क्योंकि जीत से पहले हार है

जीत की यह भूख दरअसल बताती है कि हम एक हारे हुए समाज हैं- हम अपने जख्मों पर जीत का फाहा रखना चाहते हैं- बिना यह समझे कि जीत हार के बिना नहीं आती।

क्योंकि जीत से पहले हार है

2016 के रियो ओलंपिक में मैंने विनेश फोगाट की कुश्ती देखी थी. एक चीनी खिलाड़ी से मुक़ाबला करते हुए उनकी टांग टूट गई‌ थी. मुझे तब लगा था कि कुश्ती की दुनिया में इस खिलाड़ी का सफ़र शुरू होते ही ख़त्म हो गया. लेकिन मेरी तरह सोचने वालों को ग़लत साबित करते हुए विनेश फोगाट कुश्ती के मैट तक लौटीं और उन्होंने फिर टोक्यो ओलंपिक के लिए जगह बनाई. दुर्भाग्य से इस बार भी वह पदक जीतने में नाकाम रहीं. वह देश लौटीं तो उन्हें अनुशासनहीनता का एक नोटिस थमा दिया गया. मुझे नहीं मालूम कि विनेश फोगाट ने वाकई कोई अनुशासन तोड़ा या नहीं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि अगर उन्होंने मेडल जीत लिया होता तो उनके सारे गुनाह माफ़ हो गए होते.‌ किसी की हिम्मत नहीं होती कि वह अनुशासनहीनता का सवाल उठाता. इस ढंग से देखें तो विनेश फोगाट का गुनाह यह नहीं है कि उन्होंने अनुशासन तोड़ा, बल्कि यह है कि उन्होंने देश के लिए पदक नहीं जीता. अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' के शुक्रवार के संस्करण में विनेश फोगाट ने अपनी यह पीड़ा व्यक्त की है. उनके लेखनुमा लंबे वक्तव्य में इस बात की सफ़ाई शामिल है कि कुछ दिन टीम से अलग रहने का फैसला उन्होंने क्यों किया था, यह भी कि वह कितनी तरह की परेशानियों से गुज़र रही थीं.

विनेश फोगाट की इस कहानी पर सोचते हुए मुझे एक दौर में भारतीय रंगमंच पर खूब चर्चित हुए अनिल बर्वे के मराठी उपन्यास पर आधारित नाटक 'थैंक यू मिस्टर ग्लाड' की याद आई‌‌. इस उपन्यास का नायक एक जगह कहता है कि सभ्यता का इतिहास जीत से नहीं, हार से शुरू हुआ है या ढाला गया है. जीत की हर कहानी के पीछे हार का एक लंबा सिलसिला होता है जो गुमनाम रह जाता है. इंसान जीत का उत्सव मनाता है लेकिन भूल जाता है कि इस जीत तक पहुंचने के रास्ते में कितनी तरह की पराजयों का भी हाथ है.

