बिहार में शराबबंदी के प्रति नीतीश कुमार की 'गंभीरता' कैसे मंत्री रामसूरत राय के कारण दांव पर लगी है?

नीतीश कुमार के शासन की सच्चाई यह भी है कि उन्होंने जो शराबबंदी अब से करीब पांच वर्ष पूर्व लागू की, वो समय-समय पर कुछ एक घटनाओं के कारण उनके शासन की या नीतीश कुमार के दोहरे मापदंड की पोल खोल देता है.

बिहार में शराबबंदी के प्रति नीतीश कुमार की 'गंभीरता' कैसे मंत्री रामसूरत राय के कारण दांव पर लगी है?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

बिहार में आप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थक हों या आलोचक, शराबबंदी के प्रति उनकी प्रतिबद्दता पर सवाल नहीं कर सकते. लेकिन उनके समर्थक हों या विरोधी वो साथ-साथ इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि शराबबंदी को लागू कराने में नीतीश सरकार विफल रही है जिसके कारण पूरे राज्य में एक समानांतर आर्थिक व्यवस्था कायम हुई है और जिसके सबसे अधिक लाभान्वित बिहार पुलिस के जवान, अधिकारी और अपराधी रहे हैं.

लेकिन बिहार के एजेंडा पर विकास को वापस लाने वाले और सुशासन बाबू के नाम से जाने वाले और कुछ महीनों में राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी पर सबसे अधिक समय तक बैठने वाले नीतीश कुमार के शासन की सच्चाई यह भी है कि उन्होंने जो शराबबंदी अब से करीब पांच वर्ष पूर्व लागू की, वो समय-समय पर कुछ एक घटनाओं के कारण उनके शासन की या नीतीश कुमार के दोहरे मापदंड की पोल खोल देता है. ऐसा ही एक घटनाक्रम राज्य के राजस्व मंत्री रामसूरत राय से सम्बंधित है जो चार महीने पूर्व उनके पिता के नाम से उनके भाई की जमीन पर चल रहे एक स्कूल के प्रांगण से शराब की भारी मात्रा में जब्ती से सम्बंधित है. इस मामले में रामसूरत राय ने अपनी सफाई से अपनी सरकार को कठघरे में तो खड़ा किया ही है, साथ ही नीतीश कुमार के शराबबंदी के लागू कराने में उनके दोहरे चरित्र को उजागर भी किया है.

पहले बात इसकी कि आख‍िर ये घटना उजागर कैसे हुई क्योंकि बरामदगी तो चार महीने से भी ज्यादा पहले हुई थी. पिछले सप्ताह मंगलवार को उत्पाद विभाग के बजट पर चर्चा के दौरान सीपीआईएमएल के अमरजीत कुशवाहा ने इस घटना का जिक्र किया जिसे कई अखबार वालों ने छापा और तुरंत इस बारे में चर्चा होने लगी. इसके बाद विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उठाया और रामसूरत राय ने सफाई दी. लेकिन रामसूरत राय का जो सफाई था उसमें उन्होंने माना कि शराब बरामद उसी नवंबर महीने में हुआ. जमीन उनके भाई का है और विद्यालय उनके पिता के नाम है. लेकिन उन्होंने कहा कि वो विद्यालय उनके भाई ने लीज पर दिया है. लेकिन साथ-साथ स्वीकार किया कि प्राथमिकी में उनके भाई का नाम भी है. लेकिन इससे साफ हो गया कि ना स्थानीय पुलिस ने उनके भाई को गिरफ्तार करने की हिम्मत जुटायी और ना जैसा नीतीश कुमार जैसा दावा करते हैं कि जिस भी कैंपस से शराब पकड़ा जाएगा वहां पर पुलिस भी बनायी जाएगी वैसा कुछ हुआ और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने तो शनिवार सुबह उस विद्यालय को चलाने वाले अमरेंद्र कुमार के छोटे भाई अंशुल भास्कर को मीडिया के सामने पेश किया जिसका दावा था कि, दरअसल छापेमारी उनके भाई की सूचना के आधार पर की गई लेकिन पुलिस ने उन्हें पुरस्कार देने के बदले उल्टे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया, जो एक बार फिर नीतीश कुमार के उस दावे को खोखला साबित करता है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से शराब के कारोबार के बारे में लोगों से पुलिस को सूचना देने का आग्रह किया था और कहा था कि उस शख्स की पहचान गुप्त रखी जाएगी.

निश्चित रूप से इस मामले में विधानसभा के अंदर भी हंगामा हुआ लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मीडिया से इस बारे में बात करने से बचते रहे, जो बुधवार और शनिवार दोनों दिन विधानसभा के पिछले गेट से उनके घर वापस जाने से साफ हो गया. वो फिलहाल इस मामले में कुछ बोलना नहीं चाहते हैं. क्योंकि नीतीश कुमार आजकल पटना की मीडिया के सवाल से भागते नहीं बल्कि हंस-हंस कर जवाब देते हैं. लेकिन साफ है कि मामला एक मंत्री का है और वो भी भाजपा के मंत्री का, इसलिए वो चाहते हैं कि सफाई उनकी तरफ से आये. लेकिन नीतीश कुमार को इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि सफाई से सवाल उनके दावे और सुशासन पर उल्टे खड़े हो जायेंगे.

