टीकाकरण से कोई संबंध था या नहीं. लेकिन ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जिनमें टीकाकरण के बाद लोगों की तबीयत इस हद तक बिगड़ी है कि वे वापस नहीं लौट सके. हिंदी के बुज़ुर्ग लेखक रमेश उपाध्याय भी उन लोगों में हैं. टीका लगाने के बावजूद कोरोना होने या कोरोना से मौत होने के मामले भी सामने आए हैं.

जाहिर है, एक अरब टीकों की तादाद जिन लोगों की वजह से संभव हुई, उनमें बहुत सारे लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं. आज के जश्न में उनके लिए श्रद्धांजलि की कोई जगह नहीं होगी. क्योंकि डॉक्टर और विशेषज्ञ यह बताते रहे हैं कि जिनकी मौत हुई है, वह दूसरी वजहों से हुई है. टीका लगाए जाने से नहीं. वैसे टीके पर संदेह करना इस लेख का मक़सद भी नहीं है. इन पंक्तियों के लेखक ने भी टीका लगवाया हुआ है. और वाकई एक करोड़ टीकों में अगर कुछ के दुष्प्रभाव या अवांतर प्रभाव सामने आए हैं तो उनका प्रतिशत इतना नगण्य है कि उसकी वजह से पूरे टीके पर सवाल उठाना ठीक नहीं है. सच तो यह है कि कोरोना से मुक़ाबले के लिए हमारे पास फिलहाल जो सीमित औज़ार हैं, उनमें सबसे कारगर टीका ही है.

लेकिन टीका एक बीमारी से बचाव का ज़रिया है जिसकी प्रभावशीलता का- या जिसके दुष्प्रभावों का भी- लगातार वैज्ञानिक अध्ययन चलना चाहिए. इससे कोरोना के विरुद्ध हमारी लड़ाई कुछ ज़्यादा कारगर और प्रभावी होगी. इस क्रम में संभव है, टीकों पर सवाल भी उठें और यह स्वीकार करने की नौबत आए कि कुछ मौतें टीके की वजह से हुई हैं.

लेकिन अभी जो माहौल है, उसमें टीके पर ऐसा वैज्ञानिक विचार संभव ही नहीं लग रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे टीके के समर्थन और विरोध को भी देशभक्ति से जोड़ दिया गया है. सौ करोड़ टीकाकरण को मोदी सरकार का पराक्रम बताया जा रहा है और जो इन टीकों पर संदेह कर रहा है, उसे राष्ट्रविरोधी तत्व माना जा रहा है. एक ज़रूरी मेडिकल प्रक्रिया को भी समारोह में बदल दिया गया है. विमान रंगे जा रहे हैं, 100 स्मारकों पर रोशनी की जा रही है, समुद्र में खड़े जहाज़ हूटर बजा रहे हैं. दुनिया के दूसरे देशों में भी टीके लग रहे हैं- और आबादी के अनुपात में भारत से ज़्यादा टीके लग रहे हैं, लेकिन टीकाकरण को उद्धत राष्ट्रवाद के खेल में बदलने का काम कहीं नहीं हो रहा है.

टीकाकरण के इस समारोह में यह सुविधापूर्वक भुला दिया गया है कि अभी छह महीने भी नहीं हुए हैं जब इस देश के कोविड पीड़ित लोग ऑक्सीजन के लिए सड़कों पर तड़प रहे थे, अस्पतालों में बिस्तरों के अभाव में दम तोड़ रहे थे, ब्लैक में दवाएं और इंजेक्शन खरीद रहे थे और पुण्य करने के नाम पर गुजरात से दिल्ली तक बीजेपी के नेता इसे मुफ़्त भी बंटवा रहे थे जिस पर अदालत ने भी सख़्त सवाल किए. क्या नदियों में तैरती लाशों के दृश्य इस देश ने इतनी जल्दी भुला दिए, क्या गंगा किनारे बनी क़ब्रों का खयाल इतनी आसानी से दिमाग़ से उतरने लायक है? क्या श्मशान गृहों में जलती हुई उन लाशों की ठंडी चिताओं की तरह हम भी ठंडे हो चुके हैं? 

यह उत्सव की घड़ी में दुख को याद करने की मनहूसियत का मामला नहीं है. ध्यान से देखें तो कोरोना के विरुद्ध हमारी पूरी लड़ाई को एक राष्ट्रवादी उन्माद देने की कोशिश की गई- इस उन्माद को कई तरह के आडंबरों के बीच रचा गया. प्रधानमंत्री ने 21 दिन के लॉकडाउन का एलान करते हुए लोगों से दीए जलवाए और घंटे बजवाए. इस लॉकडाउन के साथ ही अमीर खाता-पीता मध्यवर्ग प्रधानमंत्री की सारी हिदायतें भूल शहरों की दुकानों पर टूट पड़ा ताकि उसका भंडार खाली न पड़े. दूसरी तरफ हिंदुस्तान के गरीब आदमी ने ख़ुद को सड़क पर पाया- ऐसी मजबूरी में कि वह सैकड़ों मील पैदल चल कर अपने छूटे गांवों और शहरों में अपने भूले हुए पतों तक लौटता नज़र आया और कई मामलो में वहां से भी दुत्कार दिया गया. हिंदुस्तान के जिन गरीब बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए था, वे अब भी दुकानों के आगे भीख मांगने का अभ्यास करते दिखाई पड़ रहे हैं. कोविड से साझा लड़ाई के जज़्बे की असलियत ऐसी थी कि लोग स्वास्थ्यकर्मियों को अपने ही घर में जाने से रोक रहे थे और जिसे कोविड हो जाए, उसे बीमार से ज़्यादा मुजरिम समझ रहे थे. जबकि इसी दौरान सरकार अस्पतालों में विमानों से फूल बरसवाती नजर आई और सेना के जवान बैंड बजाते दिखे.

