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This Article is From Jul 25, 2025

फूलन देवी: हाशिए के समाज से निकली 'बैंडिट क्वीन'

रमाशंकर सिंह
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 25, 2025 16:22 pm IST
    • Published On जुलाई 25, 2025 16:19 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 25, 2025 16:22 pm IST
फूलन देवी: हाशिए के समाज से निकली 'बैंडिट क्वीन'

आज 25 जुलाई है. आज ही के दिन फूलन देवी को भारत की राजधानी दिल्ली के अशोक रोड स्थित उनके सरकारी आवास में तब गोलियों से भून दिया गया था, जब संसद का मानसून सत्र चल रहा था. एक बहुत ही नाजुक और वंचित दायरे से निकलकर देश की संसद में पहुंचने वाली फूलन देवी की कहानी जितनी आकर्षक है, उतनी ही त्रासद भी. अपने ही जीवन काल में वे विश्वप्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफरों की फिल्मों, कवियों की कविताओं और नौटंकी मंडलियों द्वारा खेले जाने वाले ड्रामों की विषयवस्तु बन गई थीं. वे एक ही समय भारतीय लोक-कल्पना में जगह बना रही थीं और एक ही साथ समाज के कुछ वर्गों में उद्दिग्नता भी पैदा कर रही थीं. यदि कोई 1980 के पहले के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सामाजिक लैंडस्केप को ध्यान से देखे तो पाएगा कि  'डाकू' उसमें भय, रोमांच और कभी-कभी न्याय देने वाले एक समूह के रूप में मौजूद थे. महेश कटारे के उपन्यास 'काली धार' में चंबल की इस सामाजिकी का वर्णन किया गया है. 

बीहड़ से निकली 'बैंडिट क्वीन'

भारत के सार्वजनिक दायरे में फ़िल्में केवल फ़िल्में नहीं हैं बल्कि वे लोगों की कल्पना, अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों और सामाजिक संबंधों को पुनर्विन्यस्त करती रहती हैं. साल 1994 में जब शेखर कपूर की फिल्म 'बैंडिट क्वीन' रिलीज हुई तो उसने फूलन देवी के मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया. वे रातों-रात मशहूर हो गईं, उनके इंटरव्यू लिए जाने लगे. इन सबमें उनका दुख और संताप सामने आया जो जितना उनका व्यक्तिगत था, उतना ही सामूहिक भी था. भारतीय जाति-व्यवस्था के निचले स्तरों पर स्थापित कर दिए गए मल्लाह समुदाय का पेशा मछली मारना, नाव चलाना और बाद में बालू निकालना रहा है. लेकिन फूलन का परिवार इतना गरीब था कि उनके पास नाव भी नहीं थी. उनके पिता बढ़ई का काम करते थे. बालिका फूलन को पहले तो अपने परिवार के अंदर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और उनके दुर्बल पिता उन्हें सुरक्षा और सम्मान देने में नाकामयाब रहे. उसके बाद एक बेमेल विवाह ने उनका जीवन कष्टों से भर दिया. उसके बाद फूलन देवी को डाकुओं का साथ रहना पड़ा. वहां भी उन्हें स्त्री होने का दंड मिला. उनका सामूहिक बलात्कार हुआ. यह सब बातें फ़िल्म दिखाती है लेकिन वास्तविक फूलन कहीं इससे बाहर थीं.  

कैसे बनती हैं फूलन देवी

भारत में जाति पदानुक्रम हमेशा काम करता है. उसके ठीक अंदर पुरुष बर्चस्व छिपा रहता है. कभी-कभी यह भी पता नहीं चलता कि यह कृत्य पुरुष बर्चस्व है कि जातिवाद है अथवा दोनों का मिलाजुला रूप है. तो जब 1981 में बेहमई की घटना हुई तो, कुछ समय के लिए, इस पर पूरा समाज दो-फाड़ हो गया. एक ही समय में फूलन देवी ने जातिवाद और पुरुष बर्चस्व दोनों को चुनौती पेश कर दी थी. जैसा उस समय के हिन्दी भाषा में प्रकाशित अखबारों की कतरनें दिखाती हैं- कुछ के लिए फूलन हत्यारी थीं तो कुछ के लिए मुक्तिदाता. हत्याकांड के बाद फूलन देवी ने फरवरी 1983 में जब भिंड में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण किया तो तस्वीर बदल गई. आत्मसमर्पण से पहले उन्होंने महात्मा गांधी और मां दुर्गा की तस्वीरों के सामने सिर झुकाया. 11 साल जेल में बिताने के बाद, 1994 में वे रिहा हुईं. 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मिर्जापुर से लोकसभा सांसद चुनी गईं, 1998 में हार का सामना किया, और 1999 में फिर से सांसद बनीं. 2001 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई, लेकिन उनकी मृत्यु ने उनके प्रभाव को और बढ़ाया. 

जेल से रिहा होने के बाद समाजवादी पार्टी ने फूलन देवी को उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से टिकट दिया था.