हालांकि, नीतीश कुमार इस मामले में कार्रवाई करने में जितना और विलंब करेंगे उतना राज्य में शराब माफिया हो या उनके इस मुद्दे पर जो चंद पढ़े लिखे आलोचक हों, सबको एक और मौका मिलेगा. क्योंकि इससे पूर्व भी 2016 में जब अपने गृह जिला नालंदा के अपने पार्टी पदाधिकारी के घर से शराब बरामदगी का मामला हुआ था तो उस मामले के कारण तब के उत्पाद विभाग के प्रधान सचिव के.के पाठक को विभाग से जाना पड़ा और ये भी सत्य है कि उनके जाने के बाद शराबबंदी के विफल होने की नींव जो पड़ी वो बदस्तूर जारी है. वैसे ही मंत्री जिस जिला मुजफ्फरपुर से आते हैं कुछ वर्ष पूर्व वहां के तत्कालीन एसपी विवेक कुमार पर आय से अधिक संपत्ति रखने का एक मामला दर्ज हुआ था और उन पर भी शराब माफियाओं से मिलीभगत का आरोप लगा था, लेकिन राजनीतिक दबाव में नीतीश कुमार ने निलंबित विवेक कुमार को न केवल निलंबन से मुक्त किया बल्कि उनकी पोस्टिंग भी की, और अब तो ये चर्चा चल रही है कि विवेक कुमार पर जांच शुरू करने वाले अधिकारियों पर ही कार्रवाई हो सकती है. हालांकि, बिहार के उत्पाद विभाग में जब से अमृतराज ने आईजी का पद संभाला है तो रिकॉर्ड मात्रा में ना केवल अवैध शराब बल्कि इसके कारोबारी भी पुलिस की गिरफ्त में आ रहे हैं, लेकिन शराब की जब्ती से एक बात साफ है कि ना सिर्फ शराब माफिया का जाल पूरे राज्य में फैल चुका है बल्कि वो काफी मजबूत भी हो चुके हैं, और इसका एक प्रमुख कारण पिछले कुछ वर्षों के दौरान नीतीश कुमार का शासन का कार्रवाई करने में शिथिलता हैं.

कहा जाता है कि जो इंसान इतिहास से नहीं सीखता वो और अधिक बड़ी गलती दोहराता है. नीतीश कुमार ने अगर अपने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार से कभी उनके मुजफ्फरपुर के जिला अधिकारी से तबादले का कारण पूछ लिया होता तो चार महीने बाद आज उन्हें सदन से सड़क तक इस मामले में अपनी फजीहत नहीं झेलनी होती. दरअसल, मंत्री रामसूरत राय शुरू में राष्ट्रीय जनता दल में रहे हैं और उनके स्वर्गीय पिता अर्जुन राय भले कभी विधायक नहीं बने हो लेकिन वो लालू यादव के करीब और दबंग आग माने जाते थे. संजय कुमार जब जिलाअधिकारी थे तो वहां के बाजार समिति में जांच करने पहुंचे तो अर्जुन राय से आमना सामना हो गया. हालांकि कहा ये गया कि संजय कुमार ने गुस्से में उन्हें धक्का दे दिया लेकिन उस घटना के शाम जब पूर्व मंत्री रमई राम के साथ अर्जुन राय पहुंचे तो उन्होंने फरियाद लगायी कि उन्हें एक थप्पड़ मारा गया जिससे यादवों का मान सम्मान को धक्का पहुंचा है. लालू आग बबूला हो संजय कुमार को सबके सामने फोन किया और कहा कि आप लोग ब्रिटिश राज वापस ला रहे हैं और अगले दिन उनका तबादला कर दिया. और अब समय का चक्र देखिए तेजस्वी यादव, राम सूरत राय के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे नीतीश कुमार को याद दिला रहे हैं कि आपकी सरकार को इस मामले में क्या क्या एक्शन लेना चाहिए और नीतीश कुमार कहीं न कहीं कर्तव्यविमूढ़ मुद्रा में हैं.

नीतीश कुमार को मालूम है कि जब कार्रवाई करने की बात होती है तो, अगर राजा की गद्दी पर बैठकर दोहरा मापदंड अपनाने पर आप तुरंत तो राहत की सांस ले सकते हैं लेकिन उसका दूरगामी प्रभाव काफी प्रतिकूल होता है. वो अपने शराबबंदी के आलोचकों को सार्वजनिक कार्यक्रम में जितना सुना लें लेकिन सच यही है कि अगर शराब बिक रहा है, शराब माफिया घूम रहे हैं तो इसके जिम्मेवार पढ़े लिखे लोग नहीं बल्कि गृह विभाग के बॉस और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ऊपर होगी. इसलिए, अगर चार महीने तक अपने मंत्रिमंडल सहयोगी के सम्बन्धियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो सब यही कहेंगे कि अपनी गद्दी के कारण नीतीश अब कोई झमेला नहीं चाहते, क्योंकि नीतीश कुमार से बेहतर इस सच को कोई नहीं जानता कि कार्रवाई अब तक नहीं हुई तो दाल में कुछ काला है.



(मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...)

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