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विस्थापन, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है 'जुलूस'

सुधीर जैन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 12, 2026 09:55 am IST
    • Published On सितंबर 12, 2026 09:55 am IST
    • Last Updated On सितंबर 12, 2026 09:55 am IST
विस्थापन, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं की कहानी है 'जुलूस'

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित रंगमंच पर इस हफ़्ते मंगलवार की शाम फणीश्वर नाथ रेणू के उपन्यास 'जुलूस' का मंचन वाकई बहुत कुछ कह गया. दरअसल रेणू ने यह उपन्यास पिछली सदी के साठ के दशक में लिखा था. इसमें उस त्रासदी की कथा है जिसे हम आजादी के फौरन बाद विस्थापितों और शरणार्थियों के दुख के रूप में पहचानते हैं. आज इस रचना की प्रासंगिकता इस लिहाज से है कि दुनिया़ में कहीं न कहीं विस्थापन के दृश्य आज भी बनते हैं और उससे उपजीं सांप्रदायिक प्रवृत्तियों का अंत अभी हुआ नहीं है. बाहरी और स्थानीय के नाम पर भूराजनीतिक संघर्ष दुनिया के किसी न किसी भूखंड पर आज भी दिख जाता है.दुनिया के कुछ प्रगतिशील समाजों ने खुद को सभ्य और स्वस्थ्य भले ही बना लिया हो फिर भी विश्व में कुछ तबके अपनी  भाषा, अपनी मिट्टी, अपनी जाति, धर्म के आग्रह छोड़ नहीं पा रहे हैं. रेणु के इस उपन्यास में ऐसी ही विकट और जटिल परिस्थितियों का संवेदनशील चित्रण है. 

रेणू की कालजयी रचना का नाट्य रूपांतरण  

अपनी विशिष्ट भाषा और  मुहावरों के कारण रेणु के जुलूस को आमतौर पर आंचलिक उपन्यास ही समझा जाता है. लेकिन इसके विविध नाट्यरूपांतरणों ने इसे सार्वभौमिक बना दिया. और अगर साहित्यिक विधा और कलाशिल्प यानी फॉर्म की बजाए  इसके कार्यउद्देश्य यानी फंक्शन पर गौर करें तो रेणू की यह रचना आज की परिस्थितियों में उतनी ही काम की लग रही है जितनी साठ साल पहले समझी गई थी. किसी रचना के कालजयी होने के लिए छह दशक लंबा दौर पर्याप्त माना जा सकता है.

रेणु की इस साहित्य कथा को इतिहास कथा कहना इसलिए गलत नहीं होगा क्योंकि यह उपन्यास एक ऐतिहासिक घटना के परिप्रेक्ष्य में था. देश की आजादी के फौरन बाद वह मूल घटना थी आज के बांग्लादेश यानी तबके पूर्वी  बंगाल या पूर्वी पाकिस्तान से हटाए गए बांग्ला भाषियों का विस्थापित होकर भारत में आना.कथा यह बनाई गई कि विस्थापितों के लिए बिहार के पूर्णिया अंचल में शरणार्थी शिविर या बस्ती बसाई गई.कथा बताती है कि इस पुनर्वास या शरणार्थी बस्ती के लोगों के साथ वहां पहले से बसे लोगों का व्यवहार कैसा रहा.

जुलूस में रेणु ने भांति-भांति के तीस से भी ज्यादा पात्रों को गढ़ा है.

जुलूस में रेणु ने भांति-भांति के तीस से भी ज्यादा पात्रों को गढ़ा है.
Photo Credit: Suvigya Jain

शरणार्थी का जीवन

इस कथा में रेणु ने भांति-भांति के तीस से भी ज्यादा पात्रों को गढ़ा. इनमें शरणार्थियों के लिए घृणा उपजाने वाले और  अपने  सामाजिक और राजनीतिक स्वार्थ साधने वाले बुरे यानी नाकारात्क पात्र भी हैं. साथ ही इंसानियत और सामुदायिक सदभाव के पक्षधर अच्छे यानी सकारात्क किरदार भी हैं. कोई देखना चाहे तो इस कथा में वे पात्र भी हैं जो बुराई के पक्ष में सुनाए जा रहे तर्कों को मासूमियत से सुनते हैं. स्वार्थी यानी नकारात्मक किरदारों में कुछ स्थानीय नेता और उसके राजनीतिक यार दोस्त हैं.
कथा की सबसे बड़ी जरूरत के तौर पर अच्छी यानी नायकगुण संपन्न मुख्य पात्र है बांग्ला शरणार्थी पवित्रा चटर्जी. कई जटिल शरणार्थी पात्र हैं जो हर समय बेचैनी और अपना अंसतोष दिखाते हैं. वे हरदम अपने छूटे देश, अपनी मिट्टी और वहां के स्वाद का विलाप करते रहते हैं. वे पवित्रा से तीखी बहस करते रहते हैं कि इस मिट्टी को अपना कैसे मान लें. पवित्रा उन्हें समझाती है कि अब ये ही अपना देश है. हमें यहीं जीना मरना है. यानी अपनी विगत अस्मिता का आग्रह व्यर्थ है. कथा में पवित्रा विजेता है.