इस बीच कोविड के अलावा दूसरे वायरस भी नजर आते रहे. दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में तबलीगी जमात से जुड़े लोगों के बीच कोरोना के फैलाव की ख़बरों ने नफ़रत के वायरस को भरपूर पोषण दिया. कोविड के नाम पर जनांदोलनों को कुचला गया और कोविड के बीच ही दंगों की जांच के नाम पर कई बेकसूरों को जेल में डाल दिया गया.

दरअसल यह कहानी इतनी लंबी और तकलीफ़देह है कि इस दर्द से निजात पाने के लिए कोई नशा जरूरी है. तो राष्ट्रवाद ही वह नशा है जिससे यह तकलीफ भुलाई जा सकती है. केंद्र सरकार फिलहाल यही काम करती दिख रही है.

टीके और सेहत के सवाल पर लौटें. चाहें तो याद कर सकते हैं कि बीते ही साल प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त से एक टीके के तैयार होने और कई टीकों के अंतिम प्रक्रिया में होने का एलान कर दिया था और इस राजनीतिक एलान के असंभव लक्ष्य को हासिल करने के लिए आइसीएमआर के आदरणीय अधिकारी बलराम भार्गव ने टीके के टेस्ट के लिए चिट्ठियां भी जारी कर दीं जो लगभग चेतावनी वाले अंदाज़ में लिखी गई थीं. सत्ता की राजनीति के आगे यह वैज्ञानिक संस्थान का शर्मनाक समर्पण था जिसके कई छोटे-छोटे रूप बाद में भी दिखते रहे.

दरअसल सच्चाई यह है कि कोरोना के टीके के नाम पर हम चाहे जितने उत्सव मना लें, हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का आधारभूत ढांचा इतना लचर है कि दहशत होती है. कोरोना की दूसरी लहर ने इसका बिल्कुल तार-तार चेहरा दिखा दिया. फिर कोरोना ने लोगों को मारा ही नहीं, इलाज के नाम पर गरीब भी बना दिया. यह आम अनुभव था कि किसी भी प्राइवेट अस्पताल में दाखिल होने के लिए कोरोना पीड़ित को या उसके परिवार को पहले ही पचास हज़ार रुपये जमा कराने प़डते थे और आठ-दस दिन में उसका चार-पांच लाख का बिल बन जाता था. दरअसल यह आम धारणा बन गई है कि हमारे प्राइवेट अस्पताल लूट के अड्डों में बदल गए हैं और सरकारी अस्पताल ऐसे नरक हैं जहां लोग ज़िंदा रहने के लिए नहीं, मरने के लिए जाते हैं. बेशक, कुछ सरकारी अस्पताल और कुछ प्राइवेट अस्पताल इस धारणा को तोड़ते हैं लेकिन कमोबेश हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की शक्ल यही है. इन दो वर्षों में हमने कोरोना की तो बहुत परवाह की, लेकिन यह नहीं देखा कि इन्हीं दिनों लोग टीबी या कैंसर से किस कदर मरते रहे, या डेंगू या दूसरी बीमारियां कैसे पांव फैलाती रहीं. केंद्र सरकार आयुष्मान भारत की विराट योजना लेकर आई है, लेकिन सच यह है कि ऐसी योजनाएं गरीबों का मुफ्त इलाज करने के नाम पर अमीर अस्पतालों की तिजोरी ही भरती हैं. अगर आयुष्मान भारत में लगने वाली राशि को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने में लगाया जाता तो शायद ऐसी बीमा योजना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. या संभव है, कोई जानकार इससे अलग राय रखे और आयुष्मान योजना को बेहतर माने, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारे यहां स्वास्थ्य सुविधाओं या किसी भी आधारभूत सेवा को लेकर ठोस बहस जारी है? हम ऐसे उत्सवग्रस्त समाज में बदले जा रहे हैं जो अंधेरों से भागता है और हर चीज़ को समारोही आईने में देखकर तसल्ली हासिल करना चाहता है. टीके को लेकर बनाया गया राष्ट्रवादी विमर्श दरअसल इसी सच की एक और पुष्टि है.

यह छोटी राहत नहीं है कि हम अभी तक कोरोना की तीसरी लहर को दूर रखने में कामयाब रहे हैं. यह कामयाबी कुछ दिन और बनी रहे तो शायद हम तसल्ली कर सकें कि हमने कोरोना को फिलहाल मात दे दी है. लेकिन सच यह है कि बीमारियां भी रहेंगी, वायरस भी रहेंगे और हम भी रहेंगे. इनसे लड़ने का कारगर तरीक़ा हमें विकसित करना होगा जो 100 करोड़ टीकाकरण की आंकड़ेबाज़ी का जश्न मनाने से नहीं निकलेगा. हर चीज़ को समारोह में बदलना भी एक बीमारी की निशानी है.

लेकिन यह बात कौन कहे. अभी का हाल देखकर रघुवीर सहाय की चर्चित कविता ‘हंसो-हंसो जल्दी हंसो' की पंक्ति याद आती है- ‘हंसो तुम पर निगाह रखी जा रही है.‘

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
1 Billion Jabs, PM Narendra Modi, Covid-19 Vaccination
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com