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This Article is From Mar 12, 2026

नीतीश कुमार के राज्य सभा जाने के बाद बीजेपी और जदयू की चुनौतियां क्या होंगी

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  • Updated:
    मार्च 12, 2026 12:47 pm IST
    • Published On मार्च 12, 2026 12:46 pm IST
    • Last Updated On मार्च 12, 2026 12:47 pm IST
नीतीश कुमार के राज्य सभा जाने के बाद बीजेपी और जदयू की चुनौतियां क्या होंगी

नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं. वो 20 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इसके साथ ही बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने की संभावना प्रबल दिख रही है. हालांकि, जिस परिस्थिति में नीतीश कुमार बिहार छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं, उस पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी राजनीतिक पंडितों द्वारा टिप्पणी की जाती रहेगी. इस आलेख में भविष्य की चुनौतियों को समझने का प्रयास किया गया है. 

कितनी बड़ी होगी प्रशासनिक चुनौती 

नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व बिहार में कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली  समेत लगभग सभी मोर्चे पर स्थिति बेहद ख़राब थी. नीतीश ने इन 20 सालों में विकास के सभी मानकों में सुधार करते हुए बिहार के मतदाताओं को विश्वास दिलाया. शायद इसी विश्वास की वजह से ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद भी मतदाताओं ने 2025 विधानसभा चुनाव में भी एनडीए को जबरदस्त समर्थन देकर तीन चौथाई से अधिक बहुमत वाली सरकार बनवा दी. लेकिन इस विश्वास का दूसरा पहलू यह है कि जनता की उम्मीदों में भी इज़ाफ़ा हुआ . आज यदि कुछ घंटों के लिए भी किसी गांव में बिजली कट जाती है तो लोग परेशान होकर संबंधित पदाधिकारी और ऑफिस में इसकी शिकायत करते हैं. यदि कहीं रोड नहीं बना या फिर रोड टूट गया हो तो लोगों को लगता है कि जल्द से जल्द इसका मरम्मत और निर्माण कार्य को पूरा किया जाए. कमोबेश यही स्थिति कानून व्यवस्था को लेकर भी है. हालांकि, इन कुछ सालों में नीतीश के अचेत अवस्था में रहने के कारण उनकी ख़ुद की बनाई सुदृढ़ सुशासन बाबू की छवि में लगातार गिरावट हो रही थी. इसके बावजूद नीतीश द्वारा किए गए कार्य का वजन इतना था कि इस लगातार हो रहे गिरावट को भी थामे सा खड़ा था. ऐसी परिस्थिति में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार के समक्ष लॉ एंड ऑर्डर समेत अनेकों मोर्चे पर चुनौती है. नीतीश द्वारा पूर्ण शराब बंदी के करण सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा . अभी हाल ही में राज्य के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा शराबंदी से सालाना 30 हज़ार करोड़ का घटा हो रहा है. दूसरी तरफ़ अनेकों लोक कल्याणकारी योजनाएं सरकार चला रही है.ऐसे में आने वाले दिनों में राजस्व संग्रह और लोक कल्याणकारी योजना की महती चुनौती रहेगी.  

बिहार का सांप्रदायिक सौहार्द 

नीतीश के शासनकाल में छिट-पुट घटनाओं को छोड़ कभी कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ. नीतीश कुमार ने यह सुनिश्चित किया कि अल्पसंख्यक की सुरक्षा में कोई चूक ना हो. साल 1989 में हुए भागलपुर दंगे के केस को 2006 में  पुनः खुलवा कर दंगे के आरोपियों को सजा दिलाने का श्रेय भी नीतीश कुमार को जाता है. यही वजह है कि आज भी अल्पसंख्यक समुदाय कम ही सही लेकिन हाल के विधानसभा चुनाव तक एनडीए के साथ खड़ा दिखा.साल 2005 से 2015 तक तो नीतीश कुमार ने बिहार में एक सशक्त पसमंदा राजनीति भी की. अब जब वो राज्य की राजनीति से विदा ले रहे तब एक बड़ा सवाल अल्पसंख्यों  की सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द की है. अभी हाल ही में स्कूलों के पास मांस-मछली पर बिहार सरकार द्वारा पाबंदी लगाई गई है. इसे हिंसा से जोड़कर इस फैसले को सही ठहराने की कोशिश की गई. लेकिन, इस तरह की राजनीति से क्या बीजेपी लंबे समय से चली आ रही सामाजिक न्याय के इतर हिंदुत्व की राजनीति पर जोर दे रही है? क्या बीजेपी अपने नेतृत्व में बनने वाली सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करने का काम करेगी? 

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने राजनीति में एंट्री ले ली है. वो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जदयू में शामिल हुए.

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने राजनीति में एंट्री ले ली है. वो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जदयू में शामिल हुए.

महिला सशक्तिकरण का क्या होगा? 

आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को पार्टी की सदस्यता दिलवा कर एक तरह से उन्हें नीतीश और पार्टी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. पंचायती राज में आरक्षण, शराबबंदी, साइकिल योजना से सरकारी नौकरी में 33 फीसदी आरक्षण देकर नीतीश कुमार ने राज्य में महिला वोट बैंक बनाने का काम किया. अनेकों अध्ययन में इस बात के संकेत मिले हैं कि सभी जाति और धर्म के महिला वोटरों ने नीतीश कुमार को अपना समर्थन दिया. बीजेपी नेतृत्व में बनने जा रही नई सरकार के समक्ष महिला वोटरों के उम्मीदों पर खड़ा उतरना बड़ी चुनौतियों में से एक होगी . क्या राजस्य घाटे को पाटने के लिए सरकार शराबबंदी ख़त्म करेगी ? यदि ऐसा होता है तो महिला वोटरों में क्या संदेश जाएगा ? अनेकों अध्ययन ने यह भी बताया है कि शराबबंदी के करण रोड एक्सीडेंट और घरेलू हिंसा में कमी आई है. दूसरी तरफ़ चुनाव में महिलाओं को दस हज़ार का वादा कर चुकी सरकार के लिए राजस्व की ज़रूरत एक व्यावहारिक समस्या भी है

कैसे सधेगी जातीय राजनीति 

उप जातियों का राजनीतीकरण बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई है. नीतीश कुमार जिस वर्ग से आते थे उसकी आबादी मात्र तीन फीसदी है. इसके बावजूद नीतीश कुमार पिछले 20 साल से बिहार के मुख्यमंत्री तो थे ही राज्य की राजनीति के बेताज बादशाह भी कहे जाते थे . इस बादशाहत के पीछे नीतीश की वो सोशल इंजीनियरिंग थी जिसमें उन्होंने अनेकों अति पिछड़ी जातियों  को जदयू के साथ जोड़े रखा. जहां मुख्य विपक्षी दल राजद के पास मुस्लिम-यादव वोट बेस हैं, जो करीब 32 फीसदी होने के बाद भी लंबे अरसे से सत्ता से दूर है. वहीं मात्र तीन फीसदी वोट बेस के नेता ने अपने राजनीतिक कौशल से व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाकर सफलतापूर्वक सत्ता पर न सिर्फ काबिज रहे बल्कि उन तबकों का सामाजिक परिवर्तन भी किया. सरकारी नौकरी और पंचायती राज में अति पिछड़ों को आरक्षण से लेकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर नीतीश कुमार ने एक मौन सामाजिक परिवर्तन (Silent Social Transformation) का काम किया है. इसी सामाजिक परिवर्तन  के करण विधायक आईपी गुप्ता जो तांती-ततवा समुदाय को अनुसूचित जाति में शामिल करने को आंदोलन कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर चुनाव से पहले मल्लाह समुदाय से आने वाले मुकेश साहनी को महागठबंधन का उप मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने तक की घोषणा करनी पड़ गई. 

नीतीश के बाद बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन अति पिछड़े वोटरों को एनडीए के तरफ़ बनाए रखने की होगी. राजद ने विधानसभा चुनाव से पहले मंगनी लाल मंडल जैसे नेता को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर अति पिछड़े वोटरों को लुभाने का प्रयास किया था. हालांकि यह प्रयास सफल नहीं हो सका लेकिन अब जबकि नीतीश राज्य के मुखिया नहीं होंगे ऐसे में यदि चार-पांच फीसदी वोट भी महागठबंधन अपनी तरफ़ करने में सफल रहा तो बाजी उनके पक्ष में चली जाएगी.

जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी पार्टी को बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखने की है.

जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी पार्टी को बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखने की है.

क्या बिहार की राजनीति दो ध्रुवीय हो जाएगी

यूजीसी एक्ट के कारण सवर्णों की नाराज़गी झेल रही बीजेपी के लिए बिहार जैसे प्रदेश में ऐसा कोई भी कदम जोखिम भरा हो सकता है. कांग्रेस और जनसुराज की कोशिश होगी कि वो स्वर्ण समाज को अपने तरफ़ आकर्षित करे. एक लंबे अरसे बाद बीजेपी ज़रूर चाहेगी कि उसकी मौजूदगी बढ़े. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बीजेपी जदयू को समाप्त कर देगी. यदि ऐसा कोई भी प्रयास भविष्य में होता है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान ख़ुद बीजेपी को ही होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि तब बिहार की राजनीति दो ध्रवीय हो जाएगी और ऐसे में राजद के लिए पिछड़े गोलबंदी कर चुनाव जीतना आसान हो जाएगा. नीतीश कुमार के रूप में बिहार में एक तीसरे ध्रुव की मौजूदगी से न सिर्फ़ अति पिछड़ा वोटर बल्कि महिला और फ्लोटिंग वोटर भी जदयू के साथ रहा. इस स्पेस के ख़त्म हो जाने से दो ध्रुवीय राजनीति की संभावना बढ़ेगी. इसका फ़ायदा राजद को मिल सकता है. 

जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले संजय कुमार झा बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड के बीच बेहतर समन्वय के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने निशांत कुमार को पार्टी में लाने में अहम भूमिका भी अदा की है. उनके लिए भी यह चुनौती होगी कि कैसे भविष्य में बिहार की राजनीति में यह तीसरी ताकत मजबूत बनी रहे.

(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इन्होंने नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज से पीएचडी की है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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