लेकिन इसमें शक नहीं कि चमकती जीत ही है. यही वजह है कि टोक्यो ओलंपिक से पदक जीत कर लौटे खिलाड़ियों की झोली सम्मान और इनाम-इकराम से भर गई है. निश्चय ही इन खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया है और इनका सम्मान होना चाहिए. इनमें से बहुत सारे खिलाड़ी बहुत मुश्किल हालात में इस मुकाम तक पहुंचे हैं, यह बात भी भुलाई नहीं जानी चाहिए. लेकिन टोक्यो से जो खिलाड़ी हार कर लौटे हैं, क्या वे भी सम्मान के लायक नहीं हैं? क्या दीपिका कुमारी, मनु भाकर, विनेश फोगाट या अतनु दास- जो हमारी पदक की उम्मीदें पूरी नहीं कर सके- उन्हें अब खलनायक मान लेना चाहिए? या यह हिसाब लगाना शुरू कर देना चाहिए कि उनकी ट्रेनिंग पर देश में कितने पैसे खर्च किए गए? क्या उनसे जवाब मांगा जाना चाहिए? यह काम शुरू भी हो गया है. यह बताया जा रहा है कि शूटरों पर सत्तर करोड़ रुपए खर्च किए गए लेकिन वह एक भी मेडल नहीं ला पाए. अंदेशा यह है कि आने वाले दिनों में इस आधार पर शूटिंग का बजट घटा न दिया जाए और कुछ दूसरे खेलों का बढ़ा न दिया जाए.
हालांकि इस देश में किसी मद में आवंटित पैसों का कैसे इस्तेमाल होता है और उनमें कितना वास्तविक हक़दारों को जाता है और कितना दलालों से लेकर अफसरों और खेल संघों पर काबिज़ नेताओं और नेता-पुत्रों की जेब में चला जाता है- इसकी चर्चा हो तो यह अलग विषय हो जाएगा, इसलिए इसे छोड़ देते हैं और खेल और खिलाड़ियों पर ही रहते हैं. यह बात साफ़ समझ लेनी चाहिए कि पैसे से पदक नहीं जीते जाते. पैसे से बस वह व्यवस्था बनती है, वह तंत्र खड़ा होता है जो खिलाड़ियों को संपूर्ण प्रशिक्षण का अवसर सुलभ कराता है, यह तंत्र इस बात की गारंटी दे सकता है कि वह किसी खिलाड़ी की प्रतिभा को जाया नहीं होने देगा और कई खिलाड़ियों को इस तरह मांज देगा कि वे देश-विदेश की प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन कर सकें. दुर्भाग्य से हमारे यहां अभी तक ऐसा खेल तंत्र नहीं है. इसलिए खिलाड़ी कभी-कभी अपनी व्यवस्था खुद भी करते हैं और कभी कभी खेल-संघों से उनको मदद मिलती है. किसी प्रतियोगिता में उनका हारना या जीतना इस बात पर निर्भर करता है कि उनके मुकाबले दूसरे खिलाड़ियों का खेल कैसा है, उनकी तैयारी कैसी थी, और उस दिन उनका प्रदर्शन कैसा रहा. भाला फेंक में नीरज चोपड़ा ने जितनी दूर भाला फेंक कर स्वर्ण पदक जीता, उससे कई मीटर दूर फेंकने वाले उसी प्रतियोगिता में उनके साथ शामिल थे लेकिन वह नाकाम रहे. इससे वे छोटे खिलाड़ी नहीं हो जाते. संभव है आने वाले कल को वह किसी दिन नीरज चोपड़ा को मात देंगे और फिर किसी दिन नीरज चोपड़ा अपना प्रदर्शन बेहतर कर उनके लिए नई चुनौती रख देंगे. 

लेकिन हमारे यहां क्या हो रहा है? खिलाड़ी खिलाड़ी नहीं रह गए हैं, स्टार बना दिए गए हैं. अब वे फीता काटेंगे, अब वे साबुन-तेल से लेकर पेप्सी कोक तक बेचेंगे, अब वह अलग-अलग ब्रांड्स के अंबैसडर बन जाएंगे. शायद उनका खेलना कम होगा, शायद उनकी एकाग्रता कम होगी और शायद आने वाले कल को उनका प्रदर्शन भी कुछ फीका होगा. यह अनायास नहीं है कि दूसरे देशों में जहां पदक विजेता एक के बाद एक कई ओलंपिक में पदक जीते चले जाते हैं, वहीं हमारे खिलाड़ी एक मेडल जीतने के बाद अगली बार अपना प्रदर्शन दोहरा नहीं पाते. कुछ तो खेल ही छोड़ देते हैं- वे संसद से लेकर तिहाड़ तक में दिखाई पड़ते हैं.

ऐसा इसलिए है कि हमें खेल से नहीं, मेडल से प्यार है. जो मेडल लाया है, उसके साथ सेल्फी लेनी है, उसको सम्मानित करना है और उसको इनाम देना है. लेकिन जो हार गया है, वह एक तरह से खलनायक है. उसे पीछे छोड़ दिया जाना है, उसे दुत्कारा जाना है, उसे करोड़ों की रक़म जाया होने का ज़िम्मेदार बताया जाना है. 

लेकिन जीत की यह भूख दरअसल बताती है कि हम एक हारे हुए समाज हैं- हम अपने जख्मों पर जीत का फाहा रखना चाहते हैं- बिना यह समझे कि जीत हार के बिना नहीं आती. जो हार गए हैं, उनके भी हम कंधे थपथपाएं, बताएं कि उनसे हमारी उम्मीद टूटी नहीं है, कि वह भी एक दिन देश के लिए पदक लाएंगे, और अगर किसी वजह से नहीं ला पाएंगे तब भी वह रास्ता बनाएंगे जो दूसरों को पोडियम तक ले जाएगा. विनेश फोगाट, दीपिका कुमारी, मनु भाकर- इन सब को हम सहेज कर रखें- संभव है, किसी दिन इनकी आभा में भी हमें दिपदिपाने का अवसर मिले. 
 


प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

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