कथा के दायरे में समाज के विविध वर्ग हैं, जो लगातार हलचल बनाए रखते हैं. यह उल्लेख रोचक हो सकता है कि कथा के अनगिनत पात्रों में वह किरदार भी शामिल हैं, जिसकी आजीविका का साधन चौर्यकर्म है. वे पात्र भी हैं जिनकी आजीविका झूठी गवाही देने के धंधे से चलती है और वे अपनी आजीविका के लिए लठैती का धंधा भी करते हैं. कथा में पारंपरिक समाज का एक प्रतिनिधि किरदार वह है जिसका नाम पंडित रामचंद्र चौधरी है, जो अपने भोले-भाले जजमानों के लिए शगुन-अपशुगन निकालने का काम करता है और धार्मिक अनुष्ठान कराता है. यानी इस कथा में एक भरा पूरा सामाजिक भूगोल है. जाति और व्यवसाय के आधार पर मोहल्ले टोले हैं. कथा में इतने सारे सामाजिक समीकरण हैं कि रंगमंच हरदम जीवंत बना रहता है. साहित्य के समाजशास्त्रीय अर्थ में देखा जाए तो  यह  कथा समाज का दर्पण बनी रहती है. 

स्त्री नायकत्व

आज की बात और है. लेकिन रेणु ने जब 'जुलूस' लिखा वह साठ का दशक था. वह वैसा दौर था जब सामाजिक पारंपरिकता के नाम पर स्त्री की गरिमा के पक्ष में सोचना,कहना, सुनना एक दुस्साहस ही था. लेकिन रेणु ने इस उपन्यास में स्त्री को नायकतत्व दिया. इसी हवाले से तब भी और आज भी इस उपन्यास को महिला सशक्तिकरण का माहौल बनाने की दिशा में एक बड़ी साहित्यिक पहल माना गया था. 

साहित्य से नैतिकता का प्रचार

मंचन के बाद कुछ दर्शकों से बातचीत के दौरान 'जुलूस' के निर्देशक अतुल जस्सी का कहना था कि वे साहित्य की हर विधा को नैतिकता के प्रसार का माध्यम मानते हैं. वे मानते हैं कि रंगकर्म का मुख्य और अंतिम उद्देश्य  नैतिकता को  आकर्षक बनाना है. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारी प्रस्तुतियों से दर्शकों में नैतिक होने की इच्छा बढ़े और वे अनैतिकता के सामने दृढ़ता के साथ खडे़ होकर प्रतिवाद करने में समर्थ बनें. अतुल जस्सी के पास रंगकर्म का 25 साल से भी ज्यादा का अनुभव है. वे सिनेमा और टीवी में भी अमिनय भी कर चुके हैं.

इस नाटक की मुख्य पात्र एक महिला है, जो बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत आई है.

इस नाटक की मुख्य पात्र एक महिला है, जो बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत आई है.
Photo Credit: Suvigya Jain

नाटक की मुख्य पात्र पवित्रा चटर्जी की भूमिका मनजोत मल्होत्रा को सौंपी गई थी. उन्होंने बताया कि किसी किरदार को शिद्दत  से जीने का अर्थ उन्हें अब समझ में आया है. उनका कहना है कि इस भूमिका के बाद उनके खुद के सोच-विचार पर भी बड़ा असर पड़ा. उधर एक नकारात्मक किरदार के रूप में कासिम की भूमिका जगदीश शर्मा ने निभाई. नकारात्मक भूमिका वाले इस किरदार के प्रति  क्रोध और  घृणा के भाव पैदा करने में जगदीश का दमदार अभिनय सफल रहा. हालांकि उनका कहना था कि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इस काम के लिए उन्हें इतनी मशक्कत करनी पड़ेगी.

इसी तरह नैतिक और अनैतिक के बीच दुविधा पैदा करने वाला एक जटिल किरदार था पंडित रामचंद्र चौधरी. इस भूमिका को  पवन सिंघल ने अंजाम दिया और दर्शकों पर ख़ासा असर छोड़ा. मंचन के बाद उनका कहना था कि कोई व्यक्ति अगर असल में अनैतिक हो लेकिन लोगों के बीच नैतिकता का स्वांग करता हो ऐसे किरदार का अभिनय करना बड़ा मुश्किल लगा क्योंकि ऐसे किरदार के लिए अमिनेता को एक ही समय में अच्छा और बुरा व्यक्ति बनना होता है.

(डिस्क्लेमर:लेखक इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक काम किया. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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