जेल से रिहा होने के बाद समाजवादी पार्टी ने फूलन देवी को उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से टिकट दिया था.
Photo Credit: @yadavakhilesh Twitter

हाशिये से उभरी फूलन देवी का जन्म उस निषाद समुदाय में हुआ जिसके पास पहले से वेद व्यास, एकलव्य और निषादराज जैसे चरित्रों की एक समृद्ध ऐतिहासिक विरासत थी. उनसे निषाद समुदाय प्रेरणा लेता है. जब फूलन देवी सपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं तो यह मामूली बात न थी. इसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया जिसका उदय अन्याय, उत्पीड़न और समाज पोषित हिंसा के बीच से हुआ है और जो देश की महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल हो सकती हैं. वे घर-घर लोकप्रिय हो गईं. इसके बाद उस 'हिंसा' पर बहसें भी हुईं कि फूलन पर हिंसा हुई अथवा उन्होंने बेहमई के परिवारों पर हिंसा ढाई लेकिन पलड़ा फूलन के पक्ष में झुका दिखाई देता है. जैसा भारतीय समाज का स्वाभाव है, वह स्त्री के साथ खड़ा रहना चाहता है. वह कमजोर का साथ देना चाहता है. फूलन एक साथ कमजोर थीं और स्त्री भी थीं और जब उन्हें गोलियों से भून दिया गया तो उनका पक्ष थोड़ा और साफ़ हुआ. लोगों ने उन पर फिर से विचार किया और इस बार उनके मन में फूलन के प्रति एक करुणा मिश्रित सम्मान भाव भी था.

गांवों-पुरवों में फूलन 

वर्ष 2010 से लेकर अब तक मैंने उत्तर प्रदेश की विभिन्न नदियों के किनारे, खासकर गंगा और यमुना के किनारे फील्डवर्क किया है. यह फील्डवर्क निषाद समुदाय के अंदर समाहित विभिन्न जातियों के जीवन, नदियों से उनके जुड़ाव एवं उससे निकलने वाली राजनीति और संस्कृति के बारे में है. मैंने पाया है कि निषाद समुदाय एक ऐसा राजनीतिक समुदाय बन गया है जो उत्तर प्रदेश की राजनीति को बदल सकने की क्षमता रखता है. अभी जब तक जाति आधारित जनगणना के आंकड़े नहीं आ जाते, तब तक हम निषाद बुद्धिजीवियों और सामुदायिक नेताओं की यह बात मान सकते हैं कि उनकी संख्या उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या का आठ फीसदी के आसपास है. 

वे नदियों के किनारे और उससे दूर बसे गांवों में एक खास किस्म की राजनीति का निर्माण कर रहे हैं जिसमें आरक्षण, प्रतिनिधित्व, आत्मसम्मान और आर्थिक खुशहाली के मुद्दे शामिल हैं. हम जानते हैं कि भारत की बहुजन चेतना के उच्चीकरण में एकलव्य का प्रतीक भूमिका निभाता रहा है और पिछले दो दशक में फूलन के व्यक्तित्व ने उन्हें एक साथ महिला सशक्तीकरण और राजनीतिक भागीदारी से जोड़ दिया है. वर्ष 2010 के बाद, फूलन देवी न केवल निषाद महिलाओं बल्कि बृहद स्तर पर बहुजन महिलाओं में एक रोल मॉडल बनकर उभरी हैं. गोण्डा, अयोध्या, सुल्तानपुर, इलाहाबाद, भदोही, बनारस, चंदौली, कानपुर, कानपुर देहात, औरैया, बांदा, महोबा, चित्रकूट, कौशाम्बी, हमीरपुर और ललितपुर में मैंने ऐसी महिलाओं से भी बात की है, जो गैर-बहुजन वर्गों से थीं, लेकिन वे भी फूलन के साहस और संघर्ष की प्रशंसा करती थीं. उनके लिए फूलन पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने वाली स्त्री सशक्तीकरण की प्रतीक थीं. वास्तव में फूलन का व्यक्तित्व डॉ. आंबेडकर के 'संघर्ष, शिक्षा और संगठन'के विचार को आगे बढ़ाता है. 

मल्लाहों का महत्व

उत्तर भारत की चुनावी राजनीति में भी फूलन का व्यक्तित्व महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है. कम से कम तीन पार्टियां उनके व्यक्तित्त्व को चुनावी रैलियों में ले जाने में कामयाब हुई हैं. इसमें निश्चित ही समाजवादी पार्टी सबसे आगे है. यह समाजवादी पार्टी ही थी जिसने उन्हें लोकसभा से टिकट दिया था. बिहार में विकासशील इंसान पार्टी और उत्तर प्रदेश में निषाद पार्टी की सार्वजनिक कल्पना उनके बिना पूरी नहीं होती है. इसके अतिरिक्त, भारत की अन्य पार्टियों जैसे भाजपा, कांग्रेस, बसपा सहित दूसरी अन्य पार्टियां निषाद वोट बैंक को उपेक्षित करने की हालत में नहीं हैं. वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव में निषाद समुदाय की महत्वपूर्ण चुनावी दावेदारी रहा है. इस बात को सभी पार्टियां जानती हैं और इसलिए वे अब फूलन देवी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने में पीछे नहीं दिखना चाहती हैं. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय निषाद संघ और कई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन 25 जुलाई को फूलन देवी की पुण्यतिथि को 'अन्याय विरोधी दिवस' के रूप में मनाते आ रहे हैं. 2007 में इस दिन को व्यापक रूप से मनाने की अपील की गई थी. 

अस्वीकरण: लेखक